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Showing posts from August, 2025

वही दिन आज भी - सच्ची कहानी

विडंबना देखिए—आज के बच्चे लव-मैरिज के नाम पर घर से भाग खड़े होते हैं, माँ-बाप पुलिस में गुमशुदगी या किडनैपिंग की रिपोर्ट लिखवाते हैं और कुछ ही दिनों बाद वही बच्चे दामाद या बहू बनकर घर लौट आते हैं। पर एक दौर की मोहब्बत… चुपचाप सहती रही, निभती रही, और ज़िम्मेदारियों के बीच कहीं दब भी गई।  शीनु और दीपक की मोहब्बत प्यार की मिसाल है , प्रेम अगर सच्चा हो, तो वह उम्र, दूरी, शादी और जिम्मेदारियों के बोझ के बावजूद भी अमर रहता है। आज जब मैं उस दौर को याद करती हूँ, तो लगता है—समय कितना भी बदल जाए, मगर सच्ची मोहब्बत अपने निशान पीछे छोड़ ही जाती है। 'वही दिन आज भी ' एक सच्ची कहानी है जो सामाजिक बंधनों से बाहर नहीं निकल पाई ,लेकिन सामाजिक रस्मों को आजकल के बच्चों की तरह तावं पर भी नहीं रखा । Writer -Anita Gahlawat   कहानी शीर्षक - वही दिन आज भी… बात है सन 2005 की। जयपुर के आर.वी.टी.आई. हॉस्टल की गलियों में हमारी हँसी-ठिठोली गूँजती थी। उन दिनों मैं और शीनु गोयल—रूममेट, क्लासमेट और धीरे-धीरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी एक दोस्त—दिन-रात साथ रहते थे। उम्र में वह मुझसे पाँच-छह साल बड़ी थी...

दहेज दहन - दहेज पर हिंदी कविता

  दहेज सिर्फ़ लेन-देन का मसला नहीं है, यह एक ऐसी सामाजिक बीमारी है जिसने अनगिनत बेटियों की ज़िंदगी छीन ली। आज भी समाज में “वर” को बिकाऊ सामान की तरह पेश किया जाता है और “वधू” को जलाकर राख कर दिया जाता है। दहेज — यह शब्द सुनते ही आँखों के सामने कैसी तस्वीर उभरती है? सजी-धजी बारात, चमकते कपड़े, ढोल-नगाड़े और बीच में खड़ा एक “वर”, जो खुद को इतना महान समझता है कि उसके नाम पर लाखों रुपये, गाड़ियाँ, गहने और उपहार माँगे जाएँ। यही समाज की विडंबना है। शादी जैसी पवित्र परंपरा, जिसे दो आत्माओं का पवित्र मिलन कहा जाता है, आज एक सौदे में बदल चुकी है। हम सब जानते हैं कि भारत में हर साल हज़ारों बेटियाँ दहेज की भेंट चढ़ जाती हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, औसतन हर रोज़ 20 से 22 दहेज हत्याएँ होती हैं। यानी हर घंटे किसी न किसी को उसकी ससुराल की आग में झोंक दिया जाता है। यह सिर्फ़ एक आँकड़ा नहीं, बल्कि हर आँकड़े के पीछे एक चीख़, एक माँ-बाप का टूटा हुआ दिल और एक परिवार का बिखरा हुआ सपना है। आज भी बेटे को “वृद्धावस्था का सहारा” और बेटी को “बोझ” मानने की मानसिकता जीवित है। यही मानसिकता दहेज जैसी कुरीति क...

Justice for Manisha -मनीषा की पुकार

"हर रोज़ अख़बार की सुर्ख़ियाँ हमें झकझोर देती हैं— कहीं बेटी को कोख में मार दिया गया, कहीं सड़क पर घसीटा गया, कहीं खेतों में लहूलुहान फेंक दिया गया। ये कैसा समाज है जहाँ बेटियाँ देवी भी हैं और शिकार भी?" "मनीषा की पुकार" खेतों की मिट्टी आज रोई, लहू से भीगी धानी डोली। कलियाँ जिसको सपनों में गातीं, आज वही चुपचाप खो गईं। दरिंदों ने रौंदा चमन का आलाप, काट दी गर्दन, बुझा दी हर साँस। पर क्या समझे थे वो हैवान, कि औरत का खून यूँ बहा देंगे? नहीं! हर बूंद बनेगी अंगार, हर चीख बनेगी हुंकार। मनीषा अकेली नहीं है— उसके साथ खड़ी हैं लाखों मनीषाएँ, जो न झुकेंगी, न डरेंगी, अपने लहू से इंक़लाब लिखेंगी। माँ की गोदी से उठी चिता की लौ, अब क्रांति का मशाल बनेगी। मनीषा की चुप्पी नहीं— उसकी आवाज़ हम सबकी जुबान बनेगी। "अब बेटियाँ चुप नहीं रहेंगी। उनकी आँखों का पानी अब आग बनेगा, उनके आँसुओं से न्याय की बाढ़ उठेगी। -Anita Gahlawat  याद रखो— बेटियों के साथ अन्याय का हर क़दम समाज की कब्र खुद खुदाई करता है। अब बेटियाँ अपनी कलम, अपनी आवाज़ और  अपने साहस से, नई इबारत लिखेंगी।" -Anita Gahl...

बरसों बाद, फिर भी सच्चा अहसास

  कुछ रिश्ते वक्त की मार नहीं झेलते — वे उम्र, दूरी और परिस्थितियों की हर आँधी में ज्यों के त्यों खड़े रहते हैं। वे न वादों से बंधते हैं, न परिभाषाओं में समाते हैं। बस एक बार मन के किसी कोने में जगह बना लेते हैं और फिर ज़िंदगी चाहे जितनी बदल जाए, उनका एहसास वहीं ठहरा रहता है। यह कहानी भी ऐसे ही एक रिश्ते की है — जो स्कूल की आख़िरी बेंच पर शुरू हुआ और बरसों बाद बच्चों की मासूम हंसी में फिर से लौट आया। कहानी - " बरसों बाद, फिर भी सच्चा अहसास" Written by Anita Gahlawat  सन् 1999 की पहली वर्षा थी। रुद्रपुर के सरकारी इंटर कॉलेज की खिड़कियों से मिट्टी की भीनी महक और बूंदों की सरसराहट भीतर तक उतर रही थी। ग्यारहवीं की कक्षा में बच्चों की फुसफुसाहट और ब्लैकबोर्ड पर चलती खड़िया की खरखराहट के बीच दरवाज़ा धीरे से खुला। भीतर आई एक लड़की — सफ़ेद-नीली वर्दी में, भीगे केशों से टपकते मोती जैसे जलकण, आंखों में हल्की-सी झिझक। मास्टर जी ने परिचय कराया — “ये प्रीति हैं, नैनीताल से आई हैं।” और उसे आख़िरी बेंच पर बैठने का इशारा किया — ठीक सूरज के पास। सूरज ने किताब से नज़र उठाई, बस एक पल उसे देखा औ...

शहीद की विरासत- हिंदी कविता

  कवयित्री: अनीता गहलावत "शहादत सिर्फ़ सरहद पर नहीं होती, वो घर के आँगन में भी साँस लेती है…" एक सैनिक जब तिरंगे में लिपटकर लौटता है, तो वह केवल अपना जीवन नहीं देता, बल्कि अपने परिवार की पूरी दुनिया बदल देता है। "शहीद की विरासत" सिर्फ़ सम्मान के शब्दों में नहीं, बल्कि उन अधूरी हँसियों, दबे आँसुओं और रोज़-रोज़ जीते गए साहस में छिपी होती है। यह कविता अनीता गहलावत की कलम से एक बेटी की आवाज़ है, जिसने अपने पिता को खोकर भी उनकी वीरता को जीना सीखा, और चाहती है कि यह विरासत सिर्फ़ तस्वीरों में नहीं, बल्कि समाज की सोच में भी ज़िंदा रहे। Title - "शहीद की विरासत" शहीद हुआ जब मेरा पापा, छाती पर तिरंगा लहराया था, गाँव ने सिर झुका लिया, देश ने मुझको समझाया था। जब बापू मेरे नहीं लौटे, तिरंगे में लिपटा तन आया, गाँव ने कहा — “शहीद हुआ है”, पर मेरी तो जग ही लुट आया। चौखट पर जो ठहाके थे, अब मातम बनके आते हैं, माँ के आँचल की सिसकियाँ रोज़ छत तक जाते हैं। मैं — शहीद की बेटी हूँ, नाम मिला, सुख कहाँ? लोग पूछें — “सरकार ने क्या दिया?” जैसे पिता पेंशन का खाता था वहाँ। स्कूल में ज...

शहीद की विरासत: बेटी – करुणा की एक जीवंत कथा

  शीर्षक- "शहीद की विरासत: बेटी – करुणा की  एक जीवंत कथा" Written by Anita Gahlawat  जब कोई सैनिक युद्धभूमि में शहीद होता है, तो देश उसे सलामी देता है, तिरंगा उसकी छाती पर गर्व से लहराता है और हर आँख श्रद्धा से झुक जाती है। लेकिन उस तिरंगे की तहों में एक न दिखाई देने वाला शोक होता है — वो शोक, जो उसके पीछे छूटे परिवार की रग-रग में बस जाता है। यह कहानी है एक ऐसी ही बेटी की… जिसने अपने पिता को देश के लिए खोया — एक वीरगति प्राप्त सैनिक की बेटी होने का गर्व उसके जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा बन गया। समाज ने उसके हिस्से में सम्मान नहीं, संदेह और तिरस्कार लिखा। रिश्तों ने उसे अपनाने की जगह उपेक्षा दी। जीवनभर वह "शहीद की विरासत" कहलाने के बावजूद अपने अस्तित्व के लिए ही संघर्ष करती रही। यह केवल एक करुणा-कथा नहीं है — यह एक ऐसी जीवित दस्तावेज़ है, जिसमें एक बेटी ने आँसुओं में इतिहास लिखा, चुप्पियों में प्रतिरोध जिया और अपमान की राख से अपनी पहचान को हर रोज़ नया आकार दिया। "शहीद की विरासत: बेटी – करुणा की एक जीवित कथा" एक ऐसी सच्चाई है, जिसे पढ़ते हुए आपका हृदय भीग जाएगा, ...

पति-विज्ञान: हादसों से जन्मी अद्भुत विद्या!

 🤣 पति-विज्ञान: हादसों से जन्मी अद्भुत विद्या! सोशल मीडिया पर रोज़ाना वायरल हो रहे 'पति पीड़ित' रील्स और मीम्स को देखकर मन में एक सवाल उठा — क्या अब सचमुच पतियों को अपने घर का विज्ञान पढ़ना पड़ रहा है? इन्हीं बेलन, चप्पल और चुप्पी से जन्मे हादसों को आधार बनाकर मैंने यह व्यंग्य  —  सीर्फ सोशल मीडिया पर दुखी पतियों के आधार पर लिखा है, जो जानबूझकर ऐसी हरकत करते हैं "पति-विज्ञान: हादसों से जन्मी अद्भुत विद्या!" ✍️ लेखिका: अनीता गहलावत --- 🔬 परिचय: पति-विज्ञान क्या है? पत्नी-विज्ञान तो सबको आता है — "बोलो कम, सुनो ज़्यादा", "ना में हां ढूंढो", "मूड खराब हो तो खुद को दोष दो"... लेकिन पति-विज्ञान, इस देश में एक अत्यंत उपेक्षित परंतु पीड़ादायक रूप से प्रासंगिक विषय है। यह वह विज्ञान है, जो किचन में जले हाथों, बाथरूम में गिराए गए तौलियों, और बेलन से हुए हादसों के अनुभवों पर आधारित है। इसका पाठ्यक्रम सीधा नहीं है — इसे सिर्फ वही समझ पाते हैं जो 'शादी' नामक एक्सपेरिमेंट में फंसे ह --- 📚 पति-विज्ञान का पाठ्यक्रम: यह विषय तीन प्रमुख भागों म...

एक पहिए की साइकिल: नारी बनाम नालायक

 Title:- एक पहिए की साइकिल: नारी बनाम नालायक समाज एक साइकिल है। दो पहिए हैं — पुरुष और महिला। लेकिन विडंबना देखिए, ये साइकिल चलती तो दोनों पहियों पर है, पर हर बार पंचर सिर्फ महिला वाला पहिया ही होता है। और समाज का मिस्त्री — यानी हमारी सोच, हमेशा पुरुष वाले पहिए की हवा चेक करके सन्तुष्ट हो जाता है, भले ही दूसरा पहिया पूरी तरह चिथड़ा हो। इतिहास साक्षी है — महिलाएं सदियों से चूल्हे-चौके में पक रही हैं। आज जब उन्होंने बाहर निकलना शुरू किया, सांस ली, नौकरी की, कुछ बोला — तो पुरुष समाज को दमा हो गया! लगता है, औरतों की आज़ादी से कुछ पुरुषों को एलर्जी हो गई है। "अबे देख, बीवी ने जवाब दे दिया!" "यार, उसने खुद गाड़ी ली है!" "क्या? वो कोर्ट चली गई?" "मतलब, इज्जत गई समझ!" और फिर शुरू होता है — सोशल मीडिया का महासंग्राम। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के पीएचडी पुरुष द्रौपदी की तरह कपड़े फाड़-फाड़ कर ज्ञान परोसते हैं कि ‘नारी ही नर्क का द्वार है’। लेकिन ज़रा रुकिए, यही समाज तब मौन क्यों हो जाता है जब कोई पति अपनी पत्नी को पीटता है, दहेज में कार नहीं लाने पर ज़िंदा जल...

आख़िरी तक तुम-“एक अनकही, पर आजीवन प्रेम कथा”

  "आख़िरी तक तुम…अनीता गहलावत की लिखी " एक भावनात्मक प्रेम कहानी है, जो रजनी और चंद्रभान के अनकहे, मगर आजीवन साथ निभाए गए रिश्ते को उजागर करती है। यह कहानी दो हिस्सों में बंटी है — पहला भाग हास्य से भरपूर है, जहाँ गांव की हलचल, सुहागरात की मज़ेदार घटनाएँ और मोहल्ले की चहकती दिनचर्या है। वहीं दूसरा भाग बेहद मार्मिक है, जिसमें उम्र के अंतिम पड़ाव पर रजनी ताई की उपस्थिति और चंद्रभान की अंतिम सांसों तक निभाया गया मौन प्रेम भावुक कर देता है। कहानी उन रिश्तों की पड़ताल करती है जो कहे नहीं जाते, बस निभाए जाते हैं। रजनी और चंद्रभान की प्रेम कहानी शादी के बंधन में नहीं बंधती, पर जीवन भर एक-दूसरे के साथ रहती है — बिना कोई दावा किए, बिना कोई शिकायत किए। यह कहानी दिल छू लेने वाली संवेदनाओं और मौन समर्पण का सुंदर चित्रण है — प्रेम की परिभाषा को नई गहराई देती हुई। शीर्षक: "आख़िरी तक तुम…" “ एक अनकही, पर आजीवन प्रेम कथा” Written by Anita Gahlawat  "आज तो मोहल्ले में बड़ी हँसी-मज़ाक हो रही है!" मैंने मुस्कुराते हुए चौखट से बाहर झाँका। सर्द धूप बिखरी थी, और नुक्कड़ पर चाय ...