आख़िरी तक तुम-“एक अनकही, पर आजीवन प्रेम कथा”
"आख़िरी तक तुम…अनीता गहलावत की लिखी " एक भावनात्मक प्रेम कहानी है, जो रजनी और चंद्रभान के अनकहे, मगर आजीवन साथ निभाए गए रिश्ते को उजागर करती है। यह कहानी दो हिस्सों में बंटी है — पहला भाग हास्य से भरपूर है, जहाँ गांव की हलचल, सुहागरात की मज़ेदार घटनाएँ और मोहल्ले की चहकती दिनचर्या है। वहीं दूसरा भाग बेहद मार्मिक है, जिसमें उम्र के अंतिम पड़ाव पर रजनी ताई की उपस्थिति और चंद्रभान की अंतिम सांसों तक निभाया गया मौन प्रेम भावुक कर देता है।
कहानी उन रिश्तों की पड़ताल करती है जो कहे नहीं जाते, बस निभाए जाते हैं। रजनी और चंद्रभान की प्रेम कहानी शादी के बंधन में नहीं बंधती, पर जीवन भर एक-दूसरे के साथ रहती है — बिना कोई दावा किए, बिना कोई शिकायत किए।
यह कहानी दिल छू लेने वाली संवेदनाओं और मौन समर्पण का सुंदर चित्रण है — प्रेम की परिभाषा को नई गहराई देती हुई।
शीर्षक: "आख़िरी तक तुम…"
“एक अनकही, पर आजीवन प्रेम कथा”
Written by Anita Gahlawat
"आज तो मोहल्ले में बड़ी हँसी-मज़ाक हो रही है!"
मैंने मुस्कुराते हुए चौखट से बाहर झाँका।
सर्द धूप बिखरी थी, और नुक्कड़ पर चाय की महफ़िल जमी थी।
औरतों की हँसी की गर्माहट ऐसे लिपटी थी जैसे चाय की भाप —
वो पल्लू से कान ढकती, ठिठुरती हवा में तानों और किस्सों से बीते वक़्त को जगा रही थीं।
हर बात में कोई पुराना राज़ था, हर ठहाके में अपनापन।
मैं भी मुस्कान लिए उस माहौल में घुल चुकी थी।
मैं चुप नहीं थी — मेरी आँखों में भी वही चमक थी,
जो उनकी बातों में झलक रही थी।
हर हँसी मेरे भीतर तक उतरती जा रही थी —
जैसे कुछ पुराना फिर से खिल उठा हो।
ये आवाज़ें बस शोर नहीं थीं,
ये मोहल्ले की धड़कन थीं —
जो हर सर्दी में, हर धूप में,
नए सिरे से ज़िंदा हो उठती हैं…
और दिल में एक मीठा उजास छोड़ जाती हैं।
पीढ़ियों का टकराव हास्य और इमोशनल कहानी
तभी गली के मोड़ से सफेद साड़ी में लिपटी, हाथ में छड़ी टिक-टिक करतीं, अस्सी वर्षीया रजनी ताई प्रकट हुईं—चाल ऐसी मानो किसी सीक्रेट मिशन पर निकली हों!
निगाहें तेज़, जैसे हर खिड़की से झाँकती नज़रों को पढ़ रही हों—और चेहरे पर वही मुस्कान, जो मोहल्ले वालों को सीधे कर देती थी।
आँखों में शरारत थी—पर वह शरारत जो पकड़ में आने पर भी मासूम बन जाए।
सीमा ने सुमन की कोहनी में कोंचा और बुदबुदाई, “लो जी, कमांडर ताई आ रही हैं! अब सब अपनी-अपनी गलती याद कर लो!”
झुंड ठहाकों से लोटपोट हो गया! किसी ने ताई को सलामी दी, किसी ने पानी छिपा लिया कि कहीं “थोड़ा पिएंगे” कहकर पूरा गिलास ही न खाली कर जाएँ!
ताई मोहल्ले की जान थीं। ग़ुस्से में ऐसी बाघिन बन जातीं कि म्याऊँ करने वाले भी 'बोल-बम' कर उठें! और कभी ऐसा मौन व्रत थोप देतीं कि पूरा मोहल्ला साँस रोक ले।
जैसे ही ताई पास आकर बैठीं, चर्चा चल पड़ी — आजकल के 'इंस्टेंट प्यार, इंस्टेंट शादी और एक्सप्रेस तलाक' पर।
ताई ने लंबी साँस ली—जैसे पूरी रेलगाड़ी छाती में भर ली हो—फिर बोलीं:
“अरे बेटा, हमारे ज़माने में लोग बोलते नहीं थे, पर सब कुछ निभा लेते थे। अब तो हर चीज़ का ट्यूटोरियल है—‘कैसे प्यार करें’, ‘कैसे ब्रेकअप करें’, और ‘कैसे एक्स को ब्लॉक करें!’ हमारे समय में तो दिल बोलते थे… और आँखें डिक्शनरी हुआ करती थीं।”
सीमा पेट पकड़कर हँसी, लेकिन फिर भी पूछ बैठी, “ताई, वो चंद्रभान अंकल से आपका क्या… वही… अफेयर-वफेयर था क्या?”
ताई मुस्कराईं—इतनी गहराई से कि वहाँ से समुंदर निकल सकता था।
फिर बोलीं:
“अरे क्यों बेटा, बूढ़ों के सीने में दिल नहीं धड़कते क्या? क्या प्यार करने की कोई आखिरी तारीख होती है? और सुनो, तुम ही क्या अंग्रेज़ी गाने सुनती हो? हम भी ‘जब-जब उड़ें ज़ुल्फें तेरी’ पर इतनी बार उड़ चुके हैं कि पंख कटवाकर ही लौटे!”
अब तो मोहल्ले में ठहाकों का भूचाल आ गया। एक ने पूछा, “ताई, आप कभी गिरीं नहीं थीं उड़ते-उड़ते?”
ताई ने छड़ी घुमाई और बोलीं, “गिरी नहीं बेटा… दिल में धँस गई थी!”
पूरा मोहल्ला हँसी से गूंज उठा—लेकिन ताई की आँखों में एक ऐसा मौसम पल भर को जागा, जो अब बस कहानियों में बचा है।
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"साल था 1960..."
"मैं—रजनी, गाँव के प्रधान की सबसे बड़ी बेटी। उम्र कम थी, पर ज़िम्मेदारियाँ... उम्र से कहीं बड़ी। जीवन की पाठशाला शुरू होने से पहले ही घर की चौखट पर व्रत, मर्यादा और त्याग का पाठ पढ़ा दिया गया था।"
सबका ध्यान ताई पर टिक गया — उनकी आँखों में कहीं अतीत की परछाइयाँ तैरने लगीं।
"उन्हीं दिनों हमारे गाँव के स्कूल में एक नया मास्टर आया — चंद्रभान। गौरवर्ण, सादा-सा चेहरा, और आँखें… जैसे किसी अनसुने गीत की ठहरी हुई पंक्तियाँ।"
सीमा ने चाय की चुस्की लेते हुए फुसफुसाया, "ताई भी बड़ी रोमांटिक निकलीं!"
ताई ने सहमति दी, पर नज़रें झुकी नहीं।
"वह स्कूल से लौटते समय अक्सर हमारे घर रुकता — पिताजी से शिक्षा नीति पर चर्चा करने। और मैं? मैं चुपचाप लस्सी की ट्रे लेकर आती, रखती और बिना कुछ कहे लौट जाती।"
"कभी कोई शब्द नहीं बोले हमने। पर हर दिन कुछ अनकहा, नज़रों की भाषा में बुनता रहा…
प्रेम उस दौर में कोई विकल्प नहीं था, बेटा। वह तो किस्मत की थाली में भाग्यशाली को ही परोसा जाता था। हमारे यहाँ तो लड़की के मन की कोई कीमत नहीं थी, बस परिवार की इज़्ज़त की होती थी।"
ताई की आवाज़ हल्की-सी कांपी। फिर वे मुस्कराईं, जैसे कोई पुरानी बात याद आ गई हो।
"मेरी शादी कब तय हुई, इसका मुझे ठीक से याद भी नहीं। उस समय 15-16 की होते ही लड़कियों को विदा कर दिया जाता था — जैसे आम की गुठली अलग कर दी जाती हो। मैं भी उसी रिवाज़ की चुप कतार में चल पड़ी।"
"चंद्रभान को भी मेरी शादी में आमंत्रित किया गया था — मास्टरजी होने के नाते।
मैं सजी-संवरी, हाथों में मेंहदी और माथे पर बिंदिया लगाए, अपने पति के साथ फेरे ले रही थी…
और वह, एक कोने में खड़ा, भीड़ के बीच चुपचाप मुझे देख रहा था।
मैंने तो तुम्हारे ताऊजी का चेहरा भी कई दिन बाद देखा था...
अरे, हमारी शादी तो ऐसी हुई थी कि जैसे मूवी रिलीज़ हो गई हो और हीरो कौन था — ये हफ्तों बाद पता चला! ताऊजी भी बड़े स्मार्ट थे — अच्छे व्यक्तित्व के धनी।
इतने में शीला बीच में बोल पड़ी — “सुहागरात नहीं मनी क्या, उसमें चेहरा नहीं देखा?”
ताई ने झट से जवाब दिया —
“आजकल की तरह ‘जानू-बेबी’ नहीं होता था हमारे ज़माने में।
बड़े कुनबे होते थे, कभी-कभार ही वक्त मिलता था।
तुम्हारी तरह ए.सी. वाले कमरे भी नहीं होते थे!
हमारे तो कोड वर्ड चलते थे —
‘कंबल कौन ले गया?’ या ‘कहाँ बिछाना है?’” पानी की मटकी कहां रखनी है?
सब लोग पेट पकड़ कर हँसने लगे…
ठाहाकों की तो जैसे कोई सीमा ही नहीं रही!"
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फिर आगे कहने लगी
"मेरी शादी के दो वर्ष बाद ससुराल में मेरी ननंद शांति की शादी तय हुई। वह सगी नहीं थी, पर मेरे लिए बहन से कम नहीं थी।
जब मैं इस आँगन की दहलीज़ लाँघी, तो वही पहली थी जो मेरे पास आई —ससुराल में मेरी सबसे पहली सखी बनकर।"
"हम बाल एक-दूसरे से गूंथवातीं, रोटियाँ बेलना उसने मुझसे सीखा… धीरे-धीरे वह मेरी परछाईं बन गई।"
"शादी का दिन था। घर चहक रहा था, बारात के इंतज़ार में दरवाज़े सज चुके थे।
मैं और शांति दोनों सजी-धजी खड़ी थीं —
हँसते हुए, मुस्कराते हुए…पर भीतर एक सिहरन सी उठ रही थी कि शांति ससुराल चली जाएगी ।
दरवाजे पर बारात थी "जैसे ही दूल्हा सेहरे की लटों से झाँका —मेरी साँसें थम गईं।"
"वह चंद्रभान था…"
"हाँ, वही चंद्रभान —
मेरी नज़रों का मौन गीत,
मेरे जीवन का एक अनकहा हिस्सा —
आज मेरी ननंद का वर बनकर आया था।"
"भीतर कुछ गहराई से टूट गया…
पर चेहरा मुस्कराता रहा —
जैसे हर स्त्री मुस्कराती है,
जब उसे टूटना नहीं होता,
बस निभाना होता है।"
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"विदाई का समय आया।
मैंने मुस्कराते हुए पहली बार एक वाक्य कहा —
‘मेरी ननंद को अच्छे से रखना… बहुत प्यारी जोड़ी है।’"
"उसने पहली बार मेरी ओर देखा —
स्थिर, गहराई से।
फिर बोला:
'ज़रूर। आपकी ननंद अब मेरी अर्धांगिनी है।
पर मैं तो रिश्ता तब से ढूँढ़ रहा था…
जब से आपका ब्याह हुआ।
पर आप तो मौक़ा ही नहीं देती थीं कुछ कहने का।
अब जाकर पत्नी के रूप में शांति मिली है…
लेकिन आप तो पहले ही किसी की हो चुकी थीं…'"
"वहाँ खड़े और कोई नहीं समझ पाया उस मज़ाक को,
पर हम दोनों जानते थे —
वह मज़ाक नहीं था…"
“वो एक अधूरी किताब थी…
जिसे हम दोनों ने मुस्कराकर बंद कर दिया।”
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"समय बीतता गया —
बच्चों की पढ़ाई, घर की ज़िम्मेदारियाँ, उम्र का भार…
सब कुछ चलता रहा।"
"इत्तेफ़ाक तो देखिए… बेटे के तबादले के बाद यहां आए थोड़े ही दिन हुए थे । एक दिन यूँ ही सुबह की सैर पर निकली तो एक जाना-पहचाना साया दिखा—
एक घर के बाहर, चारपाई पर कोई चुपचाप लेटा था।
आँखें धुँधली पड़ चुकी थीं…
पर वो मुस्कान…
वो मुस्कान अब भी वैसी ही थी—
जैसे बरसों पहले थी ।
"वह चंद्रभान था।
मुझे देखकर बोला —
‘तुम आज भी वैसी ही लगती हो… नकली दाँतों में भी।’"
"उस दिन के बाद मैं रोज़ जाने लगी — पता चला तुम्हारे ताऊजी की तरह शान्ति भी स्वर्ग सिधार चुकी थी ।
अब मैं रोज आने लगी
उसे दवा देती, बातें करती।
अब हम वो सब कहने लगे…
जो जवानी में कह नहीं पाए थे।"
"वो मेरी बहुओं की शिकायतें सुनता,
मैं उसकी टूटी दिनचर्या —
हम उम्र के उस किनारे पर खड़े थे,
जहाँ शब्दों की जगह समझ लेना ही प्रेम था।"
चंद्रभान की पोती की शादी थी। हम दोनों साथ खड़े हुए। नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद दिया।
फिर साथ में तस्वीर भी खिंचवाई।
किसी को एहसास तक नहीं हुआ कि हम पति-पत्नी नहीं थे।
कभी-कभी बच्चे हँसी में कह देते — रियल फ्रेंडशिप तो यही है ।
अब हमारे बीच की झिझक और संकोच जैसे कहीं खो गए थे। हम निःसंकोच पुराने दिनों की बातें करते — पहली मुलाकात, वह पहली नज़र, हर दबा हुआ भाव अब खुलकर बाहर आने लगा था।
मैंने ताई को बातों के बीच टोकते हुए पूछा —
"ताई, क्या अब समाज को आपका यह साथ स्वीकार था?"
उन्होंने मेरी ओर देखा और वही पुरानी कहावत दोहरा दी —
बेटी “जवानी में सौ-सौ यार..., बुढ़ापे में एक भी नहीं..
मेरे आने से चंद्रभान के बच्चे उसकी देखभाल को लेकर निश्चिंत हो गए थे। और मेरे अपने बेटे-बहू को भी मेरे घर से निकल जाने के बाद कुछ राहत मिल गई थी।
ताई ने बहुत सहज स्वर में कहा —
“यह बुढ़ापा है... जैसे भी कट जाए, बस सुकून से कटे — यही बहुत है।” "नाम नहीं था इस रिश्ते का, कोई अधिकार भी नहीं… बस एक मौन, निर्मल प्रेम था।"
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