एक पहिए की साइकिल: नारी बनाम नालायक
Title:- एक पहिए की साइकिल: नारी बनाम नालायक
समाज एक साइकिल है। दो पहिए हैं — पुरुष और महिला। लेकिन विडंबना देखिए, ये साइकिल चलती तो दोनों पहियों पर है, पर हर बार पंचर सिर्फ महिला वाला पहिया ही होता है। और समाज का मिस्त्री — यानी हमारी सोच, हमेशा पुरुष वाले पहिए की हवा चेक करके सन्तुष्ट हो जाता है, भले ही दूसरा पहिया पूरी तरह चिथड़ा हो।
इतिहास साक्षी है — महिलाएं सदियों से चूल्हे-चौके में पक रही हैं। आज जब उन्होंने बाहर निकलना शुरू किया, सांस ली, नौकरी की, कुछ बोला — तो पुरुष समाज को दमा हो गया! लगता है, औरतों की आज़ादी से कुछ पुरुषों को एलर्जी हो गई है।
"अबे देख, बीवी ने जवाब दे दिया!" "यार, उसने खुद गाड़ी ली है!" "क्या? वो कोर्ट चली गई?" "मतलब, इज्जत गई समझ!"
और फिर शुरू होता है — सोशल मीडिया का महासंग्राम। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के पीएचडी पुरुष द्रौपदी की तरह कपड़े फाड़-फाड़ कर ज्ञान परोसते हैं कि ‘नारी ही नर्क का द्वार है’। लेकिन ज़रा रुकिए, यही समाज तब मौन क्यों हो जाता है जब कोई पति अपनी पत्नी को पीटता है, दहेज में कार नहीं लाने पर ज़िंदा जला देता है, या नाखुश होकर तलाक़ की धमकी देता है?
अब बात करते हैं आज की नारी की।
नारी 2.0: आत्मनिर्भरता का 'अपराध'
आज की नारी रसोई से निकलकर संसद तक पहुंच गई है। नौकरी करती है, फैसले लेती है, शादी से पहले सोचती है, शादी के बाद सोचने से डरती नहीं। लेकिन यही सोच — समाज की आँखों में किरकिरी बन जाती है।
अभी कुछ समय पहले की घटनाएं लीजिए। एक महिला ने अपने पति को मारकर नीले ड्रम में डाल दिया। खबर वायरल हुई। ट्रोल आर्मी सक्रिय हो गई। "औरतों को आज़ादी मत दो", "देखो नारीवाद का नतीजा", "बर्बाद कर दिया घर-परिवार का ढाँचा"। हर न्यूज़ चैनल पर यही ब्रेकिंग न्यूज़ थी — पति की हत्या, हनीमून की रात, महिला हत्यारी! महिला दानवी!
लेकिन जैसे ही जांच में यह सामने आया कि महिला अकेली नहीं थी, उसके प्रेमी पुरुष ने भी हत्या में सहयोग किया — सन्नाटा छा गया। उस प्रेमी का चेहरा न किसी डिबेट में दिखा, न किसी अख़बार में।
"उंगली उठी नारी पर" — पुरुष तो बस पास खड़ा था!
पुरुष कह रहा है, "मैं तो बस साथ था, मारने का काम उसने किया।"
और समाज कह रहा है, "सच में कितनी चालाक है ये नारी!"
यह कैसा न्याय है जहां अपराध की साझेदारी में पुरुष 'मायूस प्रेमी' कहलाता है और महिला 'खूंखार हत्यारिन'? क्यों हर अपराध में पुरुष ‘बहकाया हुआ’ और महिला ‘बहकाने वाली’ बन जाती है?
क्यों हर आत्मनिर्भर स्त्री को "घर तोड़ने वाली", "संस्कारविहीन", "तेज़-तर्रार" जैसे तमगों से नवाज़ा जाता है? क्या आज़ादी मांगी नहीं जाती, छीनी जाती है?
"मंथरा और सूर्पनखा" की बहनें कहाँ नहीं हैं?
समाज के कुछ ठेकेदार कहते हैं — "मंथरा, केकैयी, सूर्पनखा सब औरतें थीं!"
हाँ भाई, पर राम, रावण, कंस, दुर्योधन, शकुनि सब पुरुष भी तो थे!
इतिहास में अगर कुचक्र की नारी कथाएं हैं तो पौरुष के पाखंडी किस्से भी हैं। पर फ़र्क देखिए — पुरुषों की चालाकी ‘रणनीति’ कहलाती है, और महिलाओं की होशियारी ‘चाल’।
व्यंग्य में छुपी सच्चाई: 'फेमिनिज़्म' नहीं, 'फेयरनिज़्म' चाहिए
आज कोई भी स्त्री अगर अपने अधिकार की बात करती है, तो उसे ‘फेमिनिस्ट’ कहकर बदनाम किया जाता है। जैसे उसने कोई परमाणु बम बना लिया हो। सवाल पूछती है तो ‘डायन’ की श्रेणी में आ जाती है।
जब कोई महिला अपने उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बोलती है, तो पहला सवाल यही होता है — "उसने क्या किया होगा?"
जब कोई पुरुष उत्पीड़न का आरोप लगाता है, तो कहा जाता है — "बेचारा, मर्द होकर सह रहा है!"
क्या मर्द रो नहीं सकता?
क्या औरत दोषी नहीं हो सकती?
पर क्या सिर्फ औरत ही दोषी हो?
'नारी' पर बने चुटकुलों से भरे ज़माने
आजकल सोशल मीडिया पर 'बीवी जोक्स' का दौर है —
“बीवी से डरो, क्योंकि शेर भी घर आकर चुप हो जाता है।”
“एक बार पति बीवी के कहने से जिंदा बच गया — क्योंकि वो खामोश रहा।”
वाह! हँसी में लपेटकर औरत को शेरनी बना दिया — पर वही औरत जब वाकई दहाड़ती है, तो सिस्टम के कान खड़े हो जाते हैं!
एक ही बात बार-बार — "औरतें बदल गई हैं, संस्कार नहीं रहे!"
पर कोई ये नहीं कहता — "पुरुषों ने बदला है क्या?"
संस्कार क्या सिर्फ स्त्री की ज़िम्मेदारी है?
'पुरुष' का पलड़ा हमेशा भारी क्यों?
कोर्ट में भी जब कोई महिला किसी पुरुष पर केस करती है, तो उससे 100 सवाल पूछे जाते हैं — "सबूत है?", "इतनी देर से क्यों बोला?", "तुमने शादी क्यों की थी?"
और जब पुरुष केस करता है — "कितना सहा होगा बेचारे ने!"
अरे, इंसाफ़ तो इंसाफ़ होता है, उसमें सहानुभूति की तौल क्यों?
व्यंग्य नहीं, आईना है यह लेख
यह लेख किसी पुरुष के ख़िलाफ़ नहीं है। यह उन पुरुषों के ख़िलाफ़ भी नहीं है जो बराबरी चाहते हैं, जो नारी को सम्मान देते हैं। यह लेख उस सोच के विरुद्ध है जो नारी को या तो देवी बना देती है या डायन। बीच में इंसान मानने की जहमत ही नहीं उठाती।
यह लेख उस मानसिकता पर करारा तमाचा है जो हर महिला को 'संभावित षड्यंत्रकारिणी' मानती है, और हर पुरुष को 'निष्पाप भोला बलिदानी'।
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अंत में — दो टूक बात
अगर समाज को सच में दो पहियों पर चलना है,
तो दोनों पहियों की हवा बराबर होनी चाहिए।
अगर महिला की स्वतंत्रता आपको खतरा लगती है,
तो शायद आपकी सत्ता झूठे आधार पर टिकी थी।
और अगर किसी अपराध में दोनों दोषी हैं,
तो दोनों पर ही उंगली उठनी चाहिए — सिर्फ नारी पर नहीं।
वरना ये साइकिल एक ही पहिए पर चलती रहेगी —
घिसटती हुई, लुड़कती हुई, पर कभी मंज़िल तक नहीं पहुंचेगी।
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"नारी अगर माँ है तो शक्ति भी है,
पर शक्ति को हमेशा 'नरेंद्र' ही क्यों चाहिए?
कभी 'नारी' भी अकेले गरज सकती है —
और यही बात समाज के कानों में अक्सर सीटी बनकर बजती है।"
-Anita Gahlawat
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