बरसों बाद, फिर भी सच्चा अहसास
कुछ रिश्ते वक्त की मार नहीं झेलते — वे उम्र, दूरी और परिस्थितियों की हर आँधी में ज्यों के त्यों खड़े रहते हैं। वे न वादों से बंधते हैं, न परिभाषाओं में समाते हैं। बस एक बार मन के किसी कोने में जगह बना लेते हैं और फिर ज़िंदगी चाहे जितनी बदल जाए, उनका एहसास वहीं ठहरा रहता है। यह कहानी भी ऐसे ही एक रिश्ते की है — जो स्कूल की आख़िरी बेंच पर शुरू हुआ और बरसों बाद बच्चों की मासूम हंसी में फिर से लौट आया।
कहानी - "बरसों बाद, फिर भी सच्चा अहसास"
Written by Anita Gahlawat
सन् 1999 की पहली वर्षा थी। रुद्रपुर के सरकारी इंटर कॉलेज की खिड़कियों से मिट्टी की भीनी महक और बूंदों की सरसराहट भीतर तक उतर रही थी। ग्यारहवीं की कक्षा में बच्चों की फुसफुसाहट और ब्लैकबोर्ड पर चलती खड़िया की खरखराहट के बीच दरवाज़ा धीरे से खुला। भीतर आई एक लड़की — सफ़ेद-नीली वर्दी में, भीगे केशों से टपकते मोती जैसे जलकण, आंखों में हल्की-सी झिझक। मास्टर जी ने परिचय कराया — “ये प्रीति हैं, नैनीताल से आई हैं।” और उसे आख़िरी बेंच पर बैठने का इशारा किया — ठीक सूरज के पास।
सूरज ने किताब से नज़र उठाई, बस एक पल उसे देखा और फिर पन्नों में खो गया। वह क्षण अल्प था, पर अनजाने ही दोनों के मन में एक लकीर खींच गया — एक ऐसी लकीर जो शब्दों से नहीं, बस नजरों की नमी से बनी थी।
सूरज शांत स्वभाव का, मानो झील की स्थिर सतह — गहरी, पर भीतर अनकही लहरें। प्रीति चंचल थी, किन्तु सूरज के पास आते ही जैसे शब्द बिखर जाते। कभी वह उसके प्रैक्टिकल की पेंसिल ठीक कर देता, कभी नोटबुक में छूट गई तारीख भर देता। प्रीति उसे चिढ़ाती — “तुम बोलते क्यों नहीं?” और सूरज हल्की मुस्कान में जवाब दे देता, मानो कह रहा हो — कुछ बातें बोली जाएं तो अपना जादू खो देती हैं।
त्योहारों में, खेलकूद के दिनों में, बाकी सब हंसी-ठिठोली में डूबे रहते, और सूरज चुपचाप पानी का गिलास उसके लिए किनारे रख देता। एक होली में, जब प्रीति की चुन्नी पर गुलाबी रंग की हल्की-सी रेखा रह गई थी, उसे किसी ने नहीं देखा… सिवाय उसके।
बारहवीं का आख़िरी दिन आया। सब दोस्त ऑटोग्राफ बुक में स्मृतियां संजो रहे थे। प्रीति ने अपनी बुक सूरज को दी। उसने कुछ पल तक पन्नों को देखा, फिर बस लिखा — “पढ़ाई जारी रखना।” न कोई पता, न कोई फ़ोन नंबर। बस एक संकोची मुस्कान और आंखों में कुछ ऐसा, जो कागज़ पर उतर ही नहीं सकता था। उसी साल प्रीति का परिवार देहरादून चला गया और सूरज हरिद्वार। ज़िंदगी आगे बढ़ गई, पर वह आख़िरी बेंच का पन्ना मन में खुला रह गया।
साल 2025। प्रीति अपने बेटे आरव को इंटर-स्कूल क्विज़ प्रतियोगिता में लेकर आई थी। बच्चों की गूंज और उत्साह में वह भी खोई थी, तभी एंकर ने कहा — “टीम बी के साथ उनके अभिभावक भी मंच पर आएंगे।” भीड़ में से एक व्यक्ति उठा — सादी शर्ट, कनपटियों पर सफ़ेदी, आंखों में वही शांत गहराई। प्रीति की सांस थम गई। क्विज़ के बाद आरव दौड़ते हुए आया — “मम्मी, ये विवान के पापा हैं… सूरज अंकल!”
दोनों आमने-सामने खड़े थे। सूरज की मुस्कान में बरसों का ठहराव था — “आख़िरी बेंच वाली प्रीति…?” प्रीति हंसी, पर आंखें भीग गईं — “और तुम… वो लड़का जो चुप रहकर भी सब कह देता था।”
बच्चे मैदान में आगे दौड़ गए, और वो दोनों खामोशी में खड़े रहे — जैसे बरसों पुराना समय अपने आप लौट आया हो। कोई शिकवा नहीं, कोई प्रश्न नहीं… बस एक निस्पंद एहसास कि कुछ रिश्ते समय से भी लंबे होते हैं।
प्रीति ने जाते-जाते कहा — “कुछ कहानियां कभी लिखी नहीं जातीं, लेकिन दिल उन्हें उम्र भर याद रखता है।” सूरज ने चुपचाप सिर झुका दिया। उनके बच्चे हंसते-खेलते साथ चल पड़े… और वो दोनों एक-दूसरे को देखते रहे, जैसे आख़िरी बेंच की कहानी अंततः पूरी हो गई हो।
क्योंकि कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता, पर जब भी मिलते हैं, ईमानदारी, सम्मान और भरोसे के लायक होते हैं। प्रीति और सूरज को अब बच्चों की दोस्ती पर कोई संदेह नहीं था — उन्हें लगा, अच्छे रिश्तों के बच्चे भी अच्छे और सच्चे होते हैं, और शायद, यही उस आख़िरी बेंच पर बोया गया सबसे पवित्र बीज था — जो बरसों बाद भी, सच्चे अहसास की तरह हरा-भरा खड़ा था।
ज़िंदगी हमें बार-बार सिखाती है कि हर रिश्ता नाम, वचन या औपचारिक पहचान का मोहताज नहीं होता। कुछ रिश्ते बस अपने अस्तित्व से ही जीवन को कोमल बना देते हैं। वे न किसी उम्मीद में जीते हैं, न किसी हिसाब-किताब में बंधते हैं। समय, दूरी और परिस्थितियाँ उन्हें बदल नहीं पातीं, क्योंकि उनकी जड़ें मन की गहराइयों में होती हैं।
प्रीति और सूरज की कहानी हमें याद दिलाती है कि सच्चा संबंध वह है, जो चुपचाप हमारे भीतर बसता है — और जब बरसों बाद लौटता है, तो किसी पुराने गीत की तरह… जिसमें शब्द भले धुंधले हों, पर सुर अब भी उतने ही मीठे हों।
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