दहेज दहन - दहेज पर हिंदी कविता

 

दहेज सिर्फ़ लेन-देन का मसला नहीं है, यह एक ऐसी सामाजिक बीमारी है जिसने अनगिनत बेटियों की ज़िंदगी छीन ली।

आज भी समाज में “वर” को बिकाऊ सामान की तरह पेश किया जाता है और “वधू” को जलाकर राख कर दिया जाता है।


दहेज — यह शब्द सुनते ही आँखों के सामने कैसी तस्वीर उभरती है?

सजी-धजी बारात, चमकते कपड़े, ढोल-नगाड़े और बीच में खड़ा एक “वर”, जो खुद को इतना महान समझता है कि उसके नाम पर लाखों रुपये, गाड़ियाँ, गहने और उपहार माँगे जाएँ। यही समाज की विडंबना है। शादी जैसी पवित्र परंपरा, जिसे दो आत्माओं का पवित्र मिलन कहा जाता है, आज एक सौदे में बदल चुकी है।


हम सब जानते हैं कि भारत में हर साल हज़ारों बेटियाँ दहेज की भेंट चढ़ जाती हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, औसतन हर रोज़ 20 से 22 दहेज हत्याएँ होती हैं। यानी हर घंटे किसी न किसी को उसकी ससुराल की आग में झोंक दिया जाता है। यह सिर्फ़ एक आँकड़ा नहीं, बल्कि हर आँकड़े के पीछे एक चीख़, एक माँ-बाप का टूटा हुआ दिल और एक परिवार का बिखरा हुआ सपना है।


आज भी बेटे को “वृद्धावस्था का सहारा” और बेटी को “बोझ” मानने की मानसिकता जीवित है। यही मानसिकता दहेज जैसी कुरीति को ज़िंदा रखती है।

यह कविता उन सभी दहेजखोरों के मुँह पर करारा तमाचा है, जो अपनी मर्दानगी को गाड़ियों, मकानों और पैसों में तौलते हैं। इस कविता में तंज भी है, आँसू भी हैं और समाज को झकझोरने वाला सच भी।





दहेज पर कविता



 उसने अपनी पत्नी को जला दिया,

सिर्फ़ इसलिए…

क्योंकि बाप ने दहेज में

गाड़ी नहीं दी थी,

और माँ ने बेटी को पढ़ा-लिखा कर

सिर्फ़ इंसान बनाया था।



जलते घर के धुएँ में

लिपटी चीख़ें,

अब तक आसमान से पूछ रही हैं —

“किसी बेटी की कीमत

महंगी कार से सस्ती क्यों है?”



कानून की मोटी किताबें

अदालत की मेज़ पर पड़ी रह गईं,

पर लड़की की चिता

जलने से पहले ही

उसके सपनों को भस्म कर गई।



जिसने कभी लाल जोड़े में

सपनों का घर देखा था,

वो दहेज की आग में

लाल राख बन गई।



सवाल अब भी वही है—

कब तक बिकेगी बेटियाँ?

कब तक रेंगती रहेगी

रिश्तों की यह गंदी मंडी?



अब और नहीं,

हर माँ-बाप को कसम हो —

बेटी का दहेज नहीं,

उसकी शिक्षा और सम्मान

उसका सबसे बड़ा धन होगा।



अब वक्त है,

बेटियों की आग में

सिर्फ़ उनके सपने न जलें,

बल्कि दहेजखोरों की सोच

राख हो जाए।



अब बेटियाँ बिकें नहीं, 

दहेज़ की आग में झुलसें नहीं,  

हर माँ की गोद सूनी हो, 

ऐसा दृश्य दिखे नहीं।  



समाज अगर सोया रहा तो 

अपराध बढ़ता जाएगा,  

दहेज़ की ये काली छाया 

हर घर को डस जाएगा।  



आओ मिलकर प्रण करें, 

अब आवाज़ उठाएँगे,  

दहेज़ के इस राक्षस को 

जड़ से ही मिटाएँगे।  



न बेटा बिकेगा अब, 

न बेटी जलाई जाएगी,  

नई सोच की किरणों से ही,

 दुनिया जगमगाएगी।



-Anita Gahlawat 




यह कविता केवल एक बेटी की नहीं, हर उस माँ-बाप की आवाज़ है जो बेटियों को इंसान समझते हैं, सौदा नहीं।

दहेज सिर्फ़ अपराध नहीं, यह कायरता है।

अगर सचमुच हम समाज को बदलना चाहते हैं तो हर माँ-बाप को संकल्प लेना होगा कि –

बेटी की शादी दहेज से नहीं, शिक्षा और सम्मान से होगी।

जब तक दहेजखोरों को समाज से बहिष्कृत नहीं किया जाएगा, तब तक यह आग बुझने वाली नहीं।

यह कविता केवल एक बेटी की चीख नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए आईना है।

दहेज केवल परिवार को तोड़ता नहीं, बल्कि इंसानियत को भी शर्मसार करता है।

आज ज़रूरत है कि हम सब मिलकर इस कुप्रथा के खिलाफ खड़े हों।


बेटियों को बराबरी का सम्मान मिले।


दहेज मांगने वालों को कठोर दंड मिले।


और सबसे ज़रूरी, समाज अपनी मानसिकता बदले।

जब तक लोग बेटियों को बोझ और दहेज को धरोहर मानते रहेंगे, तब तक हर साल हजारों मासूम जिंदगियाँ यूँ ही जलती रहेंगी।

आओ मिलकर संकल्प लें –

“न दहेज लेंगे, न देंगे; बेटी को बोझ नहीं, वरदान मानेंगे।”



अनिता गहलावत,“बेटियों को जलाना बंद करो, 

अपनी सोच को जलाओ।

यही समाज की असली मुक्ति है।”



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