वही दिन आज भी - सच्ची कहानी
विडंबना देखिए—आज के बच्चे लव-मैरिज के नाम पर घर से भाग खड़े होते हैं, माँ-बाप पुलिस में गुमशुदगी या किडनैपिंग की रिपोर्ट लिखवाते हैं और कुछ ही दिनों बाद वही बच्चे दामाद या बहू बनकर घर लौट आते हैं। पर एक दौर की मोहब्बत… चुपचाप सहती रही, निभती रही, और ज़िम्मेदारियों के बीच कहीं दब भी गई।
शीनु और दीपक की मोहब्बत प्यार की मिसाल है , प्रेम अगर सच्चा हो, तो वह उम्र, दूरी, शादी और जिम्मेदारियों के बोझ के बावजूद भी अमर रहता है।
आज जब मैं उस दौर को याद करती हूँ, तो लगता है—समय कितना भी बदल जाए, मगर सच्ची मोहब्बत अपने निशान पीछे छोड़ ही जाती है। 'वही दिन आज भी 'एक सच्ची कहानी है जो सामाजिक बंधनों से बाहर नहीं निकल पाई ,लेकिन सामाजिक रस्मों को आजकल के बच्चों की तरह तावं पर भी नहीं रखा ।
Writer -Anita Gahlawat
कहानी शीर्षक - वही दिन आज भी…
बात है सन 2005 की। जयपुर के आर.वी.टी.आई. हॉस्टल की गलियों में हमारी हँसी-ठिठोली गूँजती थी। उन दिनों मैं और शीनु गोयल—रूममेट, क्लासमेट और धीरे-धीरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी एक दोस्त—दिन-रात साथ रहते थे। उम्र में वह मुझसे पाँच-छह साल बड़ी थी, मगर न जाने क्यों उसके साथ रहते हुए यह अंतर कभी महसूस ही नहीं हुआ। हमने डेढ़ साल तक कंप्यूटर कोर्स साथ किया, और उसी दौरान मैंने उसकी आँखों में छुपा हुआ एक राज़ देखा—एक अनकही मोहब्बत, जो किसी दीपक नाम के लड़के के लिए थी।
शीनु के पास एक पुरानी-सी डायरी थी। पुराने कवर से झाँकती हुई यादों की पीली पड़ चुकी परतें। वह अक्सर उसे अलमारी के कोनों में छुपाकर रखती, ताकि घर या हॉस्टल में किसी की नज़र न पड़े। एक दिन मैंने जिज्ञासा से उसके पन्नों में झाँका तो उनमें रंग-बिरंगे सूखे फूल दबे मिले। शीनु मुस्कुराई और बोली—
“ये सब दीपक ने मुझे दिए थे।”
दीपक, जो उससे एक साल छोटा था और जयपुर में ही इंजीनियरिंग पढ़ रहा था। उसकी आँखों में उस समय जो चमक थी, उससे साफ़ समझ आ गया कि दीपक उसके लिए क्या मायने रखता है।
वह माउंट आबू घूमने गई थी दीपक के साथ। वहाँ की वादियों से तोड़े फूल उसने डायरी के पन्नों में सहेज लिए थे। हर रविवार वह हॉस्टल से बाहर जाने के लिए परिवार से मिलने का बहाना बनाती, लेकिन असल में कैफ़े में दीपक से मिलने जाती। उसकी बातें सुनकर मैं हैरान होती, मगर कहीं भीतर ही भीतर उस मोहब्बत की सच्चाई और मासूमियत को महसूस भी करती। दीपक का नाम आते ही उसका चेहरा ऐसे खिल उठता था जैसे सावन की पहली बारिश में धरती महक उठती है।
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प्यार की जड़ें खेतड़ी में…
शीनु और दीपक का रिश्ता किसी फ़िल्मी कहानी-सा था। दोनों के पिता खेतड़ी में माइनिंग में काम करते थे। वहीं की गलियों में दोनों की दोस्ती अंकुरित हुई और जवानी की दहलीज़ पर पहुँचते-पहुँचते प्रेम में बदल गई। उम्र के साथ-साथ रिश्ते की गहराई भी बढ़ती गई।
शीनु ने एक बार बताया था कि दीपक के घर वाले एक बार नाराज़ होकर उनके घर तक आ धमके थे। उन्हें यह भ्रम हो गया था कि दीपक उसकी बड़ी बहन के साथ जुड़ा है। तब शीनु बहुत छोटी थी, मगर उन लोगों ने उल्टा-सीधा कह दिया। वह किस्सा सुनाते हुए उसकी आँखों में पुरानी चुभन साफ़ झलकती थी।
कभी-कभी वह शादी का जिक्र करती और अचानक चुप हो जाती। फिर उम्मीद के स्वर में कहती—
“काश, हमारी शादी हो जाती… मगर शायद यह मुमकिन नहीं है।”
मैं उसे समझाती—“जो तुम्हारा पति होगा, वह भी तो तुमसे बहुत प्यार करेगा।”
वह बस मुस्कुरा देती, पर आँखों में छुपी आशंका साफ़ झलक जाती थी।
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समाज की दीवारें
दीपक और शीनु दोनों जानते थे कि उनका रिश्ता आसान नहीं है। जाति की ऊँच-नीच, समाज की बंदिशें और परिवार की इच्छाएँ—ये सब उनके बीच दीवार बनकर खड़ी थीं।
आख़िरकार एक दिन वह क्षण भी आया जब उन्हें कठोर निर्णय लेना पड़ा। दीपक बोला—
“हम एक जाति के नहीं हैं… हमारे परिवार कभी राज़ी नहीं होंगे। मेरे पिताजी खाप पंचायत के प्रधान रहे हैं, जाति को बहुत मानते हैं। हम चाहकर भी इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ा पाएंगे।”
उसके शब्द सुनते ही शीनु की आँखों से आँसू बह निकले, पर उसने दृढ़ स्वर में कहा—
“प्यार हमारे दिलों में रहेगा, लेकिन परिवार की इज़्ज़त भी हमारी ज़िम्मेदारी है।”
और इस तरह दोनों ने अपने-अपने रास्ते चुन लिए। अलग-अलग शादियाँ कर लीं। जीवन आगे बढ़ा—घर, गृहस्थी, बच्चे, जिम्मेदारियाँ… पर दिलों में कहीं एक कोना वही ठहरा रहा।
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स्मृतियों का सिलसिला
कई साल यूँ ही बीत गए। हम सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में उलझ गए। एक दिन मैंने अचानक शीनु से फोन पर पूछा—
“कैसी हो? वो दिन, वो प्यार… क्या सब भूल गई?”
फोन के उस पार हल्की-सी हँसी सुनाई दी। हँसी में एक अजीब-सी कसक थी। उसने धीमे स्वर में कहा—
“वो दिन आज भी हैं… वही प्यार आज भी है। हाँ, वक़्त बदल गया है। अब हम बीवी-बच्चों वाले हैं, घर-गृहस्थी में व्यस्त हैं। लेकिन दिल में जो जगह है, वो कभी नहीं बदली। वह मोहब्बत आज भी वहीं है और हमेशा रहेगी।”
मैंने आगे पूछा—“और पति के साथ…?”
वह बोली—“जैसा तुम कहा करती थी, वैसा ही हुआ। हमें एक-दूसरे से बहुत प्यार है।” वो बहुत अच्छे हैं....
रूककर...
तुम ही कहती थी पुरानी फिल्मों को छोड़ो और नई फिल्में देखो प्यार कई बार हो सकता है।... और हम हंस पड़ी।
फिर मैंने हिचकते हुए पूछा—“और वो डायरी? जिसमें दीपक की यादें बसी थीं?”
कुछ क्षण चुप रहकर उसने कहा—
“जब मैंने शादी का फैसला किया, तो सबसे पहले उसी डायरी का अन्तिम संस्कार किया। वो अगर आज भी होती, तो मेरे वर्तमान को चुभती।” हम बीस -पच्चीस साल पहले पैदा हो गए... अगर बात आज की होती तो ना डायरी जलती ना हम..
उसकी यह स्वीकारोक्ति सुनकर मैं देर तक चुप रही। सच ही तो है—लोग सोचते हैं कि मोहब्बत अगर शादी तक न पहुँचे तो खत्म हो जाती है। मगर सच्चाई यह है कि सच्चा प्यार कभी खत्म नहीं होता, वह बस अपना रूप बदल लेता है।
शीनु की आँखों से झलकती मासूमियत और दीपक का नाम सुनकर उसकी मुस्कान आज भी मेरे दिल को यही कहने पर मजबूर करती है—
“हाँ, वही दिन अब भी है… वही मोहब्बत अब भी है।
एक दिन उसने मुझसे कहा—
“प्यार को पाने से बड़ा होता है, उसे महसूस करना। हमने चाहा, जिया, और आज भी जी रहे हैं। बस अब नाम अलग है, पर एहसास वही है।”
उसकी बात सुनकर लगा कि शायद मोहब्बत का असली रूप वही है—जो बिना किसी चाह के भी बना रहता है।
शीनु और दीपक की कहानी शायद अधूरी है, मगर उसी अधूरेपन में इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती छुपी है। उन्होंने समाज की दीवारों के सामने अपने सपनों को बलिदान कर दिया, लेकिन दिलों का रिश्ता कभी नहीं टूटा।
-Anita Gahlawat ❤️
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मोहब्बत का अमर रिश्ता
आज जब पीछे मुड़कर सोचती हूँ, तो शीनु और दीपक की कहानी जीवन का एक गहरा सबक देती है। समाज की मजबूरियों के आगे उन्होंने अपने रिश्ते को नाम नहीं दिया, लेकिन दिलों में वो रिश्ता आज भी उतना ही जीवित है जितना उस दिन था जब दीपक ने पहली बार उसे फूल दिया था।
मुझे आज भी याद है शीनु की वो डायरी, जिसमें दबे हुए फूल सजे थे। शायद वही फूल उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच थे—सूखकर भी महकते हुए।
शीनु ने अपने पति, बच्चों और गृहस्थी को दिल से सँवारा। दीपक ने भी अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। पर दोनों के दिलों में एक कोना ऐसा है जहाँ समय थम-सा गया है। जहाँ खेतड़ी की गलियाँ, माउंट आबू की सैर, संडे का कैफे और डायरी के पन्नों में दबे फूल जैसे आज भी साँस ले रहे हैं। दोनों भले ही न मिल पाए हों परंतु अपने-अपने जीवनसाथी के साथ बहुत खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।
समाज की बंदिशों ने उन्हें साथ तो नहीं रहने दिया, लेकिन उनके दिलों में वह रिश्ता आज भी जीवित है।
आज के युवाओं के लिए इसमें गहरा सबक है—प्यार जिम्मेदारियों से भागने का नाम नहीं, बल्कि उन्हें निभाते हुए अपने एहसास को संजोने का नाम है।
अगर समाज थोड़ा और संवेदनशील हो, तो शायद आने वाली पीढ़ियाँ मोहब्बत को अधूरा कहने पर मजबूर न हों।”
-Anita Gahlawat
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