शहीद की विरासत- हिंदी कविता
कवयित्री: अनीता गहलावत
"शहादत सिर्फ़ सरहद पर नहीं होती,
वो घर के आँगन में भी साँस लेती है…"
एक सैनिक जब तिरंगे में लिपटकर लौटता है, तो वह केवल अपना जीवन नहीं देता, बल्कि अपने परिवार की पूरी दुनिया बदल देता है।
"शहीद की विरासत" सिर्फ़ सम्मान के शब्दों में नहीं, बल्कि उन अधूरी हँसियों, दबे आँसुओं और रोज़-रोज़ जीते गए साहस में छिपी होती है।
यह कविता अनीता गहलावत की कलम से एक बेटी की आवाज़ है, जिसने अपने पिता को खोकर भी उनकी वीरता को जीना सीखा, और चाहती है कि यह विरासत सिर्फ़ तस्वीरों में नहीं, बल्कि समाज की सोच में भी ज़िंदा रहे।
Title - "शहीद की विरासत"
शहीद हुआ जब मेरा पापा,
छाती पर तिरंगा लहराया था,
गाँव ने सिर झुका लिया,
देश ने मुझको समझाया था।
जब बापू मेरे नहीं लौटे,
तिरंगे में लिपटा तन आया,
गाँव ने कहा — “शहीद हुआ है”,
पर मेरी तो जग ही लुट आया।
चौखट पर जो ठहाके थे,
अब मातम बनके आते हैं,
माँ के आँचल की सिसकियाँ
रोज़ छत तक जाते हैं।
मैं — शहीद की बेटी हूँ,
नाम मिला, सुख कहाँ?
लोग पूछें — “सरकार ने क्या दिया?”
जैसे पिता पेंशन का खाता था वहाँ।
स्कूल में जो साथी थे,
अब फुसफुसा के कहते हैं,
“इनको तो सब मुफ़्त मिलता है” —
जैसे हँसी कोई भीख देते हैं।
मेरे सवालों के उत्तर नहीं,
रातों में चैन नहीं,
देश की रक्षा को जो गया,
उसकी संतान का कोई नहीं?
माँ ने सिर पर हाथ रखा,
पर अपना कांधा खाली था,
हर त्यौहार, हर चिट्ठी
अब बिन पापा के ख़ाली था।
गाँव ने रस्में निभाईं सभी,
शब्द कहे, श्रद्धांजलि दी,
फिर धीरे-धीरे ये नज़रें
सहानुभूति से शक में ढली।
माँ जब राशन लेने जाती,
कहते — “सरकार से सब मिला”,
पर क्या पेट का दर्द और आँसू
कभी बजट में दर्ज हुआ?
बड़ी-बड़ी घोषणाएँ होती हैं,
“शहीद अमर हैं” मंचों पर,
पर उनके बच्चे और माँएँ
रहती हैं प्रश्नचिन्हों के घर।
मीडिया एक दिन दिखाता है,
फिर शांति लौट आती है,
पर उस घर का हर कोना
पिता की कमी दोहराती है।
क्या तस्वीरों में ही रह जाएँ
उनकी वीरता, उनका प्यार?
या संवेदनाओं का दीप बने
एक स्थायी उपहार?
दुनिया से कहो — झुक जाए सिर,
जब शहीद की माँ सामने आए,
सम्मान दो उनके बच्चों को
जो तिरंगे के रंग में नहाए।
ना तानों में जले बचपन उनका,
ना स्कूल में छीने हक़,
हर मंच से आवाज़ उठाओ —
मिले हर अवसर उन्हें, बिना शक।
इज्ज़त दो, तिरंगे जैसी
हर दिन उनके बच्चों को,
मत बनाओ मज़ाक कभी
उनके सच्चे संघर्षों को।
जो आँखें रोज़ राहें तकती,
उन्हें न उपेक्षा से देखो,
जिसने सब कुछ देश को दिया,
उसके परिवार को मत परखो।
कभी वक़्त मिले तो सोचना,
कि जो सरहद पर गया, वो गया,
पर जो पीछे छूटा —
वो रोज़-रोज़ शहीद होता रहा…
आओ समाज, एक बार फिर
इन घरों को अपनाओ तुम,
तिरंगा सिर्फ़ लहराओ नहीं —
शहीदों की विरासत को गले लगाओ तुम।
याद रखो - उनके सपनों को जीना,
ही सच्ची श्रद्धांजलि है,
हर बच्चे की मुस्कान में
उनके पिता की जीत बसती है।
- Anita Gahlawat
Bhiwani, Haryana
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