शहीद की विरासत: बेटी – करुणा की एक जीवंत कथा

 

शीर्षक- "शहीद की विरासत: बेटी – करुणा की एक जीवंत कथा"

Written by Anita Gahlawat 

जब कोई सैनिक युद्धभूमि में शहीद होता है, तो देश उसे सलामी देता है, तिरंगा उसकी छाती पर गर्व से लहराता है और हर आँख श्रद्धा से झुक जाती है। लेकिन उस तिरंगे की तहों में एक न दिखाई देने वाला शोक होता है — वो शोक, जो उसके पीछे छूटे परिवार की रग-रग में बस जाता है।


यह कहानी है एक ऐसी ही बेटी की…

जिसने अपने पिता को देश के लिए खोया — एक वीरगति प्राप्त सैनिक की बेटी होने का गर्व उसके जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा बन गया। समाज ने उसके हिस्से में सम्मान नहीं, संदेह और तिरस्कार लिखा। रिश्तों ने उसे अपनाने की जगह उपेक्षा दी। जीवनभर वह "शहीद की विरासत" कहलाने के बावजूद अपने अस्तित्व के लिए ही संघर्ष करती रही।


यह केवल एक करुणा-कथा नहीं है — यह एक ऐसी जीवित दस्तावेज़ है, जिसमें एक बेटी ने आँसुओं में इतिहास लिखा, चुप्पियों में प्रतिरोध जिया और अपमान की राख से अपनी पहचान को हर रोज़ नया आकार दिया।


"शहीद की विरासत: बेटी – करुणा की एक जीवित कथा"

एक ऐसी सच्चाई है, जिसे पढ़ते हुए आपका हृदय भीग जाएगा, आत्मा काँप उठेगी — और शायद आप सोचने को मजबूर हो जाएंगे कि देश के लिए मरने वालों की संतानों को जीने का अधिकार क्यों नहीं मिलता…?




रत्ना — एक शहीद की बेटी 


गर्मी का मौसम था। गाँव की धूप कुछ ज्यादा ही चुभती है, खासकर जब समय और समाज दोनों आँखों में धूल झोंकते हों। मैं अपने पैतृक गाँव गई थी—काफी दिनों बाद। वहाँ की मिट्टी, वहाँ के लोग, अब भी वैसे ही थे, परंतु वक्त की मार ने चेहरे और किस्से दोनों बदल दिए थे।


मुझे थ्रेडिंग करवानी थी, और बड़ी मुश्किल से एक ब्यूटी पार्लर मिला। वह भी एक छोटे से जर्जर से मकान में, जिसमें एक ही कमरा था—एक ओर किचन और दूसरी ओर काम की छोटी सी जगह। उस पार्लर को चलाने वाली एक औरत थी, उम्र लगभग 40-45 के बीच, पर चेहरा अब भी सुंदरता की गवाही दे रहा था। गाँवों में गांव की बेटी चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसे 'लड़की' ही कहा जाता है। लोग उस लड़की की बात करते थे, औरतों की भीड़ में जब उसका नाम आता, तो फुसफुसाहटें शुरू हो जातीं—“बदचलन है”, “तेज तर्रार है”, “शरीफ कभी नहीं रही", "पति छोङकर दूसरा ब्याह रचाया है"। 


मैं वहाँ पहुँची तो उसने बिना सवाल-जवाब के मुझे बैठाया, और थ्रेडिंग करने लगी। उस वक्त वहाँ एक छोटी सी बच्ची खेल रही थी—ढाई-तीन साल की। वह लड़की बहुत चुप थी, लेकिन उसकी आँखों में एक गहरी खामोशी थी जो कुछ कह रही थी।


थ्रेडिंग के बीच उसने मुझसे पूछा, “तू गांव में किसकी बेटी है?” मैंने अपने पिता का नाम बताया, और कहा कि मैं इसी गाँव की हूँ। उसके चेहरे पर एक झलक खुशी की आई, “अच्छा! तुम्हारे पिताजी आर्मी में राज रायफल में थे ना? मुझे जितना याद है मेरे दादा ने एक बार बताया था आपके पापा के बारे में, मैं आपके परिवार को अच्छे से जानती हूं, उसी यूनिट में मेरे पापा भी थे।”


उसने आगे कहा शायद तुम्हारे पापा के पास मेरे पिताजी की कोई फोटो हो ?

"बातों-बातों में मुझे भी एक पुराना किस्सा याद आ गया। मैंने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “शायद मेरी दादी ने भी गाँव के किसी शहीद को लेकर एक बार कुछ कहा था… जब मेरे पापा पंजाब के फाजिल्का में पोस्टेड थे, हम भी दादी सहित वहाँ आर्मी रेज़िंग डे पर गए थे। शहीदों को सब सम्मानित कर रहे थे, तभी वहाँ कई तस्वीरें लगी थीं। दादी ने उनमें से किसी एक तस्वीर की ओर इशारा किया था… शायद वही आपके पिताजी थे।” मेरी दादी ने उस तस्वीर को काफी देर तक निहारा था… मैं तब छोटी थी, इसलिए तस्वीरों में दिलचस्पी नहीं थी।"


वह कुछ पल के लिए चुप रही, फिर बोली, “मेरा नाम रत्ना है। मैं वो अभागिन बेटी हूं जिसका पिता मेरे जन्म से ठीक छह दिन पहले ही शहीद हो गये थे।”


मैंने उसकी आंखों में झांका, और वहाँ मुझे एक समंदर दिखा—दर्द, उपेक्षा और खोए हुए वर्षों का समंदर।


रत्ना ने कहना शुरू किया, “मेरी मां पिता की शहादत की खबर सुनते ही सदमे में कुएं में कूदकर मर गई। मैं छह दिन की थी। माँ भी मेरी दुश्मन निकली। मुझे इस दुनिया में अकेला छोड़ गई।"


"दादा-दादी ने पाला, पर चाचा-ताऊ ने मौका देखकर मेरे खेत हड़प लिए। तब मुझे कुछ समझ नहीं था। जब तक समझ आई, ज़मीन हाथ से निकल चुकी थी। मुझे कुछ नहीं मिला, बस यह जर्जर सा मकान रह गया। जब तलाक के बाद लौटकर आई तो यहीं आ गई।”


उसने हल्की सी हँसी के साथ कहा, “शहीद की बेटी थी पर कभी वो दर्जा नहीं मिला। ना कोई सम्मान, ना कोई सहारा। बस कागजों में शहीद की बेटी रही।”


“मेरे पास आज तक अपने पापा की एक भी तस्वीर नहीं है। मां होती तो शायद संभाल कर रखती। किसी ने कभी मुझसे नहीं कहा कि चलो, तुम्हारे पापा की फोटो दिखाते हैं। मैंने बस उनकी यादों को ही खुद से गढ़ लिया है।” शाय़द किसी ने उनकी फोटो संभाल कर रखने की जरूरत नहीं समझी होगी।


“मुझे 18 साल तक पिता के शहादत के नाम पर भत्ता मिला, पर मैं खुद कभी उसका लाभ नहीं उठा सकी। चाचा-ताऊ ही सब ले लेते थे। मेरे ऊपर खर्च शायद कभी हुआ हो, मुझे नहीं लगता।”


"12वीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ाई करवाई, फिर शादी कर दी। पति का नाम था आज़ाद। पास के ही गांव में शादी हुई। शुरू में सब ठीक था, पर मैं थोड़ी फ्रेंक थी—खुलकर बोलने वाली, अकेले बाहर निकलने वाली। यह बात ससुराल वालों को रास नहीं आई।”


“पति आर्मी में था। छुट्टियों में आता तो दो-चार दिन ठीक रहता, फिर बहस और झगड़े होने लगते। मेरे ऊपर हमेशा शक किया जाता। घर का माहौल बिगड़ गया।”


"ससुराल में, गांव में ही नाते में जेठ का बेटा कमल, जो उम्र में मेरे पति के बराबर था, अक्सर हमारे घर आता-जाता था। वह मेरे पति का मित्र भी था। जब वह आता, तो उससे मेरी कभी-कभार सामान्य बातचीत हो जाती थी। जब हमारे बीच पति-पत्नी का झगड़ा होता, तो वह बीच-बचाव करने आ जाता और मित्र होने के नाते मेरे पति को स्पष्ट शब्दों में कुछ कह देता। लेकिन एक दिन, उसी की बात सुनकर मेरे पति आज़ाद ने मेरे चरित्र पर उंगली उठा दी — वह भी कमल को लेकर।"

"मैं स्तब्ध रह गई। मेरे चरित्र पर कालिख मेरे अपने पति ने ही पोत दी थी… फिर समाज ने भी वही किया।"


“आज़ाद ने मुझ पर हाथ उठाया और घर से निकाल दिया। मैं थक चुकी थी। तीन बच्चों की माँ थी, लेकिन उन्हें भारी मन से वहीं छोड़ आई, क्योंकि मुझे यह विश्वास था कि मेरा पति अपने माता-पिता की इकलौती संतान है और ससुराल वाले बच्चों से बहुत प्यार करते हैं। अब मुझे अपने लिए जीना था। मैंने तलाक़ ले लिया और पास के कस्बे में जाकर एक ब्यूटी पार्लर खोल लिया।" 


"अब कमल मेरी ज़िंदगी में आया। उसे मेरी स्थिति पर दया आई थी और वह धीरे-धीरे करीब आता चला गया। ऐसा नहीं था कि उसने आज़ाद को समझाने की कोशिश नहीं की, परंतु आज़ाद ने उसे भी विश्वासघाती करार दे दिया। कमल रोज़ आता और मेरा हाल-चाल पूछता। उसके चेहरे पर एक झिझक भी थी, वह झूठी कालिख जो समाज ने हमारे चरित्र पर पोती थी, उसे विचलित कर रही थी। कमल ने अभी तक शादी नहीं की थी। पहले जो थोड़ी-बहुत बातचीत होती थी, वह अब बढ़ने लगी थी। अब वह संवाद धीरे-धीरे प्यार में बदलने लगा था। शायद समाज के लगाए गए आरोप ही हमें करीब ले आए। हम सच में एक-दूसरे को समझने लगे थे।"


“हमने शादी कर ली, और एक बेटी हुई। वह बच्ची ही अब मेरा सब कुछ है।”


मैंने धीरे से पूछा, “कमल कहां है?”


"उसकी आँखों में एक बार फिर नमी तैर गई।

“वह अब जेल में है। जब हमने शादी कर ली, तो गाँव में हमें ट्रोल किया जाने लगा और उसने भी गाँव जाना छोड़ दिया। वह मेरे साथ ही रहने लगा। उसने कुछ भी गलत नहीं किया। पहले गाँव में उसकी परचून की दुकान थी। गाँव छोड़ने के बाद वह पेट्रोल पंप पर काम करने लगा। वहीं पास में एक हत्या हो गई। शक के आधार पर पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया। अब मेरी मदद के लिए कोई आगे नहीं आता। केस लड़ने के लिए पैसे भी नहीं हैं।”


"घरवालों ने भी नाता तोड़ लिया। कहने लगे—‘जब चाची से ब्याह रचाया है, तो अब अंजाम भी खुद ही भुगतो।’"


मैंने पूछा, “तुम्हारे पहले वाले बच्चे… कभी याद आते हैं?”



रत्ना की आँखें भर आईं। बोलीं — “बहुत याद आते हैं। एक बार मिलने गई थी... बेटी अब बड़ी हो गई है। दो बेटे हैं, जो उससे छोटे हैं। लेकिन उन्होंने भी वही भाषा बोलनी शुरू कर दी, जो उनके दादा-दादी और समाज की संकीर्ण सोच ने उन्हें सिखाई थी। उन्होंने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया। और कहने लगे — ‘काश! तुम हमारी माँ न होतीं... तुम तो अब गांव में भाभी बन चुकी हो!’”


वह चुप हो गई, बहुत लंबी चुप्पी... उसकी आंखें भर आई थीं। गले में रुदन अटका था, उससे बोला नहीं जा रहा था।


घर की दीवारों पर सीलन थी, छत से पानी टपकने के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। पर उस घर की मिट्टी में कुछ था—उसके बचपन की महक, दादी के हाथों की छुअन, और उन अधूरे ख्वाबों के निशान, जो कभी पूरे नहीं हो सके।


उस घर में भले ही दरारें थीं, पर यादों की सिलवटें अब भी जीवित थीं। वही आंगन, जहां कभी वह किलकारियाँ भरती थी, आज सूना था, पर उसकी आत्मा वहीं कहीं बसी थी—टूटी छत के नीचे, गीली दीवारों में, और उस उम्मीद में जो अब भी उसकी आंखों में कहीं चमक रही थी।


"मैं उठी, उससे गले लगकर विदा ली। मेरी आंखें भीगी थीं।


यह सिर्फ रत्ना की कहानी नहीं थी... यह उस हर बेटी की कहानी थी, जो अपने पिता की वर्दी पर गर्व तो करती है, लेकिन उसी समाज से हार जाती है, जिसे उसके पिता ने अपनी जान देकर बचाया था।


रत्ना—तू सचमुच एक जीवित शहीद है।


तू रोई नहीं, टूटी नहीं, लेकिन हर दिन एक चुप आंसू बहाती रही... इस उम्मीद में कि शायद कभी तुझे 'शहीद की बेटी' कहकर नहीं, सिर्फ इंसान समझकर गले लगाया जाएगा।


समाज रीति-रिवाज़ तो समझता है, पर किसी के अंतर्मन की चीखें नहीं सुनता।

रत्ना, तू सचमुच एक 'बेटी वीरांगना' है — एक ऐसी नायिका, जो बिना बंदूक उठाए भी एक पूरी लड़ाई अकेले लड़ गई।

Writer - Anita gahlawat



यह कहानी सिर्फ व्यक्तिगत पीड़ा की नहीं, समाज के उस कठोर चेहरे की भी है जो शहीद को तो पूजा करता है, पर उसके पीछे बचे परिवार को भूल जाता है।

यह करुणा की कथा नहीं, सच्चाई की चीख है — एक जीवित दस्तावेज़, जो हर उस शहीद की बेटी का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे दुनिया ने केवल नाम में स्थान दिया, पर जीवन में नहीं।




यह कोई कल्पना नहीं, एक शहीद की बेटी "रत्ना" की सच्ची, जीवित और करुणा से भरी कहानी है — जो आज भी समाज की बेबसी और एक औरत के साहस की मिसाल है।

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