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Showing posts from September, 2025

जीत हार पर उम्दा पंक्तियां

 “जहां जीत सुकून देती है, तो हार सुधार का अवसर।” “जहां जीत संतोष है, तो हार विकास।” “जहां जीत थाम लेती है, तो हार आगे बढ़ा देती है।” “जहां जीत खुशी देती है, तो हार सिखाती है।” “जहां जीत मंज़िल है, तो हार सीख।” सब बातों की एक बात — “जीत संतुष्ट कर देती है, हार खुद की कमियों को  खोजने का अवसर देती है।”  — Anita Gahlawat "कितनी भी शातिर चाल चल ले, हे समय… मुझे यकीन है कि तुम मेरी चौखट पर एक दिन कहानी बनकर लौटोगे।" — Anita Gahlawat विजयदशमी पर्व - दशहरा  दुर्गा मां ने महिषासुर को मारा राम ने मारा रावण को। बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता विजय दशमी पर्व को।। फूँकने के लिए रावण के पुतले बनाये जा रहे हैं कहीं बनाने वाला ही रावण ना हो। माता की पूजा के लिए पंडाल सजते हैं, मेले लगते हैं कहीं सजाने वाला ही महिषासुर ना हो।। अपने अन्दर में विराजित रावण को मारो ना ज़रूरत पड़ेगी जलाने की। महिषासुर जैसा राक्षस मत पालो डर कर किसी नारी को ज़रूरत न होगी त्रिशूल उठाने की।। विजय दशमी पर्व की सभी को हार्दि क बधाई।। - Anita Gahlawat

बच्चों की पढ़ाई, मां-बाप, पड़ोसी और रिश्तेदारों की परेशानी

  हर माँ–बाप का सबसे बड़ा सपना होता है कि उनका बच्चा पढ़ाई में अच्छा करे, अच्छे अंक लाए और जीवन में आगे बढ़े। लेकिन इस सपने के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा माँ–बाप नहीं, बल्कि पड़ोसी और रिश्तेदार बन जाते हैं। माँ–बाप तो चाहकर भी बच्चों के लिए आसान माहौल नहीं बना पाते क्योंकि हर गली–मोहल्ले में बैठे लोग अपनी नसीहतों और तुलना की बोरी लेकर हाजिर रहते हैं। ऊपर से माँ–बाप भी बच्चों से इतनी अपेक्षाएँ करने लग जाते हैं कि हमारा बच्चा क्लास में टॉप करे, पहला नंबर लाए, और हर जगह सबसे आगे निकले। इस दबाव में बच्चे की हालत देखी ही नहीं जाती—सुबह से स्कूल, फिर ट्यूशन, और उसके बाद होमवर्क—उन्हें अपने लिए एक पल का भी समय नहीं मिलता। बच्चों की पढ़ाई, मां-बाप, पड़ोसी और रिश्तेदारों की परेशानी (हास्य–व्यंग्य) लेखिका - अनीता गहलावत  कभी सोचा है कि बच्चों की पढ़ाई और खेल से ज़्यादा मेहनत आखिर किसे करनी पड़ती है? बच्चे को? नहीं…! असली परिश्रम तो माँ–बाप को करना पड़ता है। लेकिन रोड़ा कौन अटकाता है? जी हाँ—पड़ोसी और रिश्तेदार! बच्चा चाहे किताब खोले या बल्ला उठाए, सलाह और तंज़ का ठेका इन्हीं के पास है। ...

अधूरी अंगूठी : एक पुराना किस्सा - एक सच्ची कहानी

  करीब बाईस साल पहले सुरेखा और अजय का रिश्ता तय हुआ था, मगर परिवारों की अनबन ने उसे अधूरा छोड़ दिया। उस दौर की एक छोटी-सी अंगूठी, जो अजय ने सुरेखा को दी थी, बरसों तक उसके दिल में बोझ बनी रही। समय के साथ दोनों की शादियाँ हो गईं, ज़िंदगी आगे बढ़ी, लेकिन किस्मत ने उन्हें दोबारा मिलाया—इस बार उनके जीवनसाथियों के साथ। डिनर की एक शाम ने वर्षों का राज़ खोल दिये.... Title - अधूरी अंगूठी : एक पुराना किस्सा - एक                    सच्ची कहानी  लेखिका - अनीता गहलावत  करीब बाईस साल पहले… सुरेखा और अजय का रिश्ता तय हुआ था। कई दिन तक बात भी चली, परिवारों में उम्मीदें भी जगीं, पर अचानक दोनों परिवारों की अनबन हो गई। छोटी-सी गलतफहमी ने बड़ा रूप ले लिया और रिश्ता टूट गया। तब के दिन अलग थे। न मोबाइल थे, न बातचीत के सहज साधन। फिर भी अजय कॉलेज में सुरेखा से मिलने आया था। उनके बीच ज़्यादा बातचीत नहीं हुई, लेकिन मिलने का वह भाव, वह मासूम धड़कनें… दिल में कहीं गहरे अंकित हो गईं। अजय ने उस दिन सुरेखा को एक छोटी-सी अंगूठी दी थी। सोने की, चमकती हुई।...

सड़कें और समाज: ट्रैफिक में खोती इंसानियत | व्यंग्यात्मक निबंध

Written by Anita Gahlawat  क्या आपने कभी सुबह-सुबह ट्रैफिक में फँसकर ऑफिस पहुँचने की कोशिश की है? या रेड लाइट पर खड़े-खड़े किसी बाइक सवार का बिना रुके हॉर्न बजाते रहना झेला है? अगर हाँ, तो यकीन मानिए, आपने भारत के ट्रैफिक सिस्टम से ज़्यादा, हमारे समाज की सोच की असल तस्वीर देखी है। सड़कें आज सिर्फ सफ़र का रास्ता नहीं रहीं, वे हमारे संयम, सभ्यता और संवेदनाओं के परीक्षा-स्थल बन चुकी हैं। यह लेख एक ऐसा व्यंग्य है जो हमें हँसाता भी है, चौंकाता भी है — और सबसे बढ़कर, सोचने पर मजबूर करता है।  स्पीड ही जिंदगी है? या बस "जिंदगी की ऐसी की तैसी"? सड़कें, ट्रैफिक और हमारा समाज: भागम-भाग में खोता संयम कभी सोचिएगा — आजकल सड़कें सिर्फ चलने की जगह हैं या इंसानी धैर्य के टेस्ट सेंटर? जिस तरह का ट्रैफिक हम रोज़ाना झेलते हैं, लगता है जैसे समाज ने शिष्टाचार को स्टेयरिंग के नीचे दबा दिया है और हॉर्न को संस्कार बना लिया है। लगता है अब गाड़ी चलाना कोई आवश्यकता नहीं, बल्कि "मैं कितनी तेज़ हूँ" का मूविंग विज्ञापन बन गया है। सड़क पर ट्रैफिक हो या ना हो, गाड़ियाँ ऐसे दौड़ती हैं जैसे पिछली सीट...

समाजिक कहानी : “वो लड़कियाँ और मैं”

  हम अक्सर भ्रष्टाचार, राजनीति और विकास की बातें करते हैं, लेकिन कभी इस पर नहीं सोचते कि हमारी नई पीढ़ी किस ओर जा रही है। नई पीढ़ी की बदलती सोच और माता-पिता की जिम्मेदारी पर गहन कहानी—बच्चों को मोबाइल नहीं, संवाद और संस्कार चाहिए। समाजिक कहानी : “वो लड़कियाँ और मैं” लेखिका - अनीता गहलावत  उस दिन मैं हरियाणा रोडवेज की बस से चंडीगढ़ जा रही थी। 152-D हाईवे वाली सीधी बस निकल चुकी थी, इसलिए मुझे रोहतक होकर जाना पड़ा। बस ज़्यादा भरी नहीं थी। मैं पिछली तरफ़ की एक सीट पर आकर बैठ गई और खिड़की से बाहर गुजरते खेत-खलिहान देखने लगी। रोहतक और पानीपत के बीच बस में सात-आठ लड़कियाँ चढ़ीं। उम्र से लग रहा था जैसे 11वीं-12वीं की छात्राएँ हों। वे आकर मेरे ठीक आगे वाली सीटों पर बैठ गईं। किसी ने कानों में लीड लगा रखी थी, कोई मोबाइल पर तस्वीरें देख रही थी, कोई ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी। पूरी बस उनकी खिलखिलाहट से गूंज उठी। मैं पहले तो उनकी मासूमियत देखकर मुस्करा दी, लेकिन जैसे-जैसे उनकी बातें कानों तक पहुँचीं, मन भीतर से चौंक गया। वे सभी धड़ल्ले से अपने-अपने बॉयफ्रेंड्स की बातें कर रही थीं। कोई गर्व से ...

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

 शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की राह भी दिखाते हैं। उनकी प्रेरणा से ही विद्यार्थी अपने सपनों को पंख देते हैं। शिक्षक दिवस का यह अवसर हमें उन सभी गुरुओं को नमन करने का अवसर देता है, जिन्होंने अपने ज्ञान, धैर्य और मार्गदर्शन से हमारी ज़िंदगी को संवार दिया। इस लेख में हम शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ, उद्धरण और भावपूर्ण संदेश साझा कर रहे हैं। ✨ शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ✨ "गुरु वह है, जो जीवन की हर ठोकर को  सीढ़ी में बदलना सिखा दे।" — Anita Gahlawat "गुरु वही है जो अंधकार में दीपक बन जाए, भटकते पथिक को राह दिखा जाए, और अपने ज्ञान से मन के हर कोने को रोशन कर जाए। आप सभी शिक्षकों को मेरा सादर प्रणाम… आपके बिना न शब्दों में मिठास होती, न जीवन में दिशा। आज का दिन आप सभी के नाम — जिन्होंने हमें गढ़ा, संवारा और सँवारा। 🙏 शिक्षक दिवस की अनंत शुभकामनाएँ 🙏 — Anita Gahlawat "सच्चे गुरु का ऋण शब्दों से नहीं, बल्कि अपने सफल जीवन से चुकाया जा सकता है।"  - written by Anita Gahlawat  "गुरु वह है, जिसकी दी हुई सीख हमें मंज़िल तक नहीं, बल्...