बच्चों की पढ़ाई, मां-बाप, पड़ोसी और रिश्तेदारों की परेशानी
हर माँ–बाप का सबसे बड़ा सपना होता है कि उनका बच्चा पढ़ाई में अच्छा करे, अच्छे अंक लाए और जीवन में आगे बढ़े। लेकिन इस सपने के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा माँ–बाप नहीं, बल्कि पड़ोसी और रिश्तेदार बन जाते हैं।
माँ–बाप तो चाहकर भी बच्चों के लिए आसान माहौल नहीं बना पाते क्योंकि हर गली–मोहल्ले में बैठे लोग अपनी नसीहतों और तुलना की बोरी लेकर हाजिर रहते हैं।
ऊपर से माँ–बाप भी बच्चों से इतनी अपेक्षाएँ करने लग जाते हैं कि हमारा बच्चा क्लास में टॉप करे, पहला नंबर लाए, और हर जगह सबसे आगे निकले। इस दबाव में बच्चे की हालत देखी ही नहीं जाती—सुबह से स्कूल, फिर ट्यूशन, और उसके बाद होमवर्क—उन्हें अपने लिए एक पल का भी समय नहीं मिलता।
बच्चों की पढ़ाई, मां-बाप, पड़ोसी और रिश्तेदारों की परेशानी
(हास्य–व्यंग्य)
कभी सोचा है कि बच्चों की पढ़ाई और खेल से ज़्यादा मेहनत आखिर किसे करनी पड़ती है?
बच्चे को?
नहीं…! असली परिश्रम तो माँ–बाप को करना पड़ता है।
लेकिन रोड़ा कौन अटकाता है?
जी हाँ—पड़ोसी और रिश्तेदार!
बच्चा चाहे किताब खोले या बल्ला उठाए, सलाह और तंज़ का ठेका इन्हीं के पास है।
किताबों का आतंक
अगर बच्चा दिन-रात किताबों में घुसा रहे तो पहला तंज़ तैयार—
“अरे! यह तो बस पढ़ता ही रहता है, खेलने जाएगा ही नहीं तो सेहत का क्या होगा? डॉक्टर बनेगा या मरीज?”
और अगर वही बच्चा मैदान में जाकर बैट-गेंद घुमा दे तो माथा ठनक उठता है—
“अरे! हर समय खेल-कूद… पढ़ाई कब करेगा? कहीं बोर्ड परीक्षा में बॉलिंग एकॉनॉमी की जगह ‘गणेश वंदना’ ही न लिख आए।”
यानि बच्चा कुछ भी करे, पड़ोसी–रिश्तेदार का मूड गारंटी से उल्टा ही रहेगा।
पड़ोसी का बच्चा – राष्ट्रीय समस्या
समाज का सबसे बड़ा वाई-फाई कनेक्शन है—पड़ोसी का बच्चा।
आपका बच्चा पढ़ाई में अच्छा है तो पड़ोसी कहेंगे—
“पढ़ाई से क्या होगा? खेलों में भी निपुण होना चाहिए।”
और अगर खेलों में चमक रहा है तो वही पड़ोसी सलाह देंगे—
“जीवन पढ़ाई से बनता है, खेल से नहीं।”
यानि पड़ोसी का बच्चा राष्ट्रीय आदर्श और आपका बच्चा लोकल निकम्मा!
कोचिंग बनाम ट्यूशन की जंग
आजकल बच्चों की ज़िंदगी दो हिस्सों में बंटी है—
आधा स्कूल, आधा कोचिंग।
रिश्तेदारों का हिसाब भी बड़ा मज़ेदार है—
बच्चा स्कूल में टॉप करे = स्कूल अच्छा।
बच्चा खेलों में मेडल लाए = स्कूल बेकार, कोचिंग अच्छी।
और बच्चा दोनों में चूके तो = बच्चा ही फालतू!
परीक्षा का सीजन: घर-घर सीबीआई
जैसे ही परीक्षा पास आती है, रिश्तेदार–पड़ोसी अचानक सीबीआई एजेंट में बदल जाते हैं—
“कितने चैप्टर पूरे कर लिए?”
“गणित की प्रैक्टिस हुई या नहीं?”
“इतिहास के 500 सवाल याद हुए?”
बेचारा बच्चा सोचता है—इतिहास में खुद गांधीजी ने भी आज़ादी के लिए इतना संघर्ष नहीं किया होगा जितना मुझे पास होने के लिए करना पड़ रहा है।
खेल का झंझट
मैदान में बच्चा खेल रहा हो तो रिश्तेदार को तुरंत भविष्य दिखने लगता है—
“ये तो अगला विराट कोहली बनने के चक्कर में अगला गब्बर सिंह ही न बन जाए।”
और पड़ोसी का विश्लेषण झट तैयार—
“खेल से कभी किसी का पेट भरा है क्या? पढ़ाई ही सबकुछ है।”
बच्चे की बेचारगी
बच्चे और मां और भी मजेदार है—
किताब खोले तो तंज़—“थोड़ा खेल भी लिया करो।”
खेल खेले तो तंज़—“पढ़ाई भी कर लो।”
और मोबाइल उठाए तो डबल तंज़—“आजकल के बच्चे बिगड़ गए हैं!”
यानि बच्चे की ज़िंदगी = 24 घंटे टोकाटाकी का डिग्री कोर्स।
माँ–बाप का असली सपना
असल में माता-पिता के सपनों का कॉम्बो पैक कुछ यूँ है—
पढ़ाई में: ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
खेलों में: विराट कोहली
व्यवहार में: संत महात्मा
और तुलना में: पड़ोसी के बच्चे से हर हाल में बेहतर
यानि बच्चा, बच्चा न होकर सुपरमैन का मल्टी-पैक ऑफ़र हो।
सच यह है कि पढ़ाई और खेल दोनों ज़रूरी हैं।
लेकिन समाज, पड़ोसी और रिश्तेदारों की आदत है—बच्चा जिस राह पर चले, उसी पर रोड़ा डालो।
बच्चा डॉक्टर बने तो—“इंजीनियर क्यों नहीं?”
इंजीनियर बने तो—“IAS क्यों नहीं?”
IAS बने तो—“क्रिकेटर होता तो टीवी पर आता।”
यानि बच्चा चाहे कुछ भी कर ले, पड़ोसी–रिश्तेदार की परेशानी स्थायी सरकारी नौकरी की तरह हमेशा बनी रहती है।
तो अगली बार जब आपका बच्चा पढ़ाई करे या खेल खेले, तो पड़ोसी के बच्चे और रिश्तेदार की चिंता छोड़िए और अपने बच्चे को चैन से जीने दीजिए।
वरना बच्चा भी एक दिन कह ही देगा—
“माँ–पापा, असली परीक्षा तो आपकी है, मेरी नहीं!”
अंत में -
😄 तो माँ–बाप से हाथ जोड़कर बस यही कहना चाहिए
“अरे बच्चों पर भरोसा रखो और पड़ोसी–रिश्तेदारों की चिंता छोड़ो। क्योंकि असली परीक्षा बच्चों की नहीं, बल्कि आपकी सहनशीलता की है।”
- written by Anita Gahlawat
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