अधूरी अंगूठी : एक पुराना किस्सा - एक सच्ची कहानी
करीब बाईस साल पहले सुरेखा और अजय का रिश्ता तय हुआ था, मगर परिवारों की अनबन ने उसे अधूरा छोड़ दिया। उस दौर की एक छोटी-सी अंगूठी, जो अजय ने सुरेखा को दी थी, बरसों तक उसके दिल में बोझ बनी रही। समय के साथ दोनों की शादियाँ हो गईं, ज़िंदगी आगे बढ़ी, लेकिन किस्मत ने उन्हें दोबारा मिलाया—इस बार उनके जीवनसाथियों के साथ।
डिनर की एक शाम ने वर्षों का राज़ खोल दिये....
Title - अधूरी अंगूठी : एक पुराना किस्सा - एक सच्ची कहानी
लेखिका - अनीता गहलावत
करीब बाईस साल पहले…
सुरेखा और अजय का रिश्ता तय हुआ था। कई दिन तक बात भी चली, परिवारों में उम्मीदें भी जगीं, पर अचानक दोनों परिवारों की अनबन हो गई। छोटी-सी गलतफहमी ने बड़ा रूप ले लिया और रिश्ता टूट गया।
तब के दिन अलग थे। न मोबाइल थे, न बातचीत के सहज साधन। फिर भी अजय कॉलेज में सुरेखा से मिलने आया था। उनके बीच ज़्यादा बातचीत नहीं हुई, लेकिन मिलने का वह भाव, वह मासूम धड़कनें… दिल में कहीं गहरे अंकित हो गईं।
अजय ने उस दिन सुरेखा को एक छोटी-सी अंगूठी दी थी। सोने की, चमकती हुई। पहली और आख़िरी निशानी।
समय का पहिया घूमता गया। दोनों की शादियाँ अलग-अलग हो गईं। सुरेखा अपने पति राजीव के साथ जीवन में रम गई। अजय भी अपनी पत्नी सीमा के साथ व्यस्त हो गया। जीवन चलता रहा, पर वह अंगूठी और उससे जुड़ी यादें — दोनों के दिलों में कहीं न कहीं बची रह गईं।
राजीव और अजय का संयोग
सालों बाद किस्मत ने एक अजीब खेल खेला।
गुरुग्राम की एक नामी कंपनी में राजीव और अजय दोनों काम करने लगे। न अजय को पता था कि यह वही राजीव है जिसने सुरेखा से शादी की, न राजीव जानता था कि अजय ही कभी सुरेखा का वर बनते-बनते रह गया था।
राजीव का व्यक्तित्व बहुत सहज था। मिलनसार, हँसमुख और व्यवहार में संतुलित। अक्सर सुबह-शाम टहलने जाता, कभी-कभी सुरेखा भी साथ चली जाती।
एक दिन सुरेखा ने दूर से राजीव को एक सहकर्मी से बातें करते देखा। जैसे ही चेहरा साफ़ हुआ, सुरेखा सहम गई — “यह तो… अजय जैसा लग रहा है। नहीं-नहीं, शायद मेरा वहम हो…”
लेकिन अगले ही दिन, जब पार्क में उनकी नज़रें मिलीं, सुरेखा को यक़ीन हो गया — यह वही अजय है।
मन की हलचल
उस रात सुरेखा करवटें बदलती रही। यादें फिर लौट आईं।
वह अंगूठी, सहेलियों की खिलखिलाहट, और अचानक रिश्ते का टूट जाना।
“क्या राजीव को कभी बताना चाहिए था? नहीं… तब डर लगता था। पापा-मम्मी क्या सोचते? शादी के बाद भी चुप रह गई… सबको लगता रहा कि यह अंगूठी कहीं मायके या ससुराल से मिली है। किसी ने कभी पूछा ही नहीं… और मैं भी चुप रही।”
उस छोटे-से गुप्त बोझ ने बरसों तक सुरेखा का मन दबाए रखा।
दूसरी ओर, अजय भी बेचैन था। “क्या यह वही सुरेखा है? वही लड़की, जिसे मैंने पहली बार गिफ्ट दिया था? कभी सीमा को भी नहीं बताया… एक अधूरी बात, जो दिल में ही दबी रह गई।”
निमंत्रण
समय ने दोनों को और नज़दीक ला दिया। राजीव और अजय दोस्त बन गए।
एक दिन अजय ने राजीव से कहा—
“भाई, तुम फैमिली समेत हमारे घर डिनर पर ज़रूर आना।”
राजीव ने हँसकर हामी भर दी।
सुरेखा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। “क्या सीमा जानती होगी? क्या राजीव को पता चलेगा? कहीं सब कुछ बिगड़ न जाए?”
डिनर की शाम
दरवाज़े पर घंटी बजी। सुरेखा ने जैसे ही किवाड़ खटखटाए, सामने अजय की पत्नी सीमा मुस्कुराती हुई बोली—
“आओ सुरेखा…!”
बस, वही पल था जब सुरेखा के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। उसके मन में एक अजीब सा तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। "तो अजय ने सब कुछ बता दिया सीमा को… पर मैंने क्यों राजीव से कभी नहीं कहा? क्यों ये राज़ इतने सालों से दिल में दबाए रखा?" — यह सोचते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया।
सीमा ने अपने स्नेहिल व्यवहार से सुरेखा की झिझक कम करने की कोशिश की और भीतर ले आई। सब लोग एक साथ खाने की मेज़ पर बैठे। माहौल हल्का-फुल्का था, पर सुरेखा का दिल धड़कनों में उलझा हुआ था।
खाने के बीच अचानक अजय हंसकर बोला—
“अरे, कभी हमारी भी बात पक्की हुई थी… पर शायद नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। सही वक्त पर सब टल गया।"
राजीव चौंक गया। उसने हैरानी से सुरेखा की तरफ़ देखा—
“क्या? तुमने तो कभी बताया ही नहीं…”
सुरेखा ने हँसने की कोशिश की, पर उसकी आँखों में हल्की नमी झलक गई। उसने मज़ाक का सहारा लिया—
“अरे, जब मैं कुंवारी थी न… तो कई लड़के मुझे रिश्ते के लिए देखने आते थे। उनमें अजय भी था। लेकिन यह सब तो शादी तय करने की प्रक्रिया का ही हिस्सा होता है।”
उस पर सीमा ने भी मुस्कुराते हुए कहा—
“हाँ, बिल्कुल सही कह रही हो।”
इतना कहकर वह हल्की सी मुस्कुरा दी। मेज़ पर बैठे सब लोग भी हँस पड़े, लेकिन राजीव की नज़रें सुरेखा को टटोल रही थीं। उस हँसी में सुरेखा के मन पर बरसों से जमी बोझिल खामोशी भी पिघल गई। तभी पास बैठे राजीव ने उसका हाथ थाम लिया और अपनी निगाहों से एहसास दिलाया— ‘तुम ही मेरी ज़िंदगी की धड़कन हो।’”
थोड़ी देर बाद सुरेखा बोली—
“एक बात है… अजय ने तब मुझे जो अंगूठी दी थी, मैंने कभी पहनी ही नहीं। न लौटाई, न फेंकी। सोने की थी… संभालकर रखी रही। सोचा था कभी वापस कर दूँगी।”
वातावरण एकदम गंभीर हो गया। तभी सीमा ने सुरेखा का हाथ थाम लिया और बेहद कोमल स्वर में बोली—
“नहीं सुरेखा, उसे मत लौटाओ। वह अंगूठी सिर्फ़ सोने का टुकड़ा नहीं है, बल्कि उस समय की एक निशानी है। चाहे शादी न हुई, पर उस पल में जो सम्मान और स्नेह था, वही अंगूठी उसका प्रतीक है। उसे एक लड़की के सम्मान की तरह ही स्वीकारना चाहिए।”
राजीव भी मुस्कुराया और माहौल हल्का करने के लिए बोला—
“अरे वाह भाई, ये काम तो पहले ही निपटा रखा है, तभी तो सुरेखा को मुझसे कभी अंगूठी की डिमांड नहीं हुई।”
सब लोग हँस पड़े। हँसी में वो बोझिल खामोशी भी घुल गई, जो शुरू से सुरेखा के मन में थी।
अब दोनों परिवारों के बीच का रिश्ता और भी मज़बूत हो गया।
पर दिल के भीतर कहीं गहराई थी जो सुरेखा ने महसूस किया कि लड़कियों के लिए अतीत हमेशा डर का कारण होता है। वे साफ़ होती हैं, पर दाग़ अक्सर उन्हीं पर मढ़े जाते हैं।
उसने पहली बार राहत की साँस ली—
सच बोल देने से रिश्ते और पवित्र हो जाते हैं। छुपाने से डर बनता है, और डर रिश्तों की नींव हिला देता है।
Written by Anita Gahlawat
“सुरेखा की कहानी हर उस औरत की दास्तान है, जिसने अपने मन में किसी राज़, किसी बोझ या किसी अधूरी याद को सालों तक दबा कर रखा। सच यह है कि औरतें ही सबसे पहले अपने रिश्तों की इज़्ज़त बचाने के लिए चुप रहती हैं, डरती हैं कि कहीं उनके बोलने से घर टूट न जाए, दिल आहत न हो जाए।
लेकिन यह कहानी बताती है कि सच्चाई बोल देने से न रिश्ते टूटते हैं और न सम्मान घटता है—बल्कि सच्चाई रिश्तों को और मज़बूत बना देती है।
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