सड़कें और समाज: ट्रैफिक में खोती इंसानियत | व्यंग्यात्मक निबंध
Written by Anita Gahlawat
क्या आपने कभी सुबह-सुबह ट्रैफिक में फँसकर ऑफिस पहुँचने की कोशिश की है?
या रेड लाइट पर खड़े-खड़े किसी बाइक सवार का बिना रुके हॉर्न बजाते रहना झेला है?
अगर हाँ, तो यकीन मानिए, आपने भारत के ट्रैफिक सिस्टम से ज़्यादा, हमारे समाज की सोच की असल तस्वीर देखी है।
सड़कें आज सिर्फ सफ़र का रास्ता नहीं रहीं, वे हमारे संयम, सभ्यता और संवेदनाओं के परीक्षा-स्थल बन चुकी हैं।
यह लेख एक ऐसा व्यंग्य है जो हमें हँसाता भी है, चौंकाता भी है — और सबसे बढ़कर, सोचने पर मजबूर करता है।
स्पीड ही जिंदगी है? या बस "जिंदगी की ऐसी की तैसी"?
सड़कें, ट्रैफिक और हमारा समाज: भागम-भाग में खोता संयम
कभी सोचिएगा — आजकल सड़कें सिर्फ चलने की जगह हैं या इंसानी धैर्य के टेस्ट सेंटर? जिस तरह का ट्रैफिक हम रोज़ाना झेलते हैं, लगता है जैसे समाज ने शिष्टाचार को स्टेयरिंग के नीचे दबा दिया है और हॉर्न को संस्कार बना लिया है।
लगता है अब गाड़ी चलाना कोई आवश्यकता नहीं, बल्कि "मैं कितनी तेज़ हूँ" का मूविंग विज्ञापन बन गया है। सड़क पर ट्रैफिक हो या ना हो, गाड़ियाँ ऐसे दौड़ती हैं जैसे पिछली सीट पर ज़िंदगी बैठी हो, और अगर स्पीड कम हुई तो वही उतर जाएगी।
नई पीढ़ी को जब बाइक मिलती है, तो लगता है जैसे थ्रॉटल घुमाने से ही भारत विश्वगुरु बन जाएगा।
हॉर्न? वो तो जैसे हर समस्या का हल है — सिग्नल बंद है? हॉर्न बजाओ। गाड़ी रुकी है? हॉर्न बजाओ। आगे आदमी है? और ज़ोर से बजाओ, ताकि उसकी आत्मा तक कंप जाए।
सड़क पर टकराते नहीं, "एटीट्यूड" भिड़ते हैं
एक बार दो गाड़ियों की टक्कर देखी — दोनों एक-दूसरे से ऐसे टकराईं जैसे कुश्ती का फाइनल हो। लेकिन असली तमाशा तब शुरू हुआ जब गलती करने वाला ही सबसे ऊँचा सिर उठाकर बोलने लगा — "तुम्हें गाड़ी चलानी आती है?"
लगता है सड़क पर गाड़ी से ज़्यादा "गर्व और गुस्सा" चलता है।
मूल मंत्र यही है:
"गलती मेरी हो या तुम्हारी, चिल्लाना तो मेरा हक़ है!"
रेलवे फाटक = रेस का स्टार्टिंग पॉइंट
रेलवे फाटक खुलते ही लोग ऐसे निकलते हैं जैसे बॉर्डर पार करने जा रहे हों। जो पहले निकला वही असली देशभक्त!
हॉर्न का शोर ऐसा कि लगे किसी म्यूज़िक कॉन्सर्ट में आ गए हैं — बस यहाँ बीट्स की जगह "बीप बीप" और "पा पा" है।
साइकिल वाला? अरे, वो तो जैसे एक्स्ट्रा है इस फिल्म में। अगर वो रास्ता रोके, तो गाली देना और आँख दिखाना हमारा नैतिक अधिकार है।
नियम? वो किस चिड़िया का नाम है?
हेलमेट? "हे भगवान! मेरी हेयरस्टाइल खराब हो जाएगी!"
सीट बेल्ट? "मैं तो बस दो मिनट की दूरी पर जा रहा हूँ!"
सिग्नल? "भाई टाइम नहीं है, लेट हो जाऊँगा वरना..."
लेकिन जैसे ही पुलिस वाला दिखता है — सब अचानक "कानून के सबसे बड़े भक्त" बन जाते हैं। हेलमेट पहन लो, बेल्ट बाँध लो, स्पीड 20 कर लो — क्योंकि अब डर है, नियम का नहीं... चालान का।
समाज का असली चेहरा = ट्रैफिक का आईना
असल में सड़क पर जो हो रहा है, वही समाज में भी है:धैर्य? उसे तो कब का ओवरटेक कर चुके हैं।
दूसरों की परवाह? वो तो बैकव्यू मिरर में भी नहीं दिखती।
गलती? अपनी नहीं, सिर्फ दूसरों की होती है।
इंसानियत? शायद किसी स्पीड ब्रेकर पर गिर गई।
समाधान? या कहें — सुधार की उम्मीद?
संयम सिखाना होगा — वरना अगली पीढ़ी हॉर्न को इंसानी भाषा समझेगी।
कानून पर अमल ज़रूरी है — वरना सड़कें जंग के मैदान बन जाएँगी।
छोटे को छोटा समझना बंद कीजिए — गाड़ी बड़ी है, पर आदमी नहीं।
खुद में बदलाव लाइए — क्योंकि सड़क सबकी है, सिर्फ आपकी नहीं।
निष्कर्ष:
अब सवाल ये नहीं है कि हम कहाँ जा रहे हैं, सवाल ये है कि किस हाल में पहुँचेंगे?
सड़कें अब सिर्फ रास्ता नहीं, हमारी सोच का एक्स-रे बन चुकी हैं।
तो अगली बार जब हॉर्न पर हाथ जाए, सोचिए —
आप गाड़ी चला रहे हैं या अपना संयम गवाँ रहे हैं?
क्योंकि अगर इसी रफ्तार से हम भागते रहे,
तो कहीं ऐसा ना हो कि गंतव्य पर पहुँचने से पहले ही, इंसानियत पीछे छूट जाए।
सड़कें अब सिर्फ डामर और सिग्नल की कहानी नहीं हैं, ये हमारे समाज की धड़कनों और धैर्य का आईना बन चुकी हैं।
तो अगली बार जब ट्रैफिक में फँसें, हॉर्न पर हाथ जाए — एक पल रुकिए, और सोचिए:
"क्या मैं गाड़ी चला रहा हूँ, या अपनी इंसानियत और
संयम को पीछे छोड़ रहा हूँ?"
क्योंकि अगर यही रफ्तार रही,
तो मंज़िल तो मिल जाएगी...
पर इंसानियत शायद रास्ते में ही गिरकर रह जाएगी।
✍️ अनीता गहलावत
(व्यंग्यात्मक रूपांतरण)
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