समाजिक कहानी : “वो लड़कियाँ और मैं”
हम अक्सर भ्रष्टाचार, राजनीति और विकास की बातें करते हैं, लेकिन कभी इस पर नहीं सोचते कि हमारी नई पीढ़ी किस ओर जा रही है।
नई पीढ़ी की बदलती सोच और माता-पिता की जिम्मेदारी पर गहन कहानी—बच्चों को मोबाइल नहीं, संवाद और संस्कार चाहिए।
समाजिक कहानी : “वो लड़कियाँ और मैं”
लेखिका - अनीता गहलावत
उस दिन मैं हरियाणा रोडवेज की बस से चंडीगढ़ जा रही थी। 152-D हाईवे वाली सीधी बस निकल चुकी थी, इसलिए मुझे रोहतक होकर जाना पड़ा। बस ज़्यादा भरी नहीं थी। मैं पिछली तरफ़ की एक सीट पर आकर बैठ गई और खिड़की से बाहर गुजरते खेत-खलिहान देखने लगी।
रोहतक और पानीपत के बीच बस में सात-आठ लड़कियाँ चढ़ीं। उम्र से लग रहा था जैसे 11वीं-12वीं की छात्राएँ हों। वे आकर मेरे ठीक आगे वाली सीटों पर बैठ गईं। किसी ने कानों में लीड लगा रखी थी, कोई मोबाइल पर तस्वीरें देख रही थी, कोई ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी। पूरी बस उनकी खिलखिलाहट से गूंज उठी।
मैं पहले तो उनकी मासूमियत देखकर मुस्करा दी, लेकिन जैसे-जैसे उनकी बातें कानों तक पहुँचीं, मन भीतर से चौंक गया। वे सभी धड़ल्ले से अपने-अपने बॉयफ्रेंड्स की बातें कर रही थीं। कोई गर्व से कह रही थी—“मेरा बहुत स्मार्ट है।” दूसरी खिलखिलाकर बोली—“तेरा वाला तो ओवरएक्टिंग करता है।” तीसरी इठलाकर कह रही थी—“मेरा सबसे हैंडसम है।” उनकी बातें इतनी खुलकर थीं कि उन्हें इस बात की परवाह ही नहीं थी कि पीछे बैठा कोई सुन भी रहा है।
मैं अवाक होकर सोचने लगी—ये वही उम्र है जब किताबों और सपनों में डूब जाना चाहिए। हम भी तो कभी स्टूडेंट थे। दोस्ती हमारी भी थी, सहेलियाँ हमारी भी थीं, लेकिन उस समय बातचीत का विषय किताबें, पढ़ाई, खेल या भविष्य की योजनाएँ हुआ करती थीं। कभी भी रिश्तों का ऐसा दिखावा नहीं था। सिर्फ़ बीस साल का फासला और पीढ़ी इतनी बदल गई।
खिड़की से बाहर देखते हुए मन में सवाल उठे—क्या उनके माता-पिता को इन सब बातों की जानकारी होगी? क्या वे जान पाते हैं कि उनकी बेटियाँ किस तरह की दुनिया में जी रही हैं? सच कहा जाए तो तकनीक ने बच्चों को सबकुछ दे दिया है—मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया—पर उसी ने उनसे मासूमियत भी छीन ली है।
मुझे याद आया कि जब हम किताबों में खोए रहते थे, तो एक नई पुस्तक का पहला पन्ना खोलने में ही कितनी खुशी होती थी। परीक्षा में अच्छे अंक लाने पर मिठाई का स्वाद ही सबसे बड़ा इनाम लगता था। सहेली के साथ साइकिल पर हवा से बातें करना हमारी आज़ादी थी। और आज बच्चों की खुशी लाइक्स, कमेंट्स और चैट पर टिक गई है।
क्या यह सचमुच प्रगति है या पतन?
मेरे भीतर बार-बार यही ख्याल आता रहा कि बच्चों को समय देना माता-पिता का सबसे बड़ा फर्ज़ है। अगर हम उनकी बातें नहीं सुनेंगे तो वे बाहर सहारा ढूँढेंगे। हर बच्चा चाहता है कि कोई उसकी छोटी-बड़ी खुशियाँ और परेशानियाँ सुने, समझे। जब घर में संवाद का पुल टूटता है तो बच्चे रास्ता भटकने लगते हैं।
बस पानीपत की तरफ़ बढ़ रही थी। लड़कियाँ अब भी अपनी ही मस्ती में खोई थीं। उनकी हँसी में बचपना था, लेकिन शब्दों में असमय की गंभीरता।
मैं मन ही मन ठान चुकी थी कि यह अनुभव केवल मेरे दिल में कैद नहीं रहना चाहिए। यह केवल उन सात-आठ लड़कियों की बात नहीं है, बल्कि हमारे पूरे समाज का आईना है।
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चंडीगढ़ पहुँचकर लड़कियाँ उतर गईं। उनकी हँसी बस से उतर गई, लेकिन उनके शब्द अब भी मेरे कानों में गूंज रहे थे। मैं सोचती रही—समाज की असली तरक्की वही होगी जब हमारी बेटियाँ किताबों, सपनों और अपने भविष्य से रिश्ते जोड़ेंगी, न कि केवल “स्मार्ट और हैंडसम” के नाम से।
मैं पहुंच चुकी थी और मेरे भीतर सवालों का सैलाब भी ।
क्या सचमुच हमने बच्चों को स्वतंत्रता दी है या उन्हें अकेला छोड़ दिया है?
क्या माता-पिता की व्यस्तता, बच्चों की मासूमियत छीन रही है?
क्या स्कूल केवल अंकों तक सिमट गए हैं और जीवन मूल्यों की शिक्षा पीछे छूट गई है?
मुझे लगता है, बदलाव का समय अब है।
बच्चों को मोबाइल नहीं, माँ-बाप की बातें चाहिए।
स्कूलों में सिर्फ़ किताबें नहीं, संस्कारों की शिक्षा चाहिए।
समाज को केवल आधुनिकता नहीं, अपनी जड़ों से जुड़ाव चाहिए।
Written by Anita Gahlawat
👉 यह कहानी हमें याद दिलाती है कि बच्चों के वर्तमान को सँवारना ही भविष्य को सँवारना है। माता-पिता को समय और संवाद दोनों देने होंगे, तभी नई पीढ़ी सही दिशा पकड़ सकेगी।
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