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Showing posts from March, 2018

सफर

राह गुजर रही है सफर की तेजी से चल रही है रफ्तार.... मुझसे कोई गलती न हो यही रहेगी दरकार..... मुसीबत में काम आऊं किसी के यहीं चाहत है रूसवा न हूं जिन्दगी का सफर पूरा कर लू हंस के।         *  *  *  * जिन्दगी के पन्नो में वो पाठ था ही नहीं सफर का, जो जमानें से सबक पाकर पढा है।।          *  *  *  * जो पाठ जमाना पढाता है वो अकसर किताबों में नहीं होता

समां प्यार का

सुरमई से हुए दिन रात, पागल समां है। चांदनी जैसी चमक छाई, धङकन जवां है। तेरी रहगुजर में है जन्नत के प्यारे मौसम, मौहब्बत का सलीका ,ओर प्यारे प्यारे तुम। कैसे रह लु तेरे बिन, कभी बनावटी कभी दिखावटी हंसी भी मेरी तन्हा है। अब आये हो इस कदर , ये दिल क्या पूरा वक्त ही खुशी का गवाह है।। कहीं कुछ अधूरा सा ✍️ लेखिका: Anita Gahlawat कुछ पल थे जो ठहर नहीं पाए, कुछ सपने थे जो बिखर गए। कुछ चेहरे मुस्कुराते रहे, पर अंदर से शायद डर गए। कुछ बातें दिल में ही रह गईं, कुछ चुप्पियाँ आवाज़ बन गईं। कभी-कभी यूँ भी होता है, जैसे रूह थककर रुक जाती है कहीं… कभी लगता है… कहीं कुछ अधूरा सा है, जैसे पूरी होकर भी कुछ अधूरी सी कहानियाँ हैं। जैसे कोई अपनी ही परछाई से दूरी बना रहा हो… शब्द हैं, पर शांति नहीं, आँखें हैं, पर नींद नहीं। दिल धड़कता है रोज़ सुबह, पर जीने की वजह ठहरती नहीं। हर दिन एक सवाल बनकर आता है — क्या सब ठीक है? या फिर… कहीं कुछ अधूरा सा है? -Anita Gahlawat 

नजर नजर की देख नई शायरी

कुछ तो कशीश है इन अजनबी लोगो में यू हीं नहीं दोस्त बनकर रूह में बस जातें हैं          * * * * नजर नजर की देख है जिसने जैसा जाना वही किरदारों की देख है।              *  *  *  * मत कर इतने हसीं सितम गैर नहीं तेरे अपने है हम राज छिपा है दिल में उसमें बस तुम ही तुम          *  *  *  * कई बातें नजर की निगाहें से पढी जाती हैं ओर अच्छे व्यवहार का आधार भी इन से है।।

दास्ता हसरतों की

अजीब दास्तां है इन हसरतों की अजनबी हाल पूछ रहें है ओर अपनों को खबर भी नहीं......         *  *  *  * मुङकर क्या देखना जब चल ही दिये उन मंजरो से भी निपटना है जो रास्ते में मिलेंगे          *  *  *  * सोच लेते है हर खीश दिल की हसरत से चाहत के आईने से वाकिफ नहीं हो तुम          *  *  *  *

womens day special - मैं औरत हूं

 सुन औरत आज भी तेरी वही कहानी है यही तेरा बङपन यही तेरी रूखी रवानी है रिति- रिवाज झेलती हुई तु सब सहती है हर रिश्ते में ढल कर अपनापन बिखेरती है सदियों से तु मर्दो की गिरफ्त में पली है पतिव्रता की दुहाई पा कर आग में जली है जुल्म सहे हजार फिर भी प्यार की कली है जीवन संसार को बांधने में खुद ही ढली है सोच अपने बारे में तु दुनियां बदल सकती है तेरी मां न कर सकी वो काम तु कर सकती है बेटी नही है पराया धन ये जग को बता सकती है शक्ति जगा तु आप अपने फैसले खुद ले सकती है Happy womens day  मैं औरत हूँ ✍️ लेखिका: Anita Gahlawat मैं सदीयों से जलती मशालों की बात हूँ, मैं सहमी नहीं, मैं तो आवाज़-ए-हयात हूँ। तू रचता रहा नियम मेरे लिए हर बार, मैं हर बार टूटी, फिर भी पूर्ण सभ्य आत्मा हूँ। कभी सीता, कभी झांसी की तलवार बनी, कभी माँ, कभी बेटी की सौगंध हूँ मैं। तेरी किताबों में जो दर्ज़ नहीं मैं, उस अनकही कहानी की जान हूँ मैं। ना आँसू मेरी कमज़ोरी हैं, ना ख़ामोशी हार, मैं जिस दिन लहराई — बन जाऊँगी प्रचंड आग की धार। हर घर की नींव, हर रिश्ते का विश्वास हूँ, मत समझना कम मुझे, मैं पूरा इ...