समां प्यार का

सुरमई से हुए दिन रात,
पागल समां है।
चांदनी जैसी चमक छाई,
धङकन जवां है।
तेरी रहगुजर में है जन्नत
के प्यारे मौसम,
मौहब्बत का सलीका ,ओर
प्यारे प्यारे तुम।


कैसे रह लु तेरे बिन,
कभी बनावटी कभी दिखावटी
हंसी भी मेरी तन्हा है।
अब आये हो इस कदर , ये दिल क्या
पूरा वक्त ही खुशी का गवाह है।।






कहीं कुछ अधूरा सा

✍️ लेखिका: Anita Gahlawat

कुछ पल थे जो ठहर नहीं पाए,
कुछ सपने थे जो बिखर गए।
कुछ चेहरे मुस्कुराते रहे,
पर अंदर से शायद डर गए।

कुछ बातें दिल में ही रह गईं,
कुछ चुप्पियाँ आवाज़ बन गईं।
कभी-कभी यूँ भी होता है,
जैसे रूह थककर रुक जाती है कहीं…

कभी लगता है…
कहीं कुछ अधूरा सा है,
जैसे पूरी होकर भी कुछ अधूरी सी कहानियाँ हैं।
जैसे कोई अपनी ही परछाई से
दूरी बना रहा हो…

शब्द हैं, पर शांति नहीं,
आँखें हैं, पर नींद नहीं।
दिल धड़कता है रोज़ सुबह,
पर जीने की वजह ठहरती नहीं।

हर दिन एक सवाल बनकर आता है —
क्या सब ठीक है?
या फिर…
कहीं कुछ अधूरा सा है?

-Anita Gahlawat 














Comments