womens day special - मैं औरत हूं

 सुन औरत आज भी तेरी वही कहानी है
यही तेरा बङपन यही तेरी रूखी रवानी है
रिति- रिवाज झेलती हुई तु सब सहती है
हर रिश्ते में ढल कर अपनापन बिखेरती है


सदियों से तु मर्दो की गिरफ्त में पली है
पतिव्रता की दुहाई पा कर आग में जली है
जुल्म सहे हजार फिर भी प्यार की कली है
जीवन संसार को बांधने में खुद ही ढली है


सोच अपने बारे में तु दुनियां बदल सकती है
तेरी मां न कर सकी वो काम तु कर सकती है
बेटी नही है पराया धन ये जग को बता सकती है
शक्ति जगा तु आप अपने फैसले खुद ले सकती है

Happy womens day





 मैं औरत हूँ

✍️ लेखिका: Anita Gahlawat

मैं सदीयों से जलती मशालों की बात हूँ,
मैं सहमी नहीं, मैं तो आवाज़-ए-हयात हूँ।

तू रचता रहा नियम मेरे लिए हर बार,
मैं हर बार टूटी, फिर भी पूर्ण सभ्य आत्मा हूँ।

कभी सीता, कभी झांसी की तलवार बनी,
कभी माँ, कभी बेटी की सौगंध हूँ मैं।
तेरी किताबों में जो दर्ज़ नहीं मैं,
उस अनकही कहानी की जान हूँ मैं।

ना आँसू मेरी कमज़ोरी हैं, ना ख़ामोशी हार,
मैं जिस दिन लहराई — बन जाऊँगी प्रचंड आग की धार।

हर घर की नींव, हर रिश्ते का विश्वास हूँ,
मत समझना कम मुझे, मैं पूरा इतिहास हूँ।











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