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Showing posts from July, 2025

विषय: नारी सशक्तिकरण

आज की नारी चुप नहीं है — वह सोचती है, बोलती है, और जब कलम उठाती है तो समाज की नींव हिल जाती है। अनीता गहलावत की यह कविता ‘सम्मान चाहिए’ एक ऐसी बुलंद आवाज़ है जो हर स्त्री के भीतर छिपे आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और परिवर्तन की चाह को शब्दों में ढालती है। यह कविता उस सोच को चुनौती देती है जो नारी को एक सीमित दायरे में देखती रही है। यह सिर्फ कविता नहीं — यह नई सोच की दस्तक है। आइए, पढ़ते हैं वो पंक्तियाँ जो हर दिल में इंकलाब की लौ जला दें। --- शीर्षक: "नारी: एक विचार नहीं, एक क्रांति है" मैं नारी हूं, मैं शक्ति हूं, संघर्षों की अभिव्यक्ति हूं। न कोमलता की परिभाषा मात्र, नारी हूं मैं — सागर की गहराई, नभ की ऊँचाई साथ। --- जब तूफान आया, मैं दीवार बनी, जब अंधियारा छाया, मैं रोशनी बनी। रसोई से संसद तक मेरा ही विस्तार है, कभी मां, कभी नेता — मेरा हर रूप तैराक है। --- मैं सीता की धैर्य गाथा हूं, मैं झाँसी की तलवार हूं। कभी मीरा के भजन में बहती, तो कभी चंद्रमुखी सी लाचार हूं। पर जो समझे कमज़ोर मुझे, वो न जान सके मेरी पुकार को — क्योंकि हर चुप्पी के पीछे, सुलगती एक क्रांति की चिंगारी हूं। -...

फिर भी तुम मिले – तलाक और पुनः प्रेम पर आधारित एक इमोशनल हिंदी कहानी"

कभी-कभी रिश्ते दो दिलों से नहीं, दो दुनियाओं से टकराते हैं। कुछ साथ आते हैं बिना किसी तैयारी के — जैसे पूजा और रणविजय। उनकी शादी एक सामाजिक समझौता थी, जहां प्रेम का कोई पन्ना अभी लिखा नहीं गया था। धीरे-धीरे बात तलाक तक पहुँच गई, और दो दिलों ने खुद को कानून की तारीखों में कैद कर लिया। पर क्या हर अंत वाकई अंत होता है? इस कहानी में हम जानेंगे कि कैसे एक बिखरा रिश्ता, एक टूटे संवाद और एक अनकहा प्रेम — फिर से जीवन पा सकता है। क्या दो लोग, जो कभी अजनबी से भी बढ़कर हो जाते हैं, फिर से एक-दूसरे को अपनाने का साहस कर सकते हैं? "फिर भी तुम मिले" सिर्फ एक प्रेमकथा नहीं, बल्कि रिश्तों की दूसरी सांस है — जहां दर्द भी है, दूरी भी, पर उम्मीद कभी नहीं मरती। ------------------------- कहानी का शीर्षक :- "फिर भी तुम मिले" Written by Anita Gahlawat  शादी के तीन साल बाद पूजा और रणविजय की जिंदगी सामान्य लगती थी — बाहर से। लेकिन अंदर रिश्तों में खामोशी पल रही थी। एक दिन किसी बात पर पूजा ने गुस्से में कह दिया — "अगर इतना ही बोझ हूं मैं, तो तलाक दे दो!" उसने ये बात उस भाव में कही थ...

पीढ़ियों का टकराव- हास्य और मार्मिक कहानी

  हम रोज़ाना ट्रेनों में सफर करते हैं — कुछ मंज़िलों तक, कुछ ख्यालों के साथ, और कुछ अनजान यात्रियों संग। ये यात्राएँ सिर्फ स्टेशनों तक नहीं होतीं, ये अक्सर हमारे भीतर चल रही जद्दोजहद की कहानियाँ बन जाती हैं। 'पीढ़ियों का टकराव' एक ऐसी ही ट्रेन यात्रा की सच्ची घटना है, जो महज़ सीटों की अदला-बदली नहीं, बल्कि समझ, सम्मान और संबंधों के बदलाव की कहानी है। इस कहानी में दो पीढ़ियाँ आमने-सामने बैठी हैं — एक वो जो त्याग और परंपराओं से बनी है, और एक वो जो व्यस्तता और आधुनिकता में डूबी है। शब्द कम हैं, पर भाव बहुत कुछ कहते हैं। यह घटना छोटी भले हो, पर इसकी प्रतिध्वनि हर परिवार में सुनाई देती है — कहीं दादी-नानी के अकेलेपन में, कहीं बेटे-बेटियों की व्यस्त दिनचर्या में। इस कहानी को लिखने का मकसद किसी को दोष देना नहीं, बल्कि हमें ये याद दिलाना है कि समय के साथ रिश्ता ना छूटे, यही असली जिम्मेदारी है। शीर्षक: पीढ़ियों का टकराव Written by Anita Gahlawat  हंसी की पटरी पर राजधानी दिल्ली स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर 16... समय: शाम का हवा में गरम चाय और छोले-कुलचे की मिली-जुली खुशबू तैर रही थी। चारों...

हास्य कहानी: "टमाटर का टशन"

शहर की सुबहें अब सब्ज़ियों से नहीं, भावों से शुरू होती थीं।  जिस कॉलोनी में कभी सब्ज़ीवाले "आलू-प्याज लो बहनजी!" की आवाज़ लगाते थे, वहाँ अब सिर्फ एक ही सबाल गूंजता — "भैया, टमाटर कितने का दिया?" और उस सवाल की रानी थीं — श्रीमती वर्मा। जो कल तक टमाटर को बीमारी मानती थीं, आज उन्हीं टमाटरों को देखकर आंखों में पौष्टिकता की चमक आ जाती थी। यह कहानी है एक महिला की, जिसने सिर्फ टमाटर के रेट बदलने से अपने जीवन का ‘रेड सिग्नल’ ‘ग्रीन’ कर लिया।  वो टमाटर न भी ले, पर पूछे बिना चैन नहीं मिलता। -- हास्य कहानी: "टमाटर का टशन" लेखिका: अनीता गहलावत  -- श्रीमती वर्मा को टमाटरों से नफ़रत थी।  हाँ, वही टमाटर जो हर सब्ज़ी में रंग भरते हैं, हर रस्म में सलाद बनते हैं, हर होटल की ग्रेवी में डूबे रहते हैं, उन्हें देखकर श्रीमती वर्मा का मुंह बन जाता था — ऐसा जैसे किसी ने बिना बताए सास को बुला लिया हो। जब भी सब्ज़ी वाला पूछता, "बहनजी टमाटर?"  तो उनका उत्तर होता, "हाय राम! नहीं-नहीं! इनसे गैस होती है, मेरी तो तबीयत ही बिगड़ जाती है। और फिर कौन रोज़ काटे, कौन धोए! और इन...

हरियाणस्तुतिः

 हरियाणायाः गीतम्-1 श्लोक १: हरितभूमिर्मम जननी या या वीरभूमिः हरियाणानाम्। मयूरिण्याः गिरिमुखेभ्यः तु डबचिक्‌तटाद्यन्तकं यावत्। सर्वत्र शान्तिर्विलसति, स्वधर्मे नित्यं स्थिताः प्रजाः॥ हिंदी भावार्थ: यह हरी-भरी भूमि मेरी जननी है, यह वीरों की भूमि हरियाणा है। मोरनी के पहाड़ों से लेकर डबचिक के तट तक, हर दिशा में शांति व्याप्त है। यहाँ की जनता अपने कर्तव्यों में नित्य स्थिर और सजग रहती है। --- श्लोक २: कृषकाः कर्मयोगिनः, रक्षका जयशीलकाः। सैनिकाः च ददत्येव राष्ट्राय स्वजीवनम्॥ हिंदी भावार्थ: यहाँ के किसान कर्मयोगी हैं, और रक्षक (सुरक्षाबल) सदैव विजय के लिए तत्पर रहते हैं। सैनिक राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना जीवन तक समर्पित कर देते हैं। --- श्लोक ३: कृष्णमृगः शशकः, कालतीतरः च संरक्षिताः। सुरजकुण्डं च शोभते यथा हृदयस्य गौरवम्॥ हिंदी भावार्थ: यहाँ कृष्णमृग (काला हिरन), खरगोश, और काला तीतर जैसे जीव सुरक्षित हैं। सुरजकुंड इस राज्य की शोभा और गर्व का प्रतीक है। --- श्लोक ४: द्रोणगुरुः यत्र साक्षात्, अभिमन्युश्च बाला वीरः। कल्पना समा कन्या, साहसे समता धारयति॥ हिंदी भावार्थ: यह वही धरती है जहाँ ...