विषय: नारी सशक्तिकरण



आज की नारी चुप नहीं है — वह सोचती है, बोलती है, और जब कलम उठाती है तो समाज की नींव हिल जाती है। अनीता गहलावत की यह कविता ‘सम्मान चाहिए’ एक ऐसी बुलंद आवाज़ है जो हर स्त्री के भीतर छिपे आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और परिवर्तन की चाह को शब्दों में ढालती है। यह कविता उस सोच को चुनौती देती है जो नारी को एक सीमित दायरे में देखती रही है।

यह सिर्फ कविता नहीं — यह नई सोच की दस्तक है। आइए, पढ़ते हैं वो पंक्तियाँ जो हर दिल में इंकलाब की लौ जला दें।


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शीर्षक: "नारी: एक विचार नहीं, एक क्रांति है"


मैं नारी हूं, मैं शक्ति हूं,

संघर्षों की अभिव्यक्ति हूं।

न कोमलता की परिभाषा मात्र,

नारी हूं मैं — सागर की गहराई, नभ की ऊँचाई साथ।



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जब तूफान आया, मैं दीवार बनी,

जब अंधियारा छाया, मैं रोशनी बनी।

रसोई से संसद तक मेरा ही विस्तार है,

कभी मां, कभी नेता — मेरा हर रूप तैराक है।



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मैं सीता की धैर्य गाथा हूं,

मैं झाँसी की तलवार हूं।

कभी मीरा के भजन में बहती,

तो कभी चंद्रमुखी सी लाचार हूं।

पर जो समझे कमज़ोर मुझे,

वो न जान सके मेरी पुकार को —

क्योंकि हर चुप्पी के पीछे,

सुलगती एक क्रांति की चिंगारी हूं।



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मैं वो हूं जो जलती रही चूल्हों में,

पर अब आग बन जलने लगी हूं।

जिसने मेरी उड़ान से पंख छीने,

अब उसके छज्जे से निकलने लगी हूं।



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मुझे अब दहेज़ नहीं,

सम्मान चाहिए।

मुझे चुप्पी नहीं,

स्वाभिमान चाहिए।

मैं अब झुकी नज़र नहीं,

आत्मविश्वास का भाल हूं।

मैं भी इंसान हूं,

कोई वस्तु नहीं — आज सवाल हूं।



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घर से निकल कर काम की दुनिया में,

अब मेरी पहचान है।

कंप्यूटर से लेकर खेतों तक,

हर जगह मेरी शान है।



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मैं बेटी हूं, मैं बहन हूं,

मैं मां भी बनती हूं।

मैं जीवन की धुरी हूं,

मैं सृष्टि की कड़ी हूं।



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जो सोचते थे —

"नारी घर की शोभा है,

चुपचाप रहना उसकी आदत है…"

अब उन्हें दिखा रही हूं,

मेरी लेखनी भी तेज़ है,

और मेरी आवाज़ भी इबादत है।



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न सलामी चाहिए, न ताज चाहिए,

बस बराबरी का समाज चाहिए।

जिसमें कोई ये न कहे — "लड़की होकर?"

बल्कि गर्व से कहे — "तू लड़की है, तू कर सकती है।"



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मैं नारी हूं — एक विचार नहीं, एक क्रांति हूं,

मैं परिवर्तन की कहानी हूं, मैं आज़ादी की वाणी हूं।


-Anita Gahlawat 

Bhiwani’ Haryana 


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