हास्य कहानी: "टमाटर का टशन"
शहर की सुबहें अब सब्ज़ियों से नहीं, भावों से शुरू होती थीं। जिस कॉलोनी में कभी सब्ज़ीवाले "आलू-प्याज लो बहनजी!" की आवाज़ लगाते थे, वहाँ अब सिर्फ एक ही सबाल गूंजता —
"भैया, टमाटर कितने का दिया?"
और उस सवाल की रानी थीं — श्रीमती वर्मा।
जो कल तक टमाटर को बीमारी मानती थीं, आज उन्हीं टमाटरों को देखकर आंखों में पौष्टिकता की चमक आ जाती थी।
यह कहानी है एक महिला की, जिसने सिर्फ टमाटर के रेट बदलने से अपने जीवन का ‘रेड सिग्नल’ ‘ग्रीन’ कर लिया। वो टमाटर न भी ले, पर पूछे बिना चैन नहीं मिलता।
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हास्य कहानी: "टमाटर का टशन"
लेखिका: अनीता गहलावत
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श्रीमती वर्मा को टमाटरों से नफ़रत थी। हाँ, वही टमाटर जो हर सब्ज़ी में रंग भरते हैं, हर रस्म में सलाद बनते हैं, हर होटल की ग्रेवी में डूबे रहते हैं, उन्हें देखकर श्रीमती वर्मा का मुंह बन जाता था — ऐसा जैसे किसी ने बिना बताए सास को बुला लिया हो।
जब भी सब्ज़ी वाला पूछता, "बहनजी टमाटर?" तो उनका उत्तर होता, "हाय राम! नहीं-नहीं! इनसे गैस होती है, मेरी तो तबीयत ही बिगड़ जाती है। और फिर कौन रोज़ काटे, कौन धोए! और इनका क्या भरोसा, कभी लाल, कभी पीले, कभी गले-सड़े, भगवान बचाए!"
पति मिस्टर वर्मा समझदार थे। वो समझ चुके थे कि जब तक टमाटर 10 रुपये किलो रहेंगे, तब तक इनका जीवन 'टमाटर-मुक्त' रहेगा। पर नियति को कुछ और मंज़ूर था।
एक दिन शहर में खलबली मच गई। टमाटर 10 से सीधा 110 पर पहुँच गए। सब्ज़ी मंडी में भीड़ थी, जैसे वहाँ टमाटर नहीं, सोने के बिस्किट बिक रहे हों। लोगों ने व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर नए शोध भेजने शुरू कर दिए — "टमाटर में पाए गए हैं दुर्लभ खनिज, NASA भी उठा रहा है रुचि!" श्रीमती वर्मा ने जैसे ही न्यूज़ देखी, आँखों में चमक आ गई।
“110 रुपये किलो! मतलब अब टमाटर पौष्टिक हो गए! अब समझ आया क्यों मेरी सहेली मीना की त्वचा इतनी चमकती है — वो रोज़ टमाटर खाती है!”
उस दिन से श्रीमती वर्मा ने जीवन का लक्ष्य बना लिया — हर टमाटरवाले से भाव तो जरूर पूछना है। ठीक भाव लगा तो देखते हैं....लेना देना नहीं है, बस पूछना है। आखिर ये भी तो सामाजिक जागरूकता है।
अब उनका नया रुटीन बना — सुबह की वॉक से पहले गेट के बाहर आते ही कौई सब्जी वाला मिलता तो पहला सवाल होता,
"क्या भाव है टमाटर के?" गली में आने वाला हर रेहड़ी वाला चौंक जाता —
“बहनजी, आज 108 चल रहा है। कल से थोड़ा कम हुआ।”
“अच्छा? कल तो 110 था! देखो-देखो, गिरावट शुरू हो गई। मैंने कहा था ना, ये तो बस टाइम की बात है।”
और वो फुसफुसाते आगे बढ़ जातीं, जैसे सेंसेक्स का चार्ट सब्जी बेचने वालों ने ही गिराया हो।
अब कॉलोनी की और महिलाएं भी प्रेरित हो चुकी थीं। हर पार्क की बेंच पर अब यही चर्चा होती —
"आज किसके रेहड़ी वाले ने टमाटर का भाव कितना बताया?"
"क्या आपका टमाटर ऑर्गेनिक था?"
"मिसेज वर्मा ने तो कहा, 103 का मिल रहा है अंदर गली में!"
श्रीमती वर्मा अब ‘टमाटर विशेषज्ञ’ बन चुकी थीं। एक दिन तो उन्होंने 'टमाटर ट्रेंड्स' नाम से व्हाट्सएप ग्रुप बना डाला, जहाँ वो हर घंटे अपडेट देतीं —
🧺 "जागरण मार्केट में भाव 105"
🌿 "लाल टमाटर कम, हरे टमाटर ज़्यादा, मतलब मंडी में नया स्टॉक नहीं आया है।"
अब मिस्टर वर्मा बेचारे शाम को ऑफ़िस से लौटते ही यही सुनते —
"क्या लाए टमाटर?"
“नहीं, आज तो महंगे थे…”
"क्या! आपने 2 रुपये और देकर नहीं खरीदे? क्या आपको पता नहीं, ये स्किन के लिए कितना अच्छा होता है?"
"पर आप ही तो कहती थीं इनसे गैस होती है…"
“अरे वो तब की बात थी! अब केमिकल-फ्री टमाटर आ गए हैं। तुम्हें समझ नहीं आता!”
मिस्टर वर्मा समझ चुके थे — टमाटर नहीं, अब घर में सत्ता पलट हो चुकी है।
एक दिन श्रीमती वर्मा ने ज़िद पकड़ ली —
“आज तो मैं खुद मंडी जाकर टमाटर लाऊंगी।”
पति बोले, “क्या ज़रूरत है, मैं ले आता हूँ।”
“नहीं! तुम्हें भाव पर मोलभाव करना नहीं आता। 5 किलो लेकर आऊंगी, फ्री धनिया भी लूंगी।”
उन्होंने एक बड़ी सी थैली निकाली, सिर पर दुपट्टा बांधा और निकल पड़ीं मंडी की ओर, जैसे कोई मिशन पर निकली हो।
मंडी में जाकर हर रेहड़ी वाले से टमाटर की कीमत पूछी, भावताव किया, "भैया ये 105 तो बहुत है, मैं तो 95 में लेती हूँ।"
रेहड़ी वाला बोला, “ले लीजिए बहनजी, पर आज पहली बार टमाटर लेती दिख रही हो, रोज़ तो सिर्फ पूछती ही हो।” श्रीमती वर्मा का चेहरा लाल, टमाटर से भी ज़्यादा।
अब घर में 5 किलो टमाटर थे। रोज़ टमाटर की चटनी, टमाटर की ग्रेवी, टमाटर का सूप, टमाटर का रस, टमाटर का फेसपैक…
मिस्टर वर्मा बोले —
“एक दिन ऐसा भी आएगा जब चाय में भी टमाटर पड़ेंगे।”
श्रीमती वर्मा बोलीं —
“क्यों नहीं! टमाटर ही तो असली सुपरफूड है। तुम क्या जानो!”
महीने भर बाद जब टमाटर फिर 15 रुपये किलो हो गए, तो श्रीमती वर्मा ने फ्रिज से मुंह मोड़ लिया और बोलीं —
“अब तो इनका स्वाद ही चला गया है… गैस भी देने लगे हैं। छोड़ो!”
-Anita Gahlawat
और इस तरह, टमाटर फिर एक बार अपनी हैसियत पर लौट आया — "महज एक सब्ज़ी, जिसे लेना है तो लो, नहीं तो पूछे बिना चले जाओ!"
लेकिन कॉलोनी में लोग अब भी कहते हैं —
"अगर कभी टमाटर के भाव जानने हों, तो मिसेज वर्मा को कॉल कर लो। वो न लें, पर पूछे बिना चैन नहीं आता!"
हर चीज़ की कीमत उसके स्वाद को बदल सकती है —
पर श्रीमती वर्मा का टमाटर प्रेम, वो तो बस एक महंगाई का मौसमी इश्क़ था।
-Anita Gahlawat
📚 सारांश (Summary):
"टमाटर का टशन" एक हास्य कथा है जो एक सामान्य गृहिणी — श्रीमती वर्मा — की बदलती सोच और 'टमाटर' के इर्द-गिर्द घूमती उसकी आदतों को मज़ेदार तरीके से प्रस्तुत करती है।
जब टमाटर सस्ते थे, उन्हें देखकर श्रीमती वर्मा का मन खराब हो जाता था, लेकिन जैसे ही टमाटर महंगे हुए, वो अचानक "पौष्टिक" लगने लगे।
अब वे न केवल हर रेहड़ीवाले से टमाटर का भाव पूछती हैं, बल्कि कॉलोनी की 'टमाटर विशेषज्ञ' बन गई हैं।
उनकी यह दिनचर्या एक हंसी-ठिठोली भरे अभियान में बदल जाती है जिसमें टमाटर खरीदने से ज़्यादा, "टमाटर का ज्ञान बाँटना" उनका मकसद बन जाता है।
कहानी समाज के उस पहलू पर व्यंग्य करती है जहाँ चीज़ों का मूल्य हमारे व्यवहार और भावनाओं को अचानक बदल देता है।
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