पीढ़ियों का टकराव- हास्य और मार्मिक कहानी

 

हम रोज़ाना ट्रेनों में सफर करते हैं — कुछ मंज़िलों तक, कुछ ख्यालों के साथ, और कुछ अनजान यात्रियों संग। ये यात्राएँ सिर्फ स्टेशनों तक नहीं होतीं, ये अक्सर हमारे भीतर चल रही जद्दोजहद की कहानियाँ बन जाती हैं।

'पीढ़ियों का टकराव' एक ऐसी ही ट्रेन यात्रा की सच्ची घटना है, जो महज़ सीटों की अदला-बदली नहीं, बल्कि समझ, सम्मान और संबंधों के बदलाव की कहानी है।

इस कहानी में दो पीढ़ियाँ आमने-सामने बैठी हैं — एक वो जो त्याग और परंपराओं से बनी है, और एक वो जो व्यस्तता और आधुनिकता में डूबी है। शब्द कम हैं, पर भाव बहुत कुछ कहते हैं।

यह घटना छोटी भले हो, पर इसकी प्रतिध्वनि हर परिवार में सुनाई देती है — कहीं दादी-नानी के अकेलेपन में, कहीं बेटे-बेटियों की व्यस्त दिनचर्या में।

इस कहानी को लिखने का मकसद किसी को दोष देना नहीं, बल्कि हमें ये याद दिलाना है कि समय के साथ रिश्ता ना छूटे, यही असली जिम्मेदारी है।





शीर्षक: पीढ़ियों का टकराव
Written by Anita Gahlawat 



हंसी की पटरी पर राजधानी
दिल्ली स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर 16...
समय: शाम का


हवा में गरम चाय और छोले-कुलचे की मिली-जुली खुशबू तैर रही थी। चारों ओर लोग अपने अपने मोबाइल और मेटल सूटकेसों के साथ व्यस्त थे, लेकिन मेरे साथ था — चार साल का मेरा बेटा अर्नव। और उसका ध्यान न चाय पर था, न ट्रेन पर। उसका रोमांच सिर्फ एक चीज़ पर केंद्रित था – राजधानी एक्सप्रेस की सीट के पर्दे।
"मम्मा, ये पर्दा झूला है?"
"नहीं बेटा, ये पर्दा है... झूला नहीं।"
"तो झूल नहीं सकते?"
"नहीं!"
"तो फिर लगा क्यों है?"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
हमारी बर्थ टू-टियर AC थी – नीली चादर, सफेद तकिया और वही सुगंध जो हर लंबी दूरी की ट्रेन में होती है — एक अजीब सी 'ट्रेन-मिश्रित पसीना और पाइन फ्रेशनर' जैसी। सामने की सीट अभी खाली थी और अर्नव का पूरा साम्राज्य फैला हुआ था। एक बार पर्दा दाहिने सरकाया, फिर बाएं, फिर नीचे झांका, फिर ऊपर ताकने लगा — उसे पर्दे में गहरी आत्मा दिख रही थी शायद।
कानपुर तक हमारी शांति बरकरार रही, लेकिन जैसे ही ट्रेन ने कानपुर सेंट्रल पर ब्रेक मारी, हमारी कहानी में प्रवेश हुआ दो नए किरदारों का —
एक बुजुर्ग दंपत्ति का।
अंकल की उम्र करीब 70 के आसपास होगी, सफेद झक्री पैंट, ब्लू चेक्स शर्ट और सिर पर कैप — जैसे अभी-अभी किसी गोल्फ कोर्स से सीधे ट्रेन में चढ़ आए हों। आंटी उतनी ही ठसक से – एकदम प्रेस की हुई साड़ी, चोटी में चमचमाता क्लच और हाथ में एक पिटारा, जिसे देखकर लगा कि इसमें जरूर घर की बनी मठरी और पापड़ भरे होंगे।
"साइड वाली बर्थ हमारी है न?"
"हां हां, वही… 38 और 39।"
उन्होंने जैसे ही बैग रखा, ट्रेन में हलचल शुरू हो गई।
अंकल सामान से जूझ रहे थे –
"अरे चश्मा कहां गया? अरे वो थैली तो पीछे छूट गई क्या? मिक्सर भी रखा था क्या?"
आंटी पीछे से आदेश की बौछार कर रही थीं –
"तुमसे ना हो पाएगा… सारा बैग ऊपर-नीचे कर दिया! ये क्या तुमने कंघा फ्रूट के साथ रख दिया? नींबू महक रहा है!"
मैंने देखा, अर्नव पर्दा थोड़ा हटाकर जैसे लाइव कॉमेडी शो देख रहा था।
वो फुसफुसाया,
"मम्मा, अंकल डांट खा रहे हैं!"
फिर मुस्कराकर बोला,
"अब आंटी गाना सुन रही हैं… फिर डांट रही हैं।"
मैंने उसे समझाया, "बेटा, सो जाओ अब।"
"नहीं मम्मा, नींद नहीं आ रही, अंकल वाली फिल्म चल रही है।"
ट्रेन की रातें अमूमन शांत होती हैं — कोई इयरफोन में म्यूजिक, कोई घुटनों पर किताब… लेकिन हमारी सीट पर मानो फैमिली ड्रामा चल रहा था, लाइव कॉमेडी के तड़के के साथ।
अगली सुबह कुछ ज्यादा ही मनोरंजन लेकर आई।
6 बजे जैसे ही आंटी ने आंख खोली, उन्होंने छोटे म्यूजिक बॉक्स से आरती चला दी — "ओम जय जगदीश हरे…"
ट्रेन के कोने-कोने में घंटियों की गूंज जैसे फैल गई।
"अरे राम! ये मंदिर है क्या?" सामने वाली आंटी बड़बड़ाईं।
इधर अंकल का "फेशियल सेशन" चालू था।
"रुमाल लाओ, मुंह धोना है। अच्छा, अब वो टूथब्रश वाला केस कहां है?"
मैं हंसी रोक रही थी, लेकिन अर्नव खुलकर हंस रहा था।
"मम्मा, अंकल तो घर के ऑफिस जैसे काम कर रहे हैं।"
इतने में चाय वाला आया और साथ में अखबार। अंकल ने अखबार खोलते ही जैसे कोई खास खबर पढ़ी — और तभी अर्नव की नजर अखबार में छपी कबूतर की तस्वीर पर पड़ी।
"पिजन!" — अर्नव ने उंगली से दिखाया।
अंकल बोले, "नहीं बेटा, ये कबूतर है।"
"नहीं, पिजन है! मेरी बुक में लिखा है!"
अंकल हंसे, "बेटा, सब किताबें सही नहीं होतीं। ये कबूतर है, मैं बचपन से जानता हूं।"
"मेरी मैम भी पिजन कहती हैं, मम्मा भी!" — अर्नव ने मेरी तरफ समर्थन मांगा।
मैं बीच में पड़ी और कहा, "एक ही चीज़ है बेटा, अंग्रेजी में पिजन, हिंदी में कबूतर।"
"नहीं!" — अब दोनों अड़ गए थे।
पूरे डिब्बे में हंसी गूंजने लगी।
फिर चर्चा गन और बंदूक पर आ गई।
अर्नव बोला, "मेरे पापा आर्मी में हैं, मुझे गन चलानी आती है!"
अंकल बोले, "गन नहीं, बंदूक कहते हैं बेटा!"
"नहीं! गन!"
अब "पिजन बनाम कबूतर" के बाद "गन बनाम बंदूक" की जंग छिड़ चुकी थी।
सब हंस-हंसकर लोटपोट हो रहे थे।
अंकल ने मेरी तरफ देखकर मुस्कराते हुए पूछा,
"बेटी, एक ही बेटा रखा या दूसरा भी प्लान है?"
मैं मुस्करा दी, लेकिन कुछ नहीं बोली।
तभी पीछे की सीट से आवाज आई –
"आजकल एक ही बच्चा काफी है, महंगाई भी है और यही फैशन भी।"
अधिकांश लोग सिर हिलाकर सहमति जता रहे थे।
अंकल ने एकदम गंभीर लहज़े में कहा —
"मतलब अगली पीढ़ी में ना मामा-मामी, ना बुआ-फूफा, ना ताऊ-ताई… सगे रिश्ते कहां से लाओगे अर्नव भाईसाहब?"
एक गहरी चुप्पी फैल गई थी। पहली बार सभी हंसी से नहीं, सोच में डूबे थे।


ट्रेन अब पटना पार कर चुकी थी। खिड़की से बाहर धूप छिटक कर चेहरे पर पड़ रही थी, लेकिन हमारी बातचीत अब धूप की तरह चंचल नहीं रही थी, कुछ धीमी और गंभीर हो चली थी।
मैंने अंकल से पूछा,
"आप कहां जा रहे हैं?"
अंकल थोड़ी देर तक चुप रहे, फिर बोले,
"गुवाहाटी तक, फिर वहां से शिलांग। बेटा वहीं है – बड़का अफसर बना बैठा है।"
उन्होंने जब ये कहा तो उनकी आंखें चमकीं नहीं… उदास सी लगी।
आंटी उस पल चुपचाप बैठी थीं, पर उनकी आंखें कह रही थीं — वे हर बात से सहमत हैं, लेकिन अब उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देना चाहतीं।
"अरे बहुत बड़ा आदमी बन गया है," अंकल बोले, "हम उसके पास जा रहे हैं, वैसे तो अब वो खुद नहीं आता। साल दो साल में एक कॉल कर ले, बस बहुत समझो।"
मैंने धीरे से पूछा,
"वो क्यों नहीं आता?"
अंकल बोले,
"बेटा, अब इन बच्चों के पास वक़्त कहां? अपने बच्चों को स्कूल, क्लास, हॉबी, इंग्लिश, स्पीच, सब सिखाते हैं… लेकिन एक चीज़ जो नहीं सिखाई — वो है अपनापन। वो भाषा ही भूल गए जो आंखों से बोली जाती थी।"
अब मेरी हंसी रुकी थी। अर्नव पर्दे से झांकना छोड़ चुका था। उसकी नन्हीं आंखों में भी जिज्ञासा थी – यह चुप्पी क्या है, यह कहानी कैसी है?
"हमने भी बच्चों को पढ़ाया," अंकल बोले, "लेकिन शायद सही चीज़ नहीं पढ़ा पाए। उन्हें अंग्रेजी सिखाई, लेकिन अपनी मिट्टी की गंध देना भूल गए।"
उन्होंने गहरी सांस ली।
"मैं उत्तर प्रदेश हेल्थ डिपार्टमेंट में अफसर था पर मैं अलवर का रहने वाला हूं। जब मां थीं, हर साल गांव जाते थे। अब बेटों को गांव का नाम भी याद नहीं। पूछो तो कहते हैं — 'पापा उस जगह में नेटवर्क नहीं आता, वहाँ तो boredom होता है।'"
आंटी धीरे से बोलीं,
"एक बेटी भी थी हमारी…"
कहते ही उनका गला रुंध गया।
"अब नहीं है।"
मैं चौंक गई।
"क्या हुआ था?"
"एक हादसे में चली गई। उम्र बस 21 साल थी। सबसे प्यारी थी... वही तो थी जो हर त्यौहार पर सबसे पहले फोन करती थी।"
ट्रेन की खिड़की से बाहर अब खेत दिख रहे थे। हरियाली थी, लेकिन भीतर सूनापन।
"दूसरा बेटा इंग्लैंड में है। तेरहवीं पर भी नहीं आ सका। कह दिया – पापा, फ्लाइट नहीं मिल रही।"
आंटी अब थक चुकी थीं, बोलीं,
"रहने दो जी, अब किससे शिकायत करें। जैसा समय, वैसी संतानें।"
अंकल मुस्कराए —
वो मुस्कान जिसमें दर्द था, स्वीकार था, और एक उम्मीद की चिंगारी भी।
"बेटी, तुमसे कुछ कहूं?"
"जी अंकल…"
"अपने बेटे को सिर्फ पिजन और गन मत सिखाना… उसे ये भी सिखाना कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते, परवाह से बनते हैं।"
"उसे ये भी सिखाना कि बूढ़े मां-बाप कोई पुराने मोबाइल नहीं होते जो बंद होने पर रद्दी में फेंक दिए जाएं। वो पुराने रेडियो हैं — थोड़े टूटे, पर अब भी कुछ बजता है उनमें।"
मैं चुप थी। ट्रेन की आवाज़ भी अब धीमी लग रही थी।
"बेटा, दुनिया बहुत बदल रही है… लेकिन अगर ममता, संस्कार और सम्मान बचा रहे — तो घर कभी टूटता नहीं।"
थोड़ी देर बाद खामोशी छा गई।

अर्नव ने धीरे से मेरी गोद में सिर रखा और बोला,
"मम्मा, अब इन दादा दादी को क्या हो गया इतना बोल रहे थे, अब रोने जैसे क्यों लग रहे हैं, बङे क्या रोते हैं??मैंने उसे कसकर गले से लगाया और कहा,
"नहीं बेटा, कुछ नहीं हुआ इन्हे, वक्त के साथ समय बदल जाता है... , जैसे कुछ देर के लिए मुझे भी लगा,  मैं अभी कसकर अर्नव को बाहों में भर लु ....बङा हो गया तो फिर कहीं वात्सल्य अधुरा न रह जाए"

अंकल और आंटी भी मुस्कराए, शायद उन्हें भी लगा कि कोई रिश्ता फिर से जुड़ गया है — शब्दों से नहीं, भावनाओं से।



शीर्षकः: पीढीनां संघर्षः
हास्यपटिकायां राजधानीयात्रा

दिल्लीस्थं रेलस्थानकं प्लैट्फॉर्म् १६... समयः — सायं।

वायौ सन्तप्तचायायाः च छोलेकुलचेभ्यः च संयुक्तगन्धः सर्वत्र व्याप्तः। सर्वे यात्रिकाः स्वस्वदूरभाषयन्त्रैः मेटल्स्यूटकैः च व्यग्राः आसन्। किन्तु मम सह यात्री आसीत् — मम चतुरवर्षीयः पुत्रः अर्नवः।

तस्य ध्यानं न चायायाम्, न च ट्रेन्यां, केवलं एकस्मिन् वस्तुनि एव — राजधानी-रेलयानस्य पर्दायाम्।
सः पप्रच्छ —
"अम्मे! एषः पर्दः किम् झूलः अस्ति?"
"नहि पुत्र! एषः पर्दः अस्ति, झूलः न।"
"किं तर्हि झूलयितुं न शक्यते?"
"नहि।"
"किं पुनः यः झूलयितुं न शक्यते, सः स्थाप्यते किमर्थम्?"
एते प्रश्नाय उत्तरं मम समीपे नासीत्।

आस्माकं बर्थ् आसीत् द्वितीयश्रेण्यां वातानुकूलितः — नीलवर्णच्छादनेन, श्वेतकुशेन च युक्ता।
यस्यां विशेषगन्धः — दीर्घदूरीयात्रायाः मिश्रपसीनस्य च पाइनफ्रेशनरस्य च मिश्रगन्धः।

सम्प्रति सम्मुखबर्थ् रिक्ता आसीत्। अर्नवः तत्र स्वराज्यं विस्तारयन् पर्दं दक्षिणं, ततः वामं, पुनः अधः निरीक्ष्य, उपरि अपि अपश्यत्।
तस्य नेत्रेषु पर्दे आत्मा दृश्यते इव।

कानपूर्-नगरं यावत् यात्रा शान्तया अभवत्, यदा तु ट्रेन् कानपूर् सेंट्रल इत्यत्र अवतीर्णा, तदा द्वौ नवयात्रिकौ प्रवेशम् अकुरुताम् — वृद्धदम्पती।

एकः सज्जनः, सप्तत्यधिकवयस्कः, शुभ्रपैण्ट्, नीलवर्णचेक्स्-शर्ट्, शिरसि गोल्फक्रीडायाः टोपीवद्वस्त्रं।
तस्य पत्न्यः — सम्यक् प्रेसकृता शाटी, केशे चमच्चमकक्लचः, हस्ते एकं पिटारम् — येन पापडमठरीयुक्तं गृहीतम् इति भाति।

"साइड-बर्थ् अस्माकं वा?"
"आम्, ३८ तथा ३९ एव।"

तेनैव क्षणे यदा तौ बग्स् स्थापितवन्तौ, तदा एकं नाटकं आरब्धम्।
सज्जनः —
"अरे! चश्मा कुत्र गतं? सा थैली अपि नास्ति वा? मिक्सरः अपि आनितः?"
पत्नी —
"त्वया न शक्यते! सर्वं अस्तव बग् अस्तव्यस्तं कृतम्! किं फलसङ्गे कङ्गः स्थापितः? नीम्बूकस्य गन्धः विसृज्यते!"

एतस्मिन् समये, पर्दं किंचित् उपसार्य अर्नवः अस्मान् नाटकम् इव पश्यति स्म।
सः फुस्फुसन् अवदत् —
"अम्मे! अंकल् ताडनां प्राप्नुवन्ति!"
पुनः स्मयमानः —
"इदानीं आंटी गीतं श्रृणोति, पुनश्च ताडयति!"
अहं तम् उक्तवती —
"पुत्र! शयनं कुरु।"
"न मम्म! निद्रा न आगच्छति — अंकल्-चित्रपटं प्रचलति!"

रात्रौ सामान्यतः ट्रेन्यां निस्तब्धता — कश्चन इयरफोन् योजयति, अन्यः पुस्तकं पठति।
किन्तु अस्माकं कुंजे — पारिवारिकं नाटकं सजीवं हास्येन सहितम्।

प्रभाते अत्यधिकं विनोदं प्राप्तम्।
षड्वादने, आंटी जागरूकत्वेन, एकं म्यूजिक् बॉक्स् उद्घाट्य, आरतिं प्रवर्तयति —
"ॐ जय जगदीश हरे…"
घण्टानिनादः सम्पूर्णे याने प्रतिध्वनति।
सम्मुखी आंटी चकिताभवत् —
"अरे राम! अत्र मन्दिरं किम्?"

इह अंकलस्य “मुखमार्जन-सत्रम्” प्रवृत्तम्।
"रुमालं आनय — मुखं प्रक्षालयितुं आवश्यकम्।… अच्छा, सः दन्तधावन-पेटिका कुत्र गतः?"
अहं हास्यं निग्रहीतुं प्रयत्नं कुर्वन्ती आसीं, किन्तु अर्नवः निर्भीकं हसन् इव।

"मम्म! अंकल् तु गृहस्य कार्यालयमिव कर्म कुर्वन्ति!" — इत्युक्त्वा सः विहस्य।

एवमेव चायविक्रेता आगतः, सह पत्रिका अपि।
अंकलः पत्रिकां उद्घाट्य विशेषं वार्तामेकां अपश्यत्, किन्तु तस्मात् पूर्वम् अर्नवस्य दृष्टिः तस्मिन् प्रकाशिते कपोतचित्रे पतिता।

"पिजन!" — इति सः उङ्गल्या सूचयन् अवदत्।
अंकलः उच्य —
"न पुत्र! एषः कपोतः अस्ति।"
"नहि! पिजन इत्येव। मम पुस्तके तथा एव लिखितम्!"
अंकलः स्मयमानः —
"पुत्र! सर्वाणि पुस्तकानि यथार्थं न कथयन्ति। एषः कपोतः, अहं बाल्यकालात् ज्ञातवान्।"

"मम शिक्षिकापि पिजन इत्येव वदन्ति, मम मम्मापि!" — इति अर्नवः मम समीपं पश्यन् समर्थनं याचते स्म।

अहं मध्ये प्रविश्य उक्तवती —
"एकमेव वस्तु अस्ति पुत्र! आङ्ग्लभाषायां पिजन, हिन्दीभाषायां कबूतर इत्युच्यते।"
"नहि!" — इत्युक्त्वा द्वौ अपि जिद्दयाः स्थितौ।

सम्पूर्णे डिब्बे हास्यध्वनिः प्रतिध्वनति स्म।

अनन्तरं वार्ता "गन" च "बन्दूक" विषये अपि आरब्धा।
"मम पिताः आर्मीसेनायाम् कार्यं कुर्वन्ति। मम गन् चालयितुं शक्यते!" — इत्युक्त्वा अर्नवः गर्वेण बभाषे।
अंकलः —
"गन् न, 'बन्दूकः' इत्युच्यते पुत्र!"
"नहि! गन्!"

इत्येव “पिजन बनाम् कपोतः” पश्चात् “गन बनाम् बन्दूकः” इत्यपि युद्धम् आरब्धम्।
सर्वे जना हसितुं न अशक्नुवन्।

अथ अंकलः मम प्रती मुखं विलोक्य स्मितपूर्वकं पप्रच्छ —
"पुत्रि! केवलं एकः एव पुत्रः वा? अपरस्य चिन्ता न क्रियते?"
अहं मुस्कुरन्ती तु न किञ्चित् उत्तरं दत्तवती।

तत्क्षणं पश्चात्पृष्ठबर्थात् कश्चन उक्तवान् —
"अद्यतने समये एकः अपि बालकः पर्याप्तः! महङ्गता अपि अस्ति, च नूतन-प्रवृत्तिः अपि।"

अधिकांशाः लोकाः मस्तकं कम्पयन्तः अनुमोदनं प्रदत्तवन्तः।
तदा अंकलः एकदम् गम्भीरस्वरेण अवदत् —
"अर्थात् आगामिन्यां पीढ्याम् — न मामा-मामी, न बुवा-फूफा, न तातः-ताती… स्नेहरूपाणि स्वजनसम्बन्धाः कुत्र लप्स्यन्ते, अर्नवभ्रातृ?"

गम्भीरा मौनता व्याप्ता।
प्रथमतया सर्वे जना हास्यं विहाय चिन्तायाम् मग्नाः अभवन्।

तदा यानं पट्नापुरं अतिक्रम्य गच्छति स्म।
खिडक्याः बाह्यं सूर्यकान्तिः मम मुखे पतितवती, किन्तु अस्माकं संवादः तु सूर्यप्रकाशवत् चपलः न, अपितु मन्दः, विश्रान्तः, तथा च भावगम्भीरः जातः।

अहं पप्रच्छ —
"भवान् कुत्र गच्छति?"
अंकलः क्षणं मौनः स्थित्वा उक्तवान् —
"गुवाहाटी पर्यन्तं यास्यामि, ततः शिलांगं गमिष्यामि। मम पुत्रः तत्र — महदधिकार्यपदं प्राप्तवान्।"

तदा यदा ते उक्तवन्तौ, तेषां नेत्रयोः कान्तिः नाभवत् — केवलं विषण्णता प्रकाशितवती।
आण्ट्यपि तस्मिन्क्षणे मौनया उपविष्टा आसन्, किन्तु तयोः नेत्रयोः भाषा कथयति स्म —
"सर्वं यथार्थं, किन्तु अधुना प्रत्युत्तरं दातुं इच्छां न करोमि।"

"अरे! अतीव महान् पुरुषः जातः सः," इत्युक्त्वा अंकलः अवदत्,
"वयं तस्य समीपं यामः, स तु स्वयमेव न आगच्छति। यदा कदा एकं दूरवाणीं करोति — ततः अधिकं न।"

अहं शनैः पप्रच्छं —
"किं कारणं यत् सः न आगच्छति?"
अंकलः उत्तरं दत्तवान् —
"बेटि, अद्यतनानां पुत्राणां कः कालः अस्ति? ते स्वीयेषु पुत्रेषु विद्यालयं, कक्षा, कला, आङ्ग्लभाषा, भाषणादिकं शिक्षयन्ति…
किन्तु एकं शिक्षां विस्मृतवन्तः — 'अपनत्वम्'।
यां भाषां नेत्रैः भाषमाणः वदति, तां एव विस्मृतवन्तः।"

अधुना मम हास्यं अपि स्थगितम्।
अर्नवः अपि पर्दे झङ्कृतिं त्यक्त्वा मौनः।
तस्य लघुदृष्टिषु अपि जिज्ञासा आसीत् — "एषा मौनता किमर्थं? एषा कथा का?"

"अस्माभिः अपि पुत्रान् शिक्षितम्," इत्युक्त्वा अंकलः,
"किन्तु सम्भवतः यथार्थं न शिक्षितवन्तः।
तेषां कृते आङ्ग्लभाषा अपि शिक्षिता,
किन्तु स्वमूलस्य गन्धं दातुं विस्मृतम्।"

सः दीर्घं श्वासं चकार।
"अहम् उत्तरप्रदेश-आरोग्यविभागे अधिकारी आसीत्।
मम ग्रामः अल्वर इत्यत्र अस्ति।
यदा माता जीविता आसीत्, प्रतिवर्षं ग्रामं यायाम।
अधुना पुत्रानां गामनाम अपि न स्मरन्ति।
यदा पृच्छामः, तदा वदन्ति —
'पापा, तस्मिन् स्थले नेटवर्क् न अस्ति, तत्र तु बोअरिंग् भवति।'"

तदा आंटी मन्दं वदति स्म —
"एकं पुत्रीं अपि आसीत् अस्माकम्..."
एवमुक्त्वा तस्याः कण्ठः अवरुद्धः अभवत्।
"अधुना सा न अस्ति।"

अहम् चकितवती।
"किं जातम्?"
"एकस्मिन् अपघाते सा गतवती।
सा केवलं एकविंशतिवर्षीया आसीत्।
सर्वेषां प्रियतमा,
त्यौहारसमये प्रथमं दूरवाणीं कुर्वन्ती अपि सा एव।"

खिडक्यात् बहिः कृषिक्षेत्राणि दृश्यन्ते स्म।
हरितता बहिः आसीत्,
किन्तु अन्तः — रिक्तता।

"द्वितीयः पुत्रः इङ्ग्लैण्डदेशे वसति।
तेरहवीं-क्रियायां अपि न आगतः।
केवलं उक्तवान् — 'पापा, फ्लाइट् न लभ्यते।'"

आण्टी अद्य क्लान्ता अभवत्,
"त्यजतु भोः — कस्य प्रति क्रोधं कुर्मः?
यथा कालः, तथा अपि संततयः।"

अंकलः स्मयमानः,
सा मुस्कान —
यस्य मध्ये वेदना अपि आसीत्,
स्वीकारः अपि,
तथा च आशायाः ज्वाला अपि।

"बेटि, किञ्चिद् उक्तुम् इच्छामि।"
"आम् अंकल… वदन्तु।"

"स्वपुत्राय केवलं पिजनं, गन् च न शिक्षय।
एवम् अपि शिक्षय —
यत् सम्बन्धाः केवलं रक्तसंबन्धेन न भवति,
अपितु परवाहया निर्मीयन्ते।

एषा अपि बोधय —
यत् वृद्धौ माता-पितरौ न सन्ति जरा-जर्जरितौ मोबाइल्-यन्त्रौ —
येषां शक्तिर्नास्ति, ततः त्याज्याः स्युः।
किन्तु ते अपि पुरातन-रेडियोवद् —
किञ्चिद् खिन्नाः अपि सन्ति,
परं अद्यापि किञ्चित् निनादयन्ति।"

अहं मौना अभवम्।
यानस्य निनादः अपि मन्दः इव जातः।

"बेटि, जगत् बहु परिवर्तनं प्राप्नोति…
किन्तु यदि मातृत्वं, संस्कारः, सम्मानश्च स्थाप्यते —
तर्हि गृहं कदापि न भज्यते।"

किञ्चित्क्षणानन्तरं —
मौनता व्याप्ता।

अर्नवः शनैः मम गोदायां शिरः स्थाप्य उवाच —
"मम्मा! एते दादा-दादी — यथापूर्वं बहु भाषमाणाः आसन्, अधुना रुदन् इव दृश्यन्ते — बृहत्पुरुषाः अपि रुदन्ति वा?"

अहं तं सप्रेमम् आलिङ्ग्य उक्तवती —
"नहि पुत्र! किञ्चित् न जातम्।
कालानुसारं समयः परिवर्तते।
मम अपि मनसि जातं —
कस्मात् न अद्यैव अर्नवं उरःप्रदेशे सम्यक् आलिङ्गये…
यतो बृहत् जातः चेत् —
कच्चित् वात्सल्यं अधूरं न स्यात्।"

अंकलः आंटी च स्मितं कुर्वन्तौ आसाताम् —
शायद् तयोः अपि अभवत् —
"कोऽपि सम्बन्धः पुनः सञ्जातः —
न तु शब्दैः,
किन्तु भावैः।"

-Anita Gahlawat 



"ये कहानी आपको कैसी लगी? क्या इसने आपके दिल की किसी कोने को छुआ?"
"कृपया कमेंट करके ज़रूर बताइए — आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए बेहद अनमोल है।

"आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा। क्योंकि कहानियाँ तब पूरी होती हैं, जब पाठक उनके जवाब देते हैं।"





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