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Showing posts from November, 2025

वापसी का रास्ता भी कभी-कभी मंज़िल नहीं होता

  “वापसी का रास्ता भी कभी-कभी मंज़िल नहीं होता” लेखिका: अनिता गहलावत रीतिका को लगा था कि वह दर्द की आख़िरी सीढ़ी तक पहुँच चुकी है। जिस इंसान को उसने अपनी मुस्कान का कारण बनाया था, उसी ने एक दिन अचानक कह दिया— “हम… साथ नहीं चल सकते।” उस एक वाक्य ने उसे भीतर तक तोड़ दिया। रातें लंबी हो गईं, दिन खाली हो गए, और दिल… बिलकुल सुनसान। वक्त ने धीरे-धीरे उसके घावों पर धूल बिठा दी। वो संभली, वो मुस्कुराना सीखी, और खुद से फिर मिलने लगी। लेकिन जिंदगी को जैसे पूरा चक्र बनाना था। कई महीने बाद, एक शाम ऑफिस से लौटते हुए उसका फोन बजा— स्क्रीन पर नाम चमक रहा था: अरमान। रीतिका के हाथ ठिठक गए। सांस अटक गई। दिल… वही पुराना दर्द उठा लाया। कॉल उठी तो दूसरी तरफ वही आवाज़— हिचकती, टूटती, पछताती। “रीति… मुझसे गलती हो गई।” वो बोलता रहा— “तुम्हारी कमी हर जगह महसूस हुई। किसी से बात करते हुए भी तुम याद आईं। क्या… क्या हम फिर से कोशिश कर सकते हैं?” रीतिका चुप थी। उसकी आंखों में नमी थी, लेकिन वो आँसू उस पुराने दर्द के नहीं थे— बल्कि एक गहरी समझ के थे। प्यार वापस आ सकता है, लेकिन भरोसा…? वो दोबारा जन्म ले, ऐसा रोज़...

नंबर की दौड़- का दबाव कैसे दूर करें

 “नंबर की दौड़” – आज की पढ़ाई पर एक भावनात्मक कहानी 1. शुरुआत — एक शांत घर में उठता तूफ़ान सुबह के सात बजे थे। सूरज की रोशनी खिड़की पर फैलने लगी थी, लेकिन घर में सन्नाटा था। आरव की मम्मी ने तीसरी बार आवाज लगाई— “आरव, जल्दी उठो बेटा! ऑनलाइन टेस्ट है आज…” आरव करवट बदला, लेकिन उसकी आँखों के नीचे काले घेरे साफ़ दिख रहे थे। वो रात को देर तक पढ़ रहा था या मोबाइल चला रहा था, मम्मी को पता नहीं… मगर थका हुआ बच्चा बहुत कुछ कह जाता है, जो ज़ुबान नहीं कह पाती। आरव सिर्फ दसवीं में था। पर उसके ऊपर बोर्ड, कोचिंग, टेस्ट, रिज़ल्ट… सब पहाड़ की तरह टूट रहे थे। 2. माँ की चिंता और बच्चे का डर माँ ने हल्के से उसके माथे को छुआ। “बुखार तो नहीं है न?” आरव ने धीरे से जवाब दिया— “माँ… बस थक गया हूँ।” माँ जानती थी वो थका नहीं, टूट रहा है। पर आजकल के बच्चों की थकान सिर्फ नींद से नहीं उतरती… वो उतरती है अपेक्षाओं से, तुलनाओं से, और इस डर से कि अगर नंबर कम आए तो लोग क्या कहेंगे। माँ ने प्यार से कहा— “बेटा, अगर टेस्ट छूट भी जाए तो क्या हुआ? पहले खुद को संभालो।” आरव ने मम्मी की आँखों में देखा। उसे लगा जैसे किसी ने...

स्वाभिमान

  स्वाभिमान — सोच का आईना कहते हैं, स्वाभिमान कभी किसी से छीना नहीं जाता, बस अनुभवों से जागता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक बार मैंने अपने दो सहकर्मियों से—जो मेरी सहेलियाँ भी थीं—एक ही बात अलग-अलग समय पर कही। जिसे मैं अपना सबसे अच्छा दोस्त मानती थी, उसे भी बताया… और जिसे मैं सिर्फ एक साधारण-सी फ्रेंड समझती थी, उससे भी वही बात साझा की। लेकिन जवाब दोनों के बिल्कुल अलग थे। जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा था, जिसे अपनेपन की नजर से देखती थी, उसने तो मुझे बेझिझक सुना दिया। मैं चुप रही—क्योंकि उस समय स्वाभिमान ने कहा, "हर जवाब देने लायक नहीं होता।" वहीं, जिसे मैं कम महत्व देती थी, उसने इतने मीठे और सम्मानित तरीके से जवाब दिया कि दिल छू गया। उसके शब्दों ने समझा दिया कि दूरी रिश्तों में नहीं होती, सोच में होती है। तभी महसूस हुआ — हर इंसान अपनी सोच के स्तर से जवाब देता है। जिसका दिल शांत होता है, उसका जवाब भी मीठा होता है। और जिसके मन में उलझनें होती हैं, उसके शब्द भी उलझे होते हैं। उस दिन मैंने सीखा: **स्वाभिमान का मतलब है— जहाँ गलत व्यवहार मिले, वहाँ चुप रहना… और जहाँ सम्मान मिले, वह...