स्वाभिमान

 स्वाभिमान — सोच का आईना

कहते हैं, स्वाभिमान कभी किसी से छीना नहीं जाता, बस अनुभवों से जागता है।

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

एक बार मैंने अपने दो सहकर्मियों से—जो मेरी सहेलियाँ भी थीं—एक ही बात अलग-अलग समय पर कही।

जिसे मैं अपना सबसे अच्छा दोस्त मानती थी, उसे भी बताया… और जिसे मैं सिर्फ एक साधारण-सी फ्रेंड समझती थी, उससे भी वही बात साझा की।

लेकिन जवाब दोनों के बिल्कुल अलग थे।

जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा था,

जिसे अपनेपन की नजर से देखती थी,

उसने तो मुझे बेझिझक सुना दिया।

मैं चुप रही—क्योंकि उस समय स्वाभिमान ने कहा,

"हर जवाब देने लायक नहीं होता।"

वहीं, जिसे मैं कम महत्व देती थी,

उसने इतने मीठे और सम्मानित तरीके से जवाब दिया कि दिल छू गया।

उसके शब्दों ने समझा दिया कि दूरी रिश्तों में नहीं होती, सोच में होती है।

तभी महसूस हुआ —

हर इंसान अपनी सोच के स्तर से जवाब देता है।

जिसका दिल शांत होता है, उसका जवाब भी मीठा होता है।

और जिसके मन में उलझनें होती हैं, उसके शब्द भी उलझे होते हैं।

उस दिन मैंने सीखा:

**स्वाभिमान का मतलब है—

जहाँ गलत व्यवहार मिले, वहाँ चुप रहना…

और जहाँ सम्मान मिले, वहाँ दिल खोलकर मुस्कुराना।**

रिश्तों की गहराई पद, पहचान या नज़दीकी से नहीं,

बल्कि व्यवहार से पता चलती है।

उस दिन से मैंने तय कर लिया—

अपनी इज़्ज़त से बड़ा कोई रिश्ता नहीं,

और अपने स्वाभिमान से बड़ा कोई सच नहीं।


-Anita Gahlawat 

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