वापसी का रास्ता भी कभी-कभी मंज़िल नहीं होता

 “वापसी का रास्ता भी कभी-कभी मंज़िल नहीं होता”

लेखिका: अनिता गहलावत




रीतिका को लगा था कि वह दर्द की आख़िरी सीढ़ी तक पहुँच चुकी है।

जिस इंसान को उसने अपनी मुस्कान का कारण बनाया था,

उसी ने एक दिन अचानक कह दिया—

“हम… साथ नहीं चल सकते।”

उस एक वाक्य ने उसे भीतर तक तोड़ दिया।

रातें लंबी हो गईं,

दिन खाली हो गए,

और दिल… बिलकुल सुनसान।

वक्त ने धीरे-धीरे उसके घावों पर धूल बिठा दी।

वो संभली,

वो मुस्कुराना सीखी,

और खुद से फिर मिलने लगी।

लेकिन जिंदगी को जैसे पूरा चक्र बनाना था।

कई महीने बाद,

एक शाम ऑफिस से लौटते हुए उसका फोन बजा—

स्क्रीन पर नाम चमक रहा था: अरमान।

रीतिका के हाथ ठिठक गए।

सांस अटक गई।

दिल… वही पुराना दर्द उठा लाया।

कॉल उठी तो दूसरी तरफ वही आवाज़—

हिचकती, टूटती, पछताती।

“रीति… मुझसे गलती हो गई।”

वो बोलता रहा—

“तुम्हारी कमी हर जगह महसूस हुई।

किसी से बात करते हुए भी तुम याद आईं।

क्या… क्या हम फिर से कोशिश कर सकते हैं?”

रीतिका चुप थी।

उसकी आंखों में नमी थी,

लेकिन वो आँसू उस पुराने दर्द के नहीं थे—

बल्कि एक गहरी समझ के थे।

प्यार वापस आ सकता है,

लेकिन भरोसा…?

वो दोबारा जन्म ले, ऐसा रोज़ नहीं होता।

फिर भी उसने मिलने के लिए हाँ कहा।

अरमान आया—

वो सच में बदला हुआ दिख रहा था।

आँखों में पछतावा,

लहजे में नर्मी,

और बातों में बिखरी हुई अकेलापन।

कुछ हफ्तों तक वे फिर से बात करते रहे।

चलते हुए रास्ते,

कॉफी की कप,

पुरानी हँसी—

सब वापस आने लगे।

लेकिन लौटे हुए रास्ते कभी पुराने जैसे नहीं होते।

एक शाम, पार्क की बेंच पर बैठे हुए अरमान बोला—

“रीति, मैं फिर से सब ठीक कर दूँगा… बस तुम साथ चलो।”

रीतिका ने धीरे से उसकी आँखों में देखा।

वो मुस्कुराई—

दर्द के ज़ोर से नहीं,

बहुत शांत तरीके से।

“अरमान…

तुम्हारी वापसी ने मेरे घावों पर पट्टी तो रख दी,

लेकिन निशान… अब भी हैं।

और ये निशान मुझे रोज़ याद दिलाएँगे

कि तुम एक बार चले गए थे।”

अरमान की आँखें भर आईं।

वो कुछ बोल न पाया।

रीतिका ने अपना हाथ उसकी हथेली पर रखा—

गर्म, पर अब अपनापन नहीं था।

“हम दोनों की राहें अच्छी थीं,

पर साथ नहीं था।

तुम्हारी वापसी ने मुझे दर्द से निकाल दिया,

पर साथ में लौटने की हिम्मत नहीं दी।”

हवा हल्की ठंडी थी।

पेड़ों के बीच से छनती धूप उनके बीच गिर रही थी—

दो लोगों पर

जो कभी एक थे

और एक न रह सकने की सच्चाई के सामने खड़े थे।

रीतिका उठी।

धीरे से चलने लगी।

अरमान ने पीछे से पुकारा—

“रीति… एक आख़िरी बार बताओ—

क्या तुम कभी मुझे माफ़ कर पाओगी?”

रीतिका मुड़ी।

उसकी मुस्कान बेहद शांत थी।

“मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया, अरमान…

पर भूल नहीं पाई।

और जिस रिश्ते में भूल न हो पाए,

उसमें लौटना…

दोनों के साथ गलत है।”

अरमान वहीं बैठा रह गया—

हाथों में चेहरा छुपाए।

रीतिका दूर चली गई—

कदम हल्के, दिल साफ़।

दोनों की राहें अलग हो चुकी थीं।

लेकिन इस बार दर्द के साथ नहीं—

परिपक्वता के साथ।

सम्मान के साथ।

और उस समझ के साथ

जिसे सिर्फ टूटे दिल ही सीखते हैं—

कभी-कभी वापसी भी मंज़िल नहीं,

बस आख़िरी विदाई होती है।

-Anita Gahlawat 



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