कभी-कभी रिश्ते दो दिलों से नहीं, दो दुनियाओं से टकराते हैं। कुछ साथ आते हैं बिना किसी तैयारी के — जैसे पूजा और रणविजय। उनकी शादी एक सामाजिक समझौता थी, जहां प्रेम का कोई पन्ना अभी लिखा नहीं गया था। धीरे-धीरे बात तलाक तक पहुँच गई, और दो दिलों ने खुद को कानून की तारीखों में कैद कर लिया।
पर क्या हर अंत वाकई अंत होता है?
इस कहानी में हम जानेंगे कि कैसे एक बिखरा रिश्ता, एक टूटे संवाद और एक अनकहा प्रेम — फिर से जीवन पा सकता है।
क्या दो लोग, जो कभी अजनबी से भी बढ़कर हो जाते हैं, फिर से एक-दूसरे को अपनाने का साहस कर सकते हैं?
"फिर भी तुम मिले" सिर्फ एक प्रेमकथा नहीं, बल्कि रिश्तों की दूसरी सांस है — जहां दर्द भी है, दूरी भी, पर उम्मीद कभी नहीं मरती।
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कहानी का शीर्षक :- "फिर भी तुम मिले"
Written by Anita Gahlawat
शादी के तीन साल बाद पूजा और रणविजय की जिंदगी सामान्य लगती थी — बाहर से।
लेकिन अंदर रिश्तों में खामोशी पल रही थी।
एक दिन किसी बात पर पूजा ने गुस्से में कह दिया —
"अगर इतना ही बोझ हूं मैं, तो तलाक दे दो!"
उसने ये बात उस भाव में कही थी, जैसे हम सब कभी-कभी कह देते हैं — चोट खाकर, थककर, पर दिल से नहीं।
लेकिन रणविजय ने इसे अपनी "मर्दानगी पर चोट" समझा।
उसकी आंखों में जैसे कोई ठंडा तूफान उठ खड़ा हुआ।
"ठीक है पूजा, अब ये बात कह दी है तो भुगतो भी। मैं तलाक लूंगा — हर हाल में।"
पूजा चौंक गई, लेकिन सोचा, “अभी गुस्से में है… शांत हो जाएगा।”
पर वह ग़लत थी।
रणविजय ने इस बात को इगो का मामला बना लिया।
ना किसी की सुनी — ना पूजा की, ना अपने माता-पिता की, और ना ससुराल वालों की।
"मुझे इससे पीछा चाहिए। ये मुझसे खुश नहीं रहती। इससे कोई लेना-देना नहीं रखना अब।"
ये कहते हुए उसने कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल कर दी।
पूजा सन्न थी।
उसे विश्वास नहीं हुआ कि एक गुस्से में निकले शब्द को रणविजय इतनी दूर तक खींच लाएगा।
परिवार भी हैरान था —
"इतना प्यारा रिश्ता कैसे टूट सकता है?"
पूजा का मायका बहुत परेशान था।
मां-बाप को अपनी बेटी में ही गलतियां दिखने लगीं।
"तू ही कुछ बोल देती होगी... देखो अब तलाक तक बात पहुंच गई..."
पूजा के पापा ने धीरे से कहा —
"बेटा, रिश्ता निभाना चाहिए... तलाक हल नहीं होता हर बात का।"
पर रणविजय का जवाब सीधा था —
"मुझे इससे अलग होना है। मैंने फैसला कर लिया है।"
रणविजय और पूजा हर तारीख पर कोर्ट में समय से पहुंचते थे — लेकिन अब वे सिर्फ “हाज़िर हैं” बोलने वाले दो नाम बन चुके थे। एक-दूसरे के लिए जैसे कोई रिश्ता बचा ही नहीं था।
घर वाले दोनों तरफ से समझा चुके थे।
पूजा के मां-बाप ने रो-रोकर कहा था,
"बेटा, ससुराल में सहना पड़ता है, वापस मत आ... सब ठीक हो जाएगा।" पर रणविजय नहीं माना मां-बाप अपनी बेटी के आंसू कब तक देखते।
रणविजय के परिवार ने भी धीरे-धीरे कहना छोड़ दिया —
"जैसे चाहे वैसा करो। अगर साथ नहीं रहना तो छोड़ दो।"
पर रणविजय किसी की सुनने को तैयार नहीं था।
"यह बहुत पढ़ी-लिखी है, बहुत बड़ी बातें करती है... मेरे लायक नहीं है।"
वह हर बार यही कहकर बात काट देता।
पूजा अब थक गई थी।
उसने कहा था —
"माफ़ कर दो रणविजय... मैं सॉरी कह चुकी हूं... रिश्ता बचा सकते हैं।"
लेकिन रणविजय ने उसकी हर कोशिश को झटक दिया।
छह महीनों में पूजा की हालत पहले से पांच साल बड़ी दिखने लगी थी।
चेहरे की चमक बुझ चुकी थी।
वह अब चुपचाप आती, कोर्ट की बेंच पर बैठती — बिना किसी शिकायत के।
तीन-तीन तारीखें निकल गईं, पर उनके बीच कोई बातचीत नहीं हुई।
सिर्फ साइन, नंबर और अगली तारीख।
फिर एक दिन... जज छुट्टी पर थे।
पूजा और रणविजय अकेले आए थे — बिना किसी घरवाले, बिना किसी वकील के। पर सन्नाटा था कोर्ट के बाहर। वे आमने-सामने एक लंबी बेंच पर बैठे थे। इतनी तारिखों के बाद पहली बार रणविजय ने पूजा को ध्यान से देखा।
उसकी आंखों के नीचे गहरे घेरे थे, होंठों पर कोई रंग नहीं था — और निगाहें किसी को नहीं देख रहीं थीं।
रणविजय के घरवालों ने भी अब थक हार कर कह दिया था —
"अब बस कर दो... जो है, निबटा लो... और आगे बढ़ जाओ।" उस पल रणविजय को पहली बार अपने ही फैसले पर संदेह हुआ।
"क्या वाकई मैं कुछ जीत रहा हूं...?
या सिर्फ एक जिद को ढो रहा हूं?"
पूजा ने तो कुछ नहीं कहा।
पर उसकी खामोशी अब शोर बन चुकी थी। उस दिन तो ताव लगाकर कह दिया था चली जाओ मेरे घर से परंतु नहीं पता था कोर्टों के इतने झंझट हैं ।
तलाक की प्रक्रिया अभी अधूरी थी, और घर में शहनाइयों की तैयारी ज़ोरों पर चल रही थी —
रणविजय के छोटे भाई की शादी तय हो गई थी।
पूरा घर मेहमानों से भरा हुआ था, आंगन में हल्दी की हल्की सी खुशबू थी, और हर कोने में हंसी के फव्वारे गूंज रहे थे।
पर उसी शोरगुल के बीच रणविजय चुप था — और पूजा... ग़ायब थी और घर में आज उसे किसी ने याद भी नहीं किया।
"बड़ी बहू नहीं आ सकती… तलाक का मामला चल रहा है…"
यह बात मानो सबकी जुबान पर थी, लेकिन कोई साफ-साफ बोल नहीं रहा था।
बस हर रस्म में एक कुर्सी खाली रहती थी — पूजा की।
रणविजय की मां ने एक दिन बेहद कठोरता से कह ही दिया —
"तीन साल रही और एक बच्चा तक नहीं हुआ… यही सोचकर रखा था कि जब मन भर जाए, सब समेट के मायके चली जाएगी।
अब 50 लाख पर अड़ी है... जैसे शादी ब्याह कोई सौदा था।"
पूजा के गर्भधारण न करने को उसकी नीयत से जोड़ दिया गया था।
रणविजय सुन रहा था ये सब, चुपचाप।
कभी वो ऐसे नहीं बोलता था, पर अब जब बात ज़्यादा गहरी होती गई, तो उसे लगने लगा —
"क्या वाकई मेरी चुप्पी ने पूजा को गलत साबित कर दिया?"
रिश्तेदारों के बीच भी कानाफूसी हो रही थी —
"कुछ तो गड़बड़ होगी उस लड़की में...." वर्ना
"कौन छोड़ता है ऐसा लड़का? ज़रूर कोई और चक्कर होगा…"
हर कोई उंगली पूजा पर उठा रहा था, पर रणविजय अब
सवालों के घेरे में था — अपने दिल के सवालों के।
"क्या मैंने उसे समझने की कोशिश की थी?
क्या एक गुस्से में कही बात पर मैंने इतना बड़ा फैसला कर दिया?
क्या मेरे घर की चुप्पी ने उसे ‘चरित्रहीन’ बना दिया समाज में?"
हर रस्म, हर मंथन — रणविजय के अंदर कुछ तो हिला रहा था।
जब भाई और भाभी सात फेरे ले रहे थे, तो रणविजय अपनी शादी की फेरे याद कर रहा था —
और फिर पूजा के "हाथ छुड़ाने" का दिन भी।
“मैं तो चाहती थी साथ निभाना…”
पूजा की वो एक पुरानी लाइन अब उसके कानों में बार-बार
गूंज रही थी।
कोर्ट की तारीख नज़दीक थी।
उधर रणविजय शादी की चकाचौंध में भी लगातार कुछ खोया हुआ सा दिखता था —
लेकिन इधर पूजा की दुनिया और भी गहराई में डूब रही थी।
पूजा अब अपने ही घर में एक ‘संवेदनशील विषय’ बन चुकी थी।
कभी चाय बनाते-बनाते पापा चुप हो जाते,
कभी किसी बात पर मम्मी और पापा में बहस हो जाती —
"बेटी को ज़रा पहले ही क्यों नहीं समझाया…"
"अब क्या करें, जो होना था हो गया…"
वो बहस ज्यादा देर नहीं टिकती, क्योंकि दोनों जानते थे —
बेटी की टूटी आंखें सब कह जाती हैं।
अब पापा के चेहरे पर भी थकान झलकती थी।
कभी-कभी लगता जैसे पूजा उनके लिए बोझ बनती जा रही है — न चाहते हुए भी।
एक रात पापा ने धीमे से कहा:
"बेटा, तेरी ज़िंदगी उसके साथ अब नहीं कटेगी।
जैसा उसने किया, वैसा आदमी दोबारा भरोसे के लायक नहीं होता।"
मां ने भी धीरे से सिर हिलाया —
"तेरा दिल भले साफ हो, पर ये समाज… ये रिश्तेदार… सब उसके ही साथ खड़े हैं।
तू अब सिर्फ खुद पर भरोसा कर।"
"पढ़ाई फिर से शुरू कर… कुछ कोर्स कर ले… नौकरी पकड़।
तू खुद के पैरों पर खड़ी हो जा।"
फिर कुछ देर चुप्पी छाई रहती —
पापा अखबार में मुंह छिपा लेते, और पूजा तकिए में चेहरा दबाकर आंसू रोकती।
उन दोनों की यही दिनचर्या बन गई थी —
कभी खुद को समझाना, कभी बेटी को।
कभी बेटी को सहारा देना, कभी खुद से झगड़ना।
कभी ये सोचना कि शायद एक दिन रणविजय लौट आए…
फिर ये सोचकर खुद को डांटना कि “क्यों अब भी उम्मीद बाकी है?”
कोर्ट की तारीख फिर नज़दीक थी, लेकिन पूजा के मन में अब कोई रिश्ता नहीं बचा था —
बस एक थकान थी।
अब वो कोर्ट आती थी तो सोचती,
"काश आज कुछ फाइनल हो जाए… ये सब खत्म हो जाए।"
उसका दिल अब यह नहीं चाहता था कि रणविजय लौटे —
बल्कि बस इतना चाहती थी कि कोर्ट उसे रणविजय से ‘छुड़वा’ दे।
वकील की रणनीतियाँ, मजबूरी की फाइलें भी पूजा को झकझोर रही थी उसका वकील अब अलग दिशा में जा चुका था।
उसने कहा,
"अब अगर वाजिब मुआवजा चाहिए, तो हमें केस मजबूत
करना होगा।"
वकील की सलाह पर पूजा ने रणविजय पर
दहेज प्रताड़ना,
मानसिक उत्पीड़न,
शारीरिक हिंसा
जैसे कई धाराओं में केस लगा दिए।
पूजा खुद कभी-कभी यह सोचती थी,
"क्या ये सब वाकई जरूरी है...? क्या ये सब मैं पैसों के लिए कर रही हूं?" कई बार वो कोर्ट की बेंच पर बैठकर बड़बड़ाती —
"छोड़ो, जो चाहता है तलाक — दे देती हूं। मुझे क्या लेना-देना?"
पर अगले ही पल उसके सामने अपने पापा का चेहरा घूमने लगता।
मध्यमवर्गीय सच्चाई
"मेरे पापा ने कितनी मेहनत से मेरी शादी की थी..."
"छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई… उनकी शादियां… घर की EMI…"
पूजा को याद आ जाता कि वो किसी बड़े घर की लड़की नहीं थी।
वो जानती थी —
"मेरे जाने से सिर्फ मैं नहीं टूटी हूं… मेरे पूरे परिवार ने झेला है ये रिश्ता।"
रणविजय एलुमनी (maintenance) देने से साफ मना कर रहा था।
उसे लग रहा था —
"इतने सारे केस लगवा दिए… अब पैसे भी चाहिए?"
रणविजय का परिवार अब खुलकर पूजा के खिलाफ बोलने लगा था।
"इतनी चालाक लड़की है, हमें तो पता नहीं था, ये रिश्ता
कितना बेकार निकला।"
"अब समझ आया, तीन साल में बच्चा क्यों नहीं हुआ…"
रणविजय खुद भी इन सब आरोपों और कानूनी कार्रवाइयों के बोझ में घुटने लगा था।
ऑफिस में जब कोई सहकर्मी अपनी पत्नी या परिवार की बात करता —
वो खुद को उनसे अलग, अकेला और अपराधी महसूस करने लगता।
"मैंने क्या गलत किया...?
या जो किया, वो अब मुझे ही क्यों काट रहा है?"
एक रिश्ता — जो अब कागजों तक सिमट चुका है
रणविजय और पूजा अब एक-दूसरे के लिए कुछ नहीं थे —
ना प्रेमी, ना शत्रु — बस एक मुकदमा।
पर मन के अंदर…
दोनों जानते थे कि जो टूटा है, वो कभी पूरी तरह भुलाया नहीं जा सकता।
अब कोर्ट की पेशियाँ बस एक रस्म बनकर रह गई थीं।
कोई फैसला नहीं हो रहा था, न कोई बात हो रही थी —
बस तारीखें बढ़ती जा रही थीं, और थकान भी।
पूजा अब धीरे-धीरे खुद को समेटने लगी थी।
एक दिन यूं ही — चुपचाप, बिना किसी को बताए —
उसने पास की एक सार्वजनिक लाइब्रेरी ज्वॉइन कर ली।
वो सुबह से शाम तक वहीं बैठती —
कभी लॉ की किताबें पढ़ती,
कभी प्रतियोगी परीक्षाओं के नोट्स बनाती,
कभी अपने ही पुराने कागज़ पलटती।
लाइब्रेरी में शांति थी, ठंडक थी और सबसे ज़्यादा — जवाब
नहीं थे।
💭 लेकिन ये "लाइब्रेरी की शांति" हर दिन मन को शांत नहीं रख पाती थी।
पूजा मन ही मन सोचती,
"क्या ये वही ज़िंदगी है जिसके लिए मैंने इतना कुछ सहा था?"
हर कुछ दिन बाद वो खुद से हार जाती थी,
कभी पापा की आँखें याद आ जातीं — जो अब थोड़ी नम रहती थीं,
कभी मम्मी-पापा की आपसी तकरार —
जो अब बेटी के नाम पर होती थी।
पूजा ने कई बार चाहा कि बस सब छोड़ दे, तलाक दे दे,
लेकिन दिल के किसी कोने में वो लड़की अभी भी बैठी थी —
जिसने कभी रिश्तों को तोङना नहीं सीखा था।
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💔 अफसोस अब आदत बन गया था।
वो चाहकर भी उस एक दिन को नहीं भूल पाती —
जिस दिन बस गुस्से में, कहासुनी में उसने “तलाक” कह दिया था।
और रणविजय ने उसे ईगो पर ले लिया — बिना एक बार पीछे देखे।
कभी-कभी लाइब्रेरी की सबसे शांत कोने में भी
वो चीखें सुनाई देती थीं — जो कभी घर में नहीं निकली थीं।
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उधर रणविजय भी…
अपने ऑफिस में बैठा हुआ, अब पहले की तरह शेखी नहीं बघारता था।
वो भी अब हर दोस्त की शादी से दूर रहता था,
हर रिश्तेदारी की खुशी उसे चुभने लगी थी।
और अब…
एक ओर कोर्ट की तारीख पास आ रही थी।
पूजा सोच रही थी —
"क्या इस बार कुछ खत्म हो जाएगा... या फिर मैं ही खुद को ख़त्म कर दूँगी इस इंतज़ार में?"
यहां पूजा के ससुराल में अब सब कुछ नया हो गया था।
नई बहू,(देवरानी) नए रंग, नई आवाज़ें…
पर रणविजय के दिल में आज बहुत पुरानी सी हलचल उठी
आज दोपहर ऑफिस से जल्दी लौटते वक़्त
पता नहीं क्यों, उसके कदम पूजा के पुराने कमरे की ओर मुड़ गए।
दरवाज़ा खोलते ही एक धीमी-सी खुशबू जैसे पूरे कमरे में फैल गई।
वहीं कोना… जहां पूजा आर्टबुक रखती थी।
वहीं तकिया, जिस पर कभी वो लेटी थी और उसके बाल फैल जाते थे।
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🧳 अलमारी खोली… और वक्त ठहर गया
उसने धीरे से पूजा की अलमारी खोली।
साड़ी का एक किनारा बाहर झांक रहा था,
जैसे पूजा की कोई अधूरी बात… जो कहे बिना रह गई हो।
एक-एक कर साड़ियां निकालने लगा।
🧵“ये तो उस दिन पहनी थी जब मेरे दोस्तों की वाइफ आई थी…
पूरी शाम सबने पूजा की तारीफ की थी…”
🧵“ये वाली तब पहनी थी जब मंदिर चलने को कहा था,
पूरे रास्ते नाराज़ रही थी,
पर लौटते वक्त बोली थी — 'चलो, अच्छा लग रहा है साथ घूमना…'”
🧵“और ये… ये तो हमारी पहली करवा चौथ वाली साड़ी है…
पूरे दिन भूखी रही थी…
मैं तो ऑफिस से भी टाइम पे नहीं आया था…”
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कपड़े नहीं, रिश्ते बिखरे पड़े थे
वो अब कपड़ों को नहीं देख रहा था,
बल्कि बीते हुए अपने हर गलत फैसले को टटोल रहा था।
हर साड़ी में पूजा की मुस्कान छिपी थी,
हर फोल्ड में उसकी चुप्पी।
“कितना कुछ सह गई थी वो…”
आज रणविजय को पहली बार लगा —
पूजा ने कभी कुछ मांगा नहीं,
शिकायत नहीं की,
पर उसकी आंखें बहुत कुछ कहती थीं।”
“नई बहू तो आराम से जवाब देती है,
पूजा ने तो हर बात पर मुस्कराहट से पर्दा डाल दिया था।”
नई बहू जॉब करती है,
फाइनेंस वाली है — सब उसे खास समझते हैं।
मां तक अब प्यार से बोलती हैं —
“बिटिया ऑफिस से आ रही है, थकी होगी…”
“मेरे लिए तो घर वालों के भी रूल्स थे —
पूजा कितने बजे उठी, क्या पहना, क्या खाया… मां भी कह
देती थी बहू को समझा !!
आज पूजा की अलमारी में रखी
एक पुरानी कंघी को देखते हुए
रणविजय फूट पड़ा।
"मैंने क्या खो दिया…
कितना कुछ था उसमें,
जो मैं कभी देख ही नहीं पाया…"
वो जानता था —
अब कुछ भी कहने का हक़ नहीं बचा…
वो अब बस दर्शक था
अपनी ही बर्बादी की कहानी का।
यह पूरा दृश्य रणविजय की अंतरात्मा की पहली सच्ची स्वीकारोक्ति है।
यह दृश्य दिखाता है कि कैसे एक आदमी समझता है,
जब कुछ नहीं बचता।
“उसने मुझे एक बार भी नहीं देखा…” सोच रहा था
कोर्ट परिसर में चहल-पहल थी।
जैसे हर कोई किसी अपने के लिए कुछ लड़ रहा हो।
फिर भी कुछ रिश्ते — बिना लड़े ही हार मान चुके थे।
रणविजय कोर्ट के बाहर उसी बेंच से कुछ दूरी पर बैठा था,
जहां कभी वो और पूजा एक-दूसरे के पास बैठा करते थे।
आज…
वो सिर्फ बैठा नहीं था, वो देख रहा था… लगातार।
👁️ उसकी आंखें पूजा की आंखों को ढूंढती रहीं...
वो हर पल इस इंतज़ार में था —
पूजा एक बार आंख उठाए…
एक बार नज़र टकराए…
“क्या आज भी उसकी आंखों में मेरा नाम बाकी होगा?”
रणविजय सोचता रहा। लेकिन…
पूजा ने एक बार भी उसकी ओर नहीं देखा।
पूजा आज हल्की सी गुलाबी सूट में थी।
चेहरे पर बहुत सजी-धजी नहीं थी,
पर रणविजय को आज वो पहले से कहीं ज्यादा सुंदर लग
रही थी। पर उसकी सबसे सुंदर चीज़ थी — उसकी चुप मुस्कान। जो अब रणविजय के लिए नहीं थी।
भाई विकास कुछ कह रहा था,
मामा का बेटा सुमित हँसा रहा था,
और पूजा… धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी।
रणविजय के दिल के अंदर कुछ दरक रहा था।
“कभी ऐसा ही तो वो मेरे साथ भी मुस्कुराया करती थी…
अब लगता है जैसे मैंने अपनी जगह खुद खाली कर दी।”
सुमित जूस लेकर आया,
तीन गिलास — सबके हाथ एक -एक ।
पूजा ने बस एक घूंट लिया,
और फिर चुपचाप गिलास सुमित को दे दिया।
रणविजय को याद आया —
"खुद से ज़्यादा मेरी भूख का ख्याल रखती थी वो…"
अब वो किसी और के हाथ से जूस लेकर उसी तरह मुस्कुरा
रही थी — लेकिन अब वो मुस्कान मेरी नहीं रही।
रणविजय की आंखों में हल्की सी नमी तैरने लगी।
वो चाहता था —
पूजा एक बार आंख उठाकर देखे,
शायद कुछ कहे,
शायद बस हल्के से सिर हिलाकर उसकी मौजूदगी को स्वीकार करे।
पर पूजा जैसे कोई और ही दुनिया में थी।
अब उसमें रणविजय के लिए कोई दरवाज़ा नहीं बचा था।
“क्या कभी ऐसा वक्त आएगा,
जब ये मुस्कान फिर मेरी वजह से लौटेगी…?”
वो सोचता रहा।
पर सच ये था कि —
रणविजय अब बस एक बीता हुआ पन्ना था,
जिसे पूजा ने फाड़कर नहीं,
बस धीरे-धीरे मोड़कर बंद कर दिया था।
⚖️ और तारीख फिर टल गई…
क्लर्क की आवाज़ आई —
“जज साहब की छुट्टी है। अगली तारीख दे दी गई है।”
पूजा उठी, भाइयों संग चल दी।
रणविजय फिर वहीं बैठा रह गया…
जैसे उसकी ज़िंदगी की तारीखें भी बस बढ़ रही हों,
पर कोई फ़ैसला अब भी अधूरा हो।
✍️ “उसे देखना — अब मेरी आदत बन चुकी है… पर उसे खो देना — मेरी सज़ा।”
शाम ढल गई थी, रणविजय थका-हारा घर लौटा। दरवाज़ा खोला, हल्का अंधेरा था। वही पुरानी आदत — मां ने दरवाज़ा खुला छोड़ दिया था। किचन में चुपचाप रखा था — दो रोटी, थोड़ी सी सब्ज़ी, और एक ठंडी सी चाय।
मां ने दूर से बस इतना कहा —
"बेटा, आ गया? खाना रखा है, खा लेना... मेरी कमर में दर्द है, मैं सो जाती हूं।"
और वह धीमे-धीमे अपने कमरे में चली गईं, बिना यह पूछे कि बेटा थका है या टूटा है।
पापा ने पूछा —
"आज हियरिंग थी ना? टाइम से आया कर घर... अब देर से आने वालों के लिए गेट नहीं खोले जाएंगे रोज़। कौन जागेगा इतनी रात तक?"
रणविजय ने हल्की मुस्कान छुपाई, जो दरअसल अंदर की हूक थी —
"पापा, आज ऑफिस में इन्क्रीमेंट मिला था, स्टाफ ने पार्टी रख दी... कल छुट्टी है, इसीलिए..."
पापा टीवी के चैनल बदल रहे थे । कोई बधाई नहीं, कोई ‘गर्व है’ जैसी बात नहीं। बस चुप्पी।
रात को वह देरी से सोया। सुबह थोड़ी देर से उठा। घर में सन्नाटा था। छोटी बहू ऑफिस नहीं गई थी आज, इसलिए घर के कामकाज निपटा रही थी। रणविजय ने बिना ज़्यादा सोचे बाइक निकाली और निकल पड़ा।
जब लौटा, तो देखा — पोछा लगा ही था, ताज़ा गीला फर्श और उसके बाइक के टायरों के गहरे निशान।
वो समझ ही नहीं पाया, पर अगले पल जो हुआ, उसने दिल तोड़ दिया।
छोटा भाई बोला —
"थोड़ा देख कर बाइक खड़ी करनी थी भैया, यहां कोई नौकर नहीं लगा है आपके लिए। प्रियंका ने टाइम निकालकर पोछा लगाया है — बार-बार थोड़ी लगाएगी?"
रणविजय स्तब्ध रह गया। एक पल के लिए जैसे शब्द गूंजते रह गए, लेकिन आवाज़ सब शांत थी।
"नौकर?"
"भैया?"
"पोछा?"
उसे याद आया, कभी यही छोटा भाई मां को पूजा को लेकर कितना भड़कता था —
"भाभी तो कुछ काम नहीं करतीं, न खाना बनाना आता है..."
और वह... वह रणविजय...
मैं अपनी पत्नी पूजा के लिए कभी एक शब्द नहीं बोला।
सब कुछ चुपचाप सहता रहा- कभी मां के सामने, कभी ऑफिस के तनाव में, कभी कोर्ट के बहसों में, और सबसे ज्यादा — अपने ही मन के अंदर।
वह ऊपर अपने कमरे में गया। पहले की तरह नहीं, इस बार बहुत धीमे।
कमरे में घुसते ही सबसे पहले नजर पड़ी उस फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट पर — "पूजा"
ब्लैकलिस्ट में थी अब भी।
पर पता नहीं क्यों, आज एक बार भी झिझक नहीं आई।
उसने झट से उसे अनब्लॉक किया।
"क्या कर रहा हूं मैं...? जिस इंसान से जुड़ी हर याद आज मेरी सांसों में जिंदा है, उसे मैंने खुद धकेल दिया उस कोने में?"
और उसने हिम्मत करके कॉल किया।
फोन बजता रहा...
एक बार... दो बार... तीन बार...
कोई उत्तर नहीं।
फिर उसने सोचा —
"शायद अब मेरा नंबर भी ब्लैकलिस्ट में होगा... जैसे मैंने किया, वैसे ही उसने भी कर दिया।"
"उसके पास अब मैं नहीं हूं, पर मेरे पास भी अब कोई नहीं बचा..."
मां अब सिर्फ खाना रख देती हैं।
पापा सिर्फ टाइम पूछते हैं।
भाई अब ताना देता है।
और पत्नी?
वो तो अब बस यादों में रहती है...
और यादें भी आज बहुत ज़िंदा लग रही थीं।
उसे याद आया —
"पूजा की वो चुप मुस्कान, जब मैं गुस्से में ऑफिस निकलता था..."
"वो सवाल भरी आंखें जब मैं देर रात आता था..."
"वो आवाज़, जो मुझसे कभी लड़ नहीं सकी, बस टूटती रही..."
और आज?
"क्या पूजा भी मुझे याद करती है?"
"क्या उसने भी कभी फोन उठाकर मेरा नाम देखा होगा, फिर रख दिया होगा?"
"क्या उसे भी कभी नींद नहीं आती?"
वो बस लेट गया, एकटक छत को देखता रहा।
आंखें बंद कीं — तो आवाज़ आई — "रणविजय, खाना खा लो, मैंने तुम्हारे लिए बनाया है..."
पर आंखें खोलने पर सिर्फ सूनापन था।
उस रात, पहली बार रणविजय ने खुद से पूछा —
"मैं क्या खो आया हूं?" मैं पूजा ने ब्लैक लिस्ट में डाल रखा हूं
आज गाड़ी सड़क पर दौड़ रही थी, लेकिन रणविजय का दिल जैसे कांप रहा था।
स्टीयरिंग थामे उसका हाथ बार-बार पसीने से भीग रहा था।
"2 साल..."
पूजा को देखे हुए...
पूजा से बात किए हुए...
पूजा को गंवा दिए हुए...
और आज, अपने ही घर के रिश्तों से जब हार गया,
मां की चुप्पी जब चुभने लगी,
भाई की बातों ने ज़हर जैसा असर किया,
तब... बस एक नाम बार-बार दिमाग में आया — ‘पूजा।’
लेकिन अब?
न कोई नंबर था
न कोई पहचान
बस एक रास्ता था —
"चलो, एक बार उसके दरवाज़े तक..."
गाड़ी घर के पास आकर रुक गई।
घर की वो पुरानी पहचान — वही नीली सी खिड़की, वही आम का पेड़, और वही दरवाज़ा ।
गाड़ी में बैठे-बैठे उसने 10 मिनट यूं ही निकाल दिए।
कुछ समझ नहीं आया —
"क्या ले जाऊं?"
"क्या कहूं?"
"क्या कोई पहचान पाएगा मुझे?"
लेकिन फिर अपने ही घर के ताने उसके कानों में गूंजने लगे —
"तुम्हारे लिए अब कोई नहीं जागेगा..."
"यहां कोई नौकर नहीं है तुम्हारे लिए..."
इन आवाज़ों ने उसे खड़ा कर दिया।
"अब अगर पूजा का घर भी दरवाज़ा बंद कर दे... तो फिर मैं कहां जाऊं?"
रणविजय ने दरवाज़ा खटखटाया।
आंगन में पूजा के पापा अखबार पढ़ रहे थे।
दरवाज़ा खुला — और जैसे समय रुक गया।
एक लंबा, बहुत लंबा सन्नाटा...
पापा की आंखों में हैरानी, गुस्सा और खिंची हुई परतें थीं।
"अरे... रणविजय...? ये कौन-सी जरूरत आन पड़ी है तुम्हें यहां?"
रणविजय ने हल्के स्वर में सिर झुकाया —
"नमस्ते अंकल... मैं... पूजा से..."
"रुको!" पापा ने बात बीच में काट दी —
"नमस्ते-वमस्ते छोड़ो, पहले ये बताओ — आज क्यों आए हो? क्या लेने आए हो यहां?"
रणविजय की आंखें झुक गईं।
तभी पूजा की मां अंदर से निकल आईं।
उनकी आंखें रणविजय को देखते ही लाल हो गईं।
वो वो मां थीं जो कभी पूजा की शादी के बाद कहती थीं — "हमने अपनी बेटी सौंप दी एक सभ्य, समझदार घर में..."
अब वही आंखें बोल उठीं —
"रणविजय! क्या शादी तुम्हारे लिए कोई गुड़ियों का खेल थी?"
"जिसे जब मन आया खेल लिया, जब मन भर गया तो छोड़ दिया... अब क्या लेने आए हो?"
"पूरी दुनिया के सामने मेरी बेटी की बेइज्जती करवा दी, उसके चरित्र पर सवाल उठवाए, उसे कोर्ट में जाने को मजबूर किया... और अब क्या सम्मान देने आए हो?"
रणविजय अब भी चुपचाप खड़ा था।
एक शब्द नहीं कहा।
बस आंखें नीची, दिल भारी।
"बोलो रणविजय! क्या जवाब है तुम्हारे पास?" मां का स्वर अब कांप रहा था।
रणविजय ने बहुत धीरे से कहा —
"माफ कर दीजिए आंटी... मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई।"
"मुझे पूजा की कीमत तब समझ आई जब सबने मुझे खुद से दूर कर दिया... और तब जाना, कि वो तो बिना कुछ कहे भी मेरे साथ थी।"
"आज कोई रिश्ता नहीं बचा मेरे पास, न मां जैसी मां, न भाई जैसा भाई... लेकिन अगर कहीं एक रिश्ता सच्चा था, तो वही था जिसे मैं ठुकरा आया था।"
"मैं लौट आया हूं, पर कुछ मांगने नहीं... बस पूछने —
क्या अब भी आपके घर में मेरे लिए सिर्फ एक 'मुलाक़ात' की जगह है?"
घर में फिर सन्नाटा छा गया।
मां अंदर चली गईं।
पापा की नजर अब भी तल्ख़ थी, पर थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा
"पूजा घर पर नहीं है। ऑफिस गई है। अगर मिलना ही है, तो शाम को आ जाना।"
रणविजय कुछ पल वही खड़ा रहा, फिर धीरे से बोला —
"मैं लौट जाऊंगा... लेकिन आज के बाद अगर दरवाज़ा खोलना हो, तो पूजा की मर्जी से..."
वो वापस मुड़ गया — लेकिन अब उसके कदम पहले जैसे नहीं थे।
अब उनमें पछतावे के साथ प्रेम भी था।
"अब जो भी करूं, सिर्फ एक के लिए करूं... पूजा के लिए।"
शाम के ठीक चार बजे पूजा ने ऑफिस से घर में कदम रखा।
थकी हुई थी, लेकिन चेहरे पर आत्मविश्वास की हल्की-सी चमक थी।
अब वह वो पूजा नहीं थी जो कभी रणविजय की डांट से डर जाती थी —
अब वह अपने पैरों पर खड़ी एक आत्मनिर्भर स्त्री थी, जिसकी ज़िंदगी पटरी पर लौट रही थी… या शायद लौट चुकी थी।
अभी बैग रखा ही था कि मां ने धीरे से कहा —
"बेटा, आज वो आया था..."
पूजा ने चौंक कर देखा —
"वो कौन मां?"
"रणविजय..."
एक पल के लिए जैसे सांस थम गई।
"क-क्या... रणविजय??"
"हां... आज घर आया था। दरवाज़े पर खड़ा था... पापा से बात करने आया था।"
पूजा ने भौंहें चढ़ाईं —
"किसलिए? एलिमनी कम करवाने की रिक्वेस्ट करने?"
मां चुप रहीं।
फिर थोड़ी देर बाद धीरे से बोलीं —
"नहीं... आंखों में कुछ उलझन थी उसकी...
जैसे कुछ टूट गया हो उसमें...
वो बात करना चाहता था।
पर तेरे पापा ने उसे कुछ खास कहने भी नहीं दिया।"
पूजा की आंखों में ताज्जुब था, पर होंठों पर कटाक्ष।
"मां, अभी कोर्ट का कोई फैसला नहीं आया।
अभी तक तो है ही दामाद — तभी थोड़ी दया आ गई आप लोगों को?"
मां कुछ कहतीं, उससे पहले पूजा खुद ही मुस्कुरा दी — एक तीखी, जानबूझकर उखड़ी हँसी।
"शायद डर गया होगा...
सोच रहा होगा कि मैं केस जीत न लूं...
या एलिमनी ज़्यादा हो जाए...
इसलिए आया होगा माफ़ी मांगने... थोड़ा दीन बनकर... थोड़ा शरीफ दिखकर।"
मां ने धीमे से कहा —
"बेटा, मैं कुछ नहीं कह रही...
पर बातों से नहीं, कभी-कभी आंखों से भी सच दिखता है।
आज उसकी आंखें खाली नहीं थीं... भरी हुई थीं।"
पूजा कुछ नहीं बोली।
वो उठकर किचन में चली गई।
लेकिन चाकू चलाते हुए ध्यान सब्ज़ियों पर नहीं, उसी आंखों पर था, जिनका जिक्र मां कर चुकी थीं।
"रणविजय... कैसे आ गया अचानक?"
"क्या उसे भी... मेरी याद आने लगी है?"
"या फिर ये सब कोर्ट से बचने की चाल है?"
"वो मुझे फिर से मोहरे की तरह इस्तेमाल करना चाहता है क्या?"
पर इन सारे सवालों के बीच एक हल्की-सी बात पूजा को चुपचाप मुस्कुराने पर मजबूर कर रही थी —
"आज भी उसे मेरा घर याद था..."
जब चाय का पानी गैस पर चढ़ा, तब भी उसका ध्यान रणविजय पर ही था।
जब वो फ्रिज में दूध रख रही थी, तब भी मन में बस वही प्रश्न था —
"अगर उसने सच में मुझे याद किया, तो अब तक क्यों नहीं किया?"
फिर जैसे खुद को ही जवाब दिया —
"क्योंकि वो मुझसे प्यार नहीं करता...
अगर करता, तो मेरे सामने मुझे बदचलन कहने वालों के आगे खड़ा न होता..."
और यह सोचते ही आंखें नम हो गईं — पर उसने जल्दी से खुद को संभाल लिया।
"नहीं! अब मैं फिर से कमजोर नहीं पड़ूंगी..."
"अगर वो आया भी है, तो उसे जवाब इस बार मुस्कान से नहीं, ताकत से मिलेगा।
अब वो पूजा नहीं जो सिसकियों में डूब जाती थी।
अब मैं जवाब देती हूं — खुद के लिए, अपनी इज़्ज़त के लिए।"
पर इस सबके बीच,
दिल के किसी कोने में आज हलचल थी...
एक चाहत थी...
कि काश, वो सच में बदल गया हो।
काश... ये सब सिर्फ कोई चाल न हो।
"अब मैं वही पूजा नहीं हूं..."
पूजा ने देर रात मोबाइल उठाया। मन ही मन कुछ उखड़ा-उखड़ा था, पर चेहरा शांत — जैसे कुछ साबित करना हो खुद को।
नंबरों की लिस्ट देखी, उन ब्लॉक किए गए रिश्तों की कब्र खोली, और ठंडी सांस लेते हुए रणविजय का नंबर अनब्लॉक कर दिया।
"देखती हूं, अब किसमें हिम्मत है मुझसे बात करने की…"
कहती हुई बत्ती बुझाई और तकिए से पीठ टिका दी — दिल में हलचल थी, पर चेहरा निर्विकार।
उधर रणविजय —
नंबर देखा चालू है।
साँसे बढ़ीं, दिल उछला।
कॉल कर दी —
रिंग गई, पूजा उठाएगी क्या?
हाथ कांपने लगे, और डर के मारे खुद ही कॉल काट दी।
फोन की स्क्रीन देखता रहा, जैसे कोई फैसला हो जाना है।
पूरी रात करवटें बदलता रहा —
पूजा की आवाज़, उसकी चुप्पी, उसकी नाराज़ी… सब याद आता रहा।
सुबह तक रणविजय की आंखें लाल थीं — नींद गायब।
पूरे घर में जैसे कुछ बचा ही नहीं, बस एक पूजा रह गई थी — जिससे मिलने का हक अब सिर्फ कोर्ट की तारीखों में रह गया था।
उधर पूजा ने अलार्म के साथ आँखें खोली —
आंखों में थकान नहीं थी, बल्कि एक सख्त चमक थी।
मोबाइल चेक किया —
रणविजय की मिस कॉल!
होंठों पर तिरछी मुस्कान आई —
"हिम्मत तो की उसने... पर अभी मैं कॉल बैक करूं? क्यों? किस हैसियत से?"
मन बोला — शायद कोई बहाना हो, शायद वकील ने भेजा हो, या शायद रणविजय ने पहली बार खुद से कॉल की हो।
पर पूजा अब भावनाओं के तराजू पर झूलने वाली लड़की नहीं रही।
वो जानती थी उसका दर्द कितना गहरा है —
और अब वो खुद अपने फैसलों की मालिक है।
घरवालों से बोली —
"वो कॉल करे या ना करे, अब फर्क नहीं पड़ता। मुझे उस इंसान से कोई उम्मीद नहीं।"
आवाज़ सख्त थी, लेकिन किसी को ये भनक नहीं लगी कि उसके दिल के किसी कोने में रणविजय के इस कॉल ने एक हल्का सा कंपन ज़रूर किया था।
अब कोर्ट की अगली तारीख पास थी —
पूजा सोच रही थी,
"अब मैं चुप नहीं रहने वाली। इस बार जो भी होगा, मैं खुद से कमजोर नहीं पड़ूंगी। वो जैसे भी बर्ताव करे, मैं अब वही पूजा नहीं हूं जिसे वो कभी छोड़ गया था।"
उस दिन की तैयारी वो किसी दुल्हन की तरह नहीं कर रही थी,
बल्कि एक योद्धा की तरह —
जो भावनाओं के मैदान में भी, आत्मसम्मान की तलवार लेकर उतरने वाली है।
11 बजे के आसपास रणविजय का फ़ोन आता है पूजा हिम्मत करके फ़ोन रिसीव तो कर लेती है पर 30 सकैड कुछ नहीं बोलती। सामने से आवाज आती है पूजा मुझे माफ़ कर दो!
प्लीज़ मुझसे एक बार बात जरूर करना , "अगर थोङा सा भी यकीन है तो काल कर लेना" मैं तुम्हारे फ़ोन का इंतजार करूंगा....
पूजा कॉल कटने के बाद भी कुछ देर तक स्क्रीन को देखती रही। उस हल्की-सी कंपन, उस "रणविजय कॉलिंग..." की चमकती पंक्ति ने उसके भीतर का सारा ठहराव हिला दिया था।
वो जानती थी—ये कॉल सिर्फ एक कॉल नहीं थी। ये वो सवाल था जो इतने महीनों से हवा में झूल रहा था। जवाब भी हवा में था... पर आज ज़मीन पर आ गिरा था।
ऑफिस की दीवारें, कंप्यूटर की आवाज़ें और की-बोर्ड की खटखट सब पीछे छूट गई थीं। सिर्फ एक वाक्य रह गया था — "पूजा मुझे माफ कर दो..."
शाम को घर लौटकर मां से बात की। मां की आंखें थोड़ी नम हो गईं, पर होंठ मुस्कुरा दिए।
"बेटा, माफ करना कोई कमज़ोरी नहीं होती," मां ने पूजा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "लेकिन फिर से टूटने का डर भी बड़ा होता है।"
पापा अब भी सख्त थे। बोले —
"मैं जानता हूं ये लड़का पहले क्या कर चुका है। ये वही है ना जो हमारी बच्ची को अकेला छोड़ गया था जब वो सबसे कमजोर थी?"
पूजा कुछ नहीं बोली। सिर झुकाए बैठी रही। जैसे कोई तूफान अंदर ही अंदर हर दीवार से टकरा रहा हो।
पापा का गुस्सा वाजिब था। पर एक पिता सिर्फ गुस्से से नहीं, डर से भी भर जाता है।
डर—कि कहीं उसकी बच्ची फिर ना टूट जाए...
पापा बोले, "मैं समधीजी से बात करना चाहता हूं। देखता हूं क्या सोचते हैं वो। हमें ये रिश्ता फिर से उसी मोड़ पर ले जाना है या हमेशा के लिए बंद कर देना है। लेकिन इस बार हम कोई गलती नहीं करेंगे।"
पूजा चुप रही... लेकिन रणविजय की आवाज़ अब भी कानों में गूंज रही थी—
"अगर थोड़ा सा भी यकीन हो तो, कॉल कर लेना... मैं इंतज़ार करूंगा..."
उस रात…
पूजा अपने बेडरूम में करवटें बदल रही थी।
कमरे में धीमी रोशनी थी और खिड़की से हल्की हवा अंदर आ रही थी, लेकिन उसके भीतर एक तूफान था।
वो सोच रही थी —
“क्या कॉल करूं? नहीं… नहीं करना चाहिए… पर आज उसने जो कहा… जैसे कुछ बदल गया हो उसमें…”
फोन तक हाथ जाता, फिर रुक जाता।
दिल कहता – “एक बार… बस एक बार बात करके देख लो…”
और आखिरकार —
रात 11:04 पर उसने कॉल कर दिया।
उधर रणविजय...
फोन हाथ में लिए बैड पर लेटा हुआ था। बार-बार फोन चेक कर रहा था।
गूगल पर सर्च कर चुका था — “रूठी पत्नी को कैसे मनाएं”, “कैसे कहें कि अब भी प्यार है”, “प्यार दोबारा कैसे शुरू करें…”
परंतु पूजा का कॉल नहीं आया था… अभी तक।
और तभी —
रिंग बजी। स्क्रीन पर नाम चमका — पूजा Calling…
उसने बिना एक सेकंड गंवाए कॉल उठा लिया।
> "हाय…"
आवाज आई… धीमी, (डूबी हुई…) जैसे किसी गीले रुमाल में लिपटी हो।
रणविजय की आंखों में चमक आ गई।
बॉडी में बिजली सी दौड़ गई।
> "हेलो पूजा… कैसी हो? मैं… बहुत वेट कर रहा था तुम्हारे फोन का। मुझे यकीन था — तुम करोगी। कैसी हो यार?"
पूजा चुप।
फिर धीमे से बोली —
> "मैं ठीक हूं। फोन क्यों किया था? कोई बात है क्या?"
रणविजय की आवाज थोड़ा कांपी, पर अब वो ठान चुका था।
> "हां… है।
क्या हम दोबारा… एक साथ नहीं चल सकते?"
पूजा चौंकी। उसने आंखें बंद कर लीं। कुछ देर सांस रोक कर बोली —
> "कैसे चले रणविजय?
कितने दिन हो गए… हम दो रास्तों पर निकल चुके हैं।
अब हम अजनबी हैं —
ना मुझे तुम्हारी ज़िंदगी की खबर है,
ना तुम्हें मेरी।
तुम कैसे याद करने लगे मुझे?
या फिर कोर्ट की तारीखें भारी लगने लगीं?
मैंने तो उतनी ही रकम मांगी है जितना मेरी शादी में दिया गया था।
तुम्हारा परिवार तो बड़ा है, पैसे वाला है —
मेरे जैसी… कितनी ले आओगे।"
रणविजय चुपचाप सुन रहा था।
पूजा की आंखें नम थीं, लेकिन गुस्सा उसके शब्दों में था।
> "हम सीधी-सादी ज़िंदगी जीते हैं।
कोर्ट के इन चक्कर से मुझे आज़ाद कर दो… बहुत अहसान होगा।"
रणविजय की सांस थम गई, पर आवाज में ठहराव था:
> "पूजा…
आज तुम जो कहो, मैं सुनने को तैयार हूं।
गुस्सा निकाल लो, पर फोन मत काटना।
क्योंकि आज… मैं सच में कहना चाहता हूं —
मैं… तुमसे प्यार करने लगा हूं।
शायद दूर होकर… ज़्यादा।
हमारी शादी अरेंज थी,
लेकिन अब… मेरा दिल अरेंज नहीं है।
ये… बस तुम्हारे लिए धड़कता है।"
पूजा की आंखें भर आईं… पर होंठ अब भी सख्त थे।
फोन के दोनों ओर खामोशी थी —
जैसे दो दिलों की नब्ज़ें एक लय में चलने लगी हों…
"वो रात जिसके बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा"
(रणविजय और पूजा के दिल की दीवारें ढहने लगी थीं)
फोन पर अब भी खामोशी थी।
रणविजय का दिल धड़क रहा था — जैसे हर पल पूजा के जवाब पर रुका हो।
और दूसरी तरफ पूजा की आंखों में आंसू थे, लेकिन मन अभी भी खुद से लड़ रहा था।
पूजा ने गहरी सांस ली, और बोली —
> "प्यार…?
रणविजय, प्यार सिर्फ कहने से नहीं होता…
वो तब होता है जब सामने वाला महसूस करे।
उस वक़्त जब मुझे तुम्हारी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी…
तुम नहीं थे।
मैं रोज़ शाम तुम्हारे लौटने का इंतज़ार करती थी…
और तुम या तो दोस्तों के साथ, या मोबाइल में उलझे रहते थे।
मुझे नहीं लगता… हम फिर वैसे हो सकते हैं…"
रणविजय ने गहरी आवाज में कहा —
> "हम 'वैसे' नहीं…हो सकते हैं पूजा।
तुम जानती हो, मैं पहले कभी रिश्तों को समझ नहीं पाया।
तुम्हारा रोना मुझे तकरार लगता था…
अब समझ आता है — वो रोना मेरे लिए था।
आज अगर तुम कह दो कि ये सब बेकार है…
तो मैं हार मान लूंगा।
लेकिन अगर तुम बस इतना कह दो कि…
'तुम्हें थोड़ा वक्त चाहिए' —
मैं बिना शर्त इंतजार करूंगा।"
फोन पर सन्नाटा… लेकिन मन भारी नहीं था।
वो सन्नाटा था जो दो टूटे दिलों के बीच पुल बन रहा था।
---"फोन मत काटना..."
(रात का वो टुकड़ा, जो टूटे रिश्ते जोड़ गया)
फोन पर खामोशी के बीच रणविजय की आवाज फिर आई —
धीमी, टूटी हुई, मगर पूरी तरह सच्ची।
> “अगर… अगर तुम ‘हां’ कर दो ना,
तो मैं अभी आ जाऊं…
लेकिन तुम फोन मत काटना पूजा…
बस बात करती रहो।
मुझे कुछ सुनना नहीं…
सिर्फ तुम्हें सुनना है।
नहीं मालूम क्या है ये…
लेकिन आज… ये रात बहुत लंबी लग रही है…
बहुत अकेली , दिन निकलने में वक्त क्यूं लग रहा है? मैं अभी आना चाहता हूं .....
तुम्हारी आवाज़…
मुझे सोने नहीं दे रही —
मुझे जगाए रख रही है… जिंदा रख रही है।” मैं सोना नहीं चाह रहा...
फोन के दूसरी ओर पूजा की पलकों पर भीगी लकीरें उभर आईं।
उसने तकिये को थोड़ा और कसकर पकड़ लिया।
धीरे से बोली…
> “रणविजय, बहुत देर हो गई है…
सो जाओ…
कल ऑफिस जाकर मैं खुद फोन कर लूंगी।”
पर रणविजय उस रात टूटा नहीं था —
वो बन रहा था, फिर से, पूजा के लिए।
> “नहीं पूजा…
आज फोन मत काटना…
आज मत कहना कि ‘कल बात करेंगे’ —
आज… आज ही वो रात है…
जब मैं पहली बार खुद से मिला हूं…
और मुझे समझ आया —
कि तुमसे दूर होकर…
मैं खुद से कितना दूर चला गया था।
चुप रहो… पर फोन मत काटो।
मैं कुछ नहीं कहूंगा अब…
बस… तुम्हारी सांसों की आवाज़ सुननी है।”
पूजा का गला रुंध गया।
वो अब गुस्से में नहीं थी… न शिकायत में।
अब वो… मुलाक़ात में थी।
उसके होंठों पर एक मासूम सी मुस्कान आई —
वो धीमे से हँसी…
> “बस इतना ही था?”
“तुम्हें मेरी आवाज़ चाहिए थी?
या… मैं खुद?”
रणविजय हँस पड़ा… आँखों से आंसू गिरते हुए।
> “तुम खुद पूजा…
तुम्हारी आवाज़ नहीं… तुम्हारा वजूद चाहिए मुझे…
वो भी… अब शर्तों के बिना।”
और फिर…
वो कॉल, जो सिर्फ 5 मिनट की होनी थी,
पूरी रात चलती रही।
दोनों तरफ से कुछ कहा गया…
कभी हँसी, कभी आँसू…
कभी चुप्पियाँ — जो पहले दर्द देती थीं, अब सुकून दे रही थीं।
फोन पर लटकते हुए दो दिल एक-दूसरे को फिर से छूने लगे थे।
दूरी कम नहीं हुई थी,
पर… रास्ता बनने लगा था।
"सुबह नई थी… पर अहसास पुराने थे"
सुबह 8:05 AM
दिल्ली की हल्की गर्मियों वाली सुबह थी…
धूप उतनी तेज़ नहीं थी, पर पूजा के कमरे की खिड़की से छनती किरणें उम्मीद की तरह बिखर रही थीं।
पूजा शीशे के सामने खड़ी बाल सुलझा रही थी।
ऑफिस की ड्रेस पहन रखी थी, पर चेहरा बता रहा था — दिल कहीं और है।
हर दो मिनट में दरवाज़े की तरफ देखती, फिर खुद को समझाती
"क्या मैं अब भी... इंतज़ार कर रही हूँ?"
उधर रणविजय…
सुबह-सुबह नहा धोकर तैयार हो चुका था —
शर्ट की सिलवटें सीधी, बालों में हल्का सा जेल,
पर दिल में हजार उलझनें।
फिर वो पूजा के घर के सामने रुका —
एक छोटे से गुलाब का फूल लेकर…
पर कदम उठते नहीं थे।
“क्या वो दरवाज़ा खुलेगा? क्या वो हँसेगी? क्या मुझे फिर से 'उसका' कहा जाएगा?”
और तभी… दरवाज़ा खुला।
पूजा की मां थीं।
रणविजय ने हल्की मुस्कान के साथ सिर झुकाया —
> “नमस्ते मम्मी जी…”
मां ने एक बार आंखों से उसे देखा…
फिर बिना कुछ कहे, बिल्कुल वैसे ही मुस्कराईं जैसे पहली बार जब रिश्ता लेकर आए थे।
> “आ जाओ बेटा… पूजा ऊपर है, तैयार है… शायद तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी।”
अंदर का दृश्य:
पूजा धीरे से सीढ़ियां उतरी।
संयमित चेहरा…
पर आंखों में नमी और होंठों पर वो नर्मी जो सिर्फ अपनों के लिए होती है।
रणविजय खड़ा हो गया।
कुछ बोलने ही वाला था कि पूजा ने हल्के से कहा —
> “पापा कह रहे हैं… वो भी विदा करने आएंगे।”
रणविजय चुप हो गया…
क्योंकि उस एक वाक्य में सदियों की संकल्पना थी —
रिश्ता सिर्फ दो लोगों का नहीं होता… पूरा परिवार साथ निभाता है।
बाहर — गाड़ी तैयार खड़ी थी।
पापा हाथ में तौलिया रखे खड़े थे।
चेहरे पर कोई दुख नहीं…
बस एक नम सी सख्ती —
जैसे कहना चाह रहे हों — “अब ध्यान रखना हमारी बच्ची का।”
रणविजय ने उनके पाँव छुए।
पापा ने सिर पर हाथ रखा और बस इतना कहा:
> “बेटा… अब दोबारा कोर्ट नहीं, सिर्फ मंदिर जाना चाहिए।”
गाड़ी में बैठते हुए…
रणविजय ने पूजा का हाथ धीरे से पकड़ा…
पूजा ने कुछ नहीं कहा,
बस एक बार रणविजय की तरफ देखा —
जैसे कह रही हो —
“अबकी बार… जाने मत देना।”
गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी…
और पीछे छूट गया वो सारा वक़्त —
जहाँ दोनों ने एक-दूसरे को खोया था।
“इस बार कोई फेरे नहीं हुए थे,
कोई मंडप नहीं था…
फिर भी, आज इन दोनों ने
सच में विवाह किया था —
मन से, मौन से,
और मोहब्बत से।”
गाड़ी जैसे ही रणविजय के दरवाज़े पर आकर रुकी,
पूरे घर में जैसे कोई पुरानी धड़कन दोबारा चलने लगी हो।
दरवाज़े पर खड़ी थी रणविजय की मां —
साफ़ सूती साड़ी में, माथे पर हल्का टीका,
पर आंखों में एक अजीब सी बेचैनी —
बेटे की पत्नी को दोबारा बहू की तरह देखने की चाह।
रणविजय गाड़ी से उतरा,
और फ्रंट सीट पर बैठी पूजा भी…
धीरे से, सिर झुकाए…
पर इस बार कदम में झिझक कम थी, सच्चाई ज़्यादा।
मां की नज़रें पूजा पर पड़ीं —
एक पल को सब स्थिर हो गया।
पूजा ने हाथ जोड़ लिए —
> “मम्मी जी… प्रणाम।”
मां कुछ कह न सकीं…
बस देखती रहीं…
फिर एकाएक…
आंसू भर आए।
उन्होंने पूजा को सीने से लगा लिया —
बिलकुल वैसे जैसे मां अपने खोए बच्चे को पकड़ती है।
सिर्फ एक वाक्य निकला मां के मुंह से —
> "बहू… तू आ गई… अब सब ठीक हो जाएगा… सब ठीक हो जाएगा…"
रणविजय उस क्षण को देख रहा था —
उसकी आंखें नम थीं, पर दिल शांत था।
वो धीरे से मां के पास आया,
और ज़मीन पर बैठ गया…
सर मां की गोद में रख दिया।
> “मां…
इस घर में जब पूजा नहीं थी…
तो मुझे सब कुछ मिलकर भी कुछ अधूरा सा लगता था।
अब सब कुछ नहीं है मां…
लेकिन पूजा है —
और वही सब कुछ है।”
पूजा उस दृश्य को देख रही थी…
और मां की आंखें अब दोनों को देख रही थीं।
मां ने दोनों का हाथ एक-दूसरे में रख दिया —
> “अब ये हाथ कभी मत छोड़ना।
क्योंकि जब दिल टूटता है,
आवाज़ भीतर तक जाती है —
पर जब दिल जुड़ता है ना…
तो पूरे घर में सुनाई देता है।”
और फिर…
घर की दहलीज पर दीया जलाया गया,
और मां ने अपने आंचल से पूजा का माथा पोंछा,
जैसे कह रही हों —
"अब तू सिर्फ बहू नहीं, इस घर की शांति है…"
“आज कोई मंगलसूत्र नहीं बांधा गया था,
न कोई फेरे लिए गए…
लेकिन जब मां ने बहू को गले लगाया —
तो वो मिलन पूरे ब्रह्मांड की साक्षी में पवित्र हो गया।”
पूजा का कमरा भी वही था —
वही बेड, वही अलमारी, वही खिड़की…
पर आज कमरे की हवा बदल चुकी थी।
रणविजय दरवाज़ा खोलकर अंदर दाखिल हुआ।
पूजा थोड़ी देर तक दरवाज़े के पास ही खड़ी रही —
जैसे पिछले सारे क्षणों की साँझ वहीं सिमट आई हो।
कमरे में एक अजीब सी खामोशी थी —
ना कोई रोमांटिक संगीत,
ना कोई बड़ी बात…
बस दो लोग,
जो पहली बार सच में मिल रहे थे।
रणविजय ने धीरे से कहा —
> “ये कमरा…
तुम्हारे बिना सिर्फ चार दीवारी था।
आज फिर घर जैसा लग रहा है।”
पूजा धीरे-धीरे चलकर अंदर आई।
उसकी नजरें फर्श पर थीं, पर दिल रणविजय की धड़कनों में उलझा था।
उसने देखा — बेड की साइड में अब भी उसकी पसंद की किताबें रखी थीं…
आख़िरी बार जिस तकिया-कवर को उसने बदला था, वो अब भी वही था।
रणविजय ने पूजा के पास आकर बहुत धीरे से कहा —
> “पूजा… क्या हम
एक बार फिर…
बिना किसी आरोप, बिना किसी शर्त…
बस इंसानों की तरह…
एक-दूसरे को महसूस कर सकते हैं?”
पूजा की आंखें भर आईं।
वो हँसी नहीं, बोली भी नहीं…
बस अपने सिर को रणविजय के सीने पर रख दिया।
---
कुछ देर तक दोनों वैसे ही खड़े रहे —
ना कोई ज़ोर, ना कोई जल्दबाज़ी।
बस दो आत्माएँ… एक-दूसरे में पिघलती हुईं।
रणविजय ने पूजा का चेहरा अपने हाथों में लिया —
उसकी आंखों को देखा, जहां गुस्सा नहीं,
केवल थकान और प्रेम का मिश्रण था।
> “तुम थक गई हो ना पूजा?
इस रिश्ते को अकेले संभालते-संभालते…
अब मैं संभालूंगा…
अब हम साथ चलेंगे।”
पूजा की पलकों से दो बूंद आंसू बहे…
जो रणविजय की हथेली पर गिरकर वचन बन गए।
फिर...
धीरे-धीरे, संकोच को हटाते हुए,
रणविजय ने पूजा का हाथ थामा,
उसे बेड पर बिठाया।
कमरे की खिड़की से आती हल्की रोशनी दोनों के चेहरों पर पड़ रही थी।
उन्होंने एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाले —
और बस एक नज़र डाली,
जिसमें न कोई कामना थी,
न कोई अधिकार…
सिर्फ अपनापन था।
-Anita Gahlawat
प्यारे पाठकों,
रणविजय और पूजा की इस यात्रा में आपने मेरे साथ भावनाओं की हर लहर को महसूस किया, इसके लिए धन्यवाद।
क्या कभी आप भी ऐसी किसी उलझन में रहे हैं?
क्या रिश्तों को दूसरा मौका देना वाकई सही होता है?
आपकी प्रतिक्रियाएं, आपके विचार — मेरे लिए बेहद कीमती हैं।
पढ़ने के लिए दिल से आभार।
Writer – Anita Gahlawat
"डिवोर्स के बाद प्यार की कहानी"
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✨ पाठकों से एक विनम्र अनुरोध ✨
"अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो कृपया एक छोटा-सा कमेंट ज़रूर करें।
आपके शब्द ही मेरे लेखन की सबसे बड़ी ताक़त हैं।"
Mst anita ji
ReplyDeleteTouching story. Aapne bhut deen k baad blog pr active huye muje aapka leekha bhut pasand aata h
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