गजल :- प्यार का दरिया

दिवानों की बस्ती में आ गये हम भी
कुछ कहने कुछ सुनने
रहा भी न गया कहा भी न गया
लगे कागजों को भरने

कोई हमदर्द न मिला बांटले
कुछ दर्द में जमानें
प्यार का अंत नहीं सीने में
लगे हम खुद को गवानें

अपने से फुर्सत नहीं किसी को यहां
हम लगे खुद को ही सतानें
रूह का संजोंग बनाया बनाने वाले ने
ये दिल किसी की ना मानें

पल पल दिल में दस्तक देती सुरत तेरी
मिलने के ढुंढे हजार बहाने
चमकती आंखो ने कही थी कुछ बातें
आज लगी खुद को छिपानें

दरिया है इश्क मेरा इसका कोई अंत नही
अब लगे हम सबको बतानें
न डर अब लाज का न जमाने का
सबको पता है अब ये अफसाने

दिलों का ही खेल है दिलों का जो मेल है
इसमें बहते है दिवानें
करवटो में बिस्तर सिमटता सीने में सिमटती
गुजरी यादें

रोया भी न गया हंसा भी न गया
लगे अब हम अपने को बहलाने
शाम गुजरती वैसे ही रात चली जाती
देकर गहरे तरानें..

जुदा ना करे किसी का हमसफर कभी
मिलें ना फिर खुशी के ठिकाने
मन समझ भी जाये समझाने से
पर दिल न किसी की माने..

Writer:-anita gahlawat


2)💫 ग़ज़ल: तेरे बिना

✍️ लेखिका: Anita Gahlawat

तेरे बिना ये रातें अधूरी सी लगती हैं,
चाँद भी जैसे कुछ मजबूरी सी लगती हैं।

तू जो न हो तो हर ख़ुशी वीरान लगे,
हर बात अधूरी, हर दूरी सी लगती है।

लफ्ज़ भी अब तो तेरी तलाश करते हैं,
ख़ामोशी भी तेरे नाम की पूरी सी लगती है।

दिल ने तो तुझको ही खुदा मान लिया,
तेरे बिना हर दुआ अधूरी सी लगती है।

वो तेरी मुस्कान, वो तेरा अंदाज़-ए-बयाँ,
अब भी इन सांसों में ज़रूरी सी लगती है।
-Anita Gahlawat 



3) ग़ज़ल: इंतज़ार की शाम

✍️ लेखिका: Anita Gahlawat

तेरी राहों में दिल को बिछा बैठे हैं,
ख़्वाब आँखों में फिर से सजा बैठे हैं।

हर सदा तेरी पहचान सी लगती है,
हम तो हर आहट को तू मान बैठे हैं।

थी सज़ा इश्क़ की या कोई इनाम था,
हम उसी मोड़ पर उम्र ला बैठे हैं।

चाँदनी भी तेरे बिन अधूरी लगी,
तेरे ज़िक्रों को ही हम दुआ जान बैठे हैं।

तू मिलेगा, यही सोच कर उम्र भर,
इंतज़ारों की शामें सजा बैठे हैं।




ग़ज़ल

शीर्षक: "ना तेरा हुआ, ना खुद का रहा"
✍🏻 लेखिका: अनीता गहलावत

ना तेरा हुआ, ना खुद का रहा,
इश्क़ में ऐसा क्या गुनाह हुआ?

तेरी यादों ने जो जला डाला,
उस राख से ही फिर चाह हुआ।

हमने तो दिल से पुकारा तुझे,
पर तेरा अंदाज़ सख़्त रहा।

जो बात आंखों में रह गई थी,
वही उम्रभर का आह हुआ।

तू कहता रहा — “चलो आगे बढ़ो”,
हम मुस्कुरा कर तबाह हुआ।

हर शब तेरी ख़ामोशी से लिपटकर
अपना ही साया गवाह हुआ।

तुझको भुलाना इबादत था,
फिर भी हर पल तुझसे निबाह हुआ।

कभी ‘अना’ ने रोक लिया मुझको,
कभी दिल कहे — “बस आज रहा!”

जो साथ चला वो खुद मैं था,
तू तो बस एक चलती हवा हुआ।

हमने सीने में दफ़न की हैं
कितनी बातों की चिताएं यहां,
अब हर धड़कन में मातम हुआ,
हर सांस जैसे गुनाह हुआ।

अब तन्हाई भी कुछ कहती नहीं,
तेरे बाद जो सन्नाटा हुआ...


-@Anita Gahlawat/ poonia 

ग़ज़ल की विशेषताएं

इसमें "अना बनाम इश्क़", "ख़ामोश दर्द", "रूहानी मोहब्बत", और "छूटे हुए रिश्तों का असर" — सब समाहित हैं।






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