मेरी पहचान






सूरत से क्या लेना—मेरे शब्दों में मेरा अक्स दिखता है।
जब भी करनी हो मुझसे पहचान,
मेरी वैचारिकता ही काफ़ी है।

अंदरूनी नहीं होती कोई बात,
फिर बात छिपाने की क्या ज़रूरत?
जो भी हूँ, कायदे से हूँ—
ये दुनिया खुद कहती है।

तस्वीर लगाने को कहते हैं लोग,
पर मैं कहती हूँ—
तस्वीर से कहाँ मुआयना होता है शख़्सियत का!
उसमें तो हर इंसान संवरा नज़र आता है,
रौशनी और रंग बस बाहर का चेहरा दिखाते हैं।

देखना है तो हर शब्द की तर्ज़ना देखो,
हर पंक्ति में बसते मेरे एहसासों को पढ़ो।
जहाँ हँसी की खनक भी है,
और आंसू की नमी भी।

मेरी हर तहरीर में मेरा अक्स नज़र आता है—
कभी सपनों की उड़ान में,
कभी सच के आईने में,
कभी संघर्ष की आग में,
तो कभी अपनापन ओढ़े चुपचाप बैठा।

मैं वही हूँ—
जिसकी पहचान तस्वीर से नहीं,
शब्दों की रूह से होती है।



 सुरत से क्या लेना मेरे शब्दों में मेरा अक्श दिखता है।
जब भी करनी हो मुझसे पहचान,वैचारिकता ही काफि है

अंदरूनी नहीं होती कौई बात  फिर बात क्या होती
जो भी हूं कायदे से हूं , कहती है ये दूनियां खुद
की तस्वीर लगाओ ? उनको बता दूं कुछ....


तस्वीर से कहां मुवायना होता है शख्शियत का
उसमें तो हर इंसान संवरा नजर आता है......
देखना हि है तो हर शब्द की  तर्जना देखो..
जिसकी हर तहरीर में मेरा अक्श नजर आता है...




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