हिंदी गजल / अनिता गहलावत शायरी

टुकङों में नही जिया जाता हर दर्द
पूरा जीने की हिम्मत जुटानी पङती है

फिर भी अच्छे खासे चैन गवा कर
मंजिलो से हारे मौहब्बत में ढह कर
दिल ढूंढते है 

हर चाहत आईना दिखाकर 
उल्फत की दिवार बन जाती है

निगाहो में बसा है दिवानों का खजाना
मिलते ही हालत हीं हया हो जाती है

रूकसद न हुआ मुझसे तेरा रूठ जाना
जर्रे जर्रे में छिपी है एक प्यारी सी आह

किसी को अपना बना ले किसी से
दिल लगाकर भी खफा हो जाती है

जिदंगी बनती है संवरती है प्यार से
उमंगे भरी है आश है हर लम्हें में

करवटों से पङी सिलवटे कहती है
जिये तो जिये कैसे ये खुशनुमा जिदंगी

हसरत चिराग बुझने नहीं दे रही है
अब तो हर तन्हाई खामोश जहर लगे







🌹 ग़ज़ल 2: 
“उसकी ख़ामोशी” (अधूरे प्यार पर)

✍️ लेखिका: Anita Gahlawat

उसकी ख़ामोशी भी कुछ कहती थी,
हर चुप्पी में दर्द बहती थी।
लब खामोश, पर आंखें बग़ावत में थीं,
जैसे मोहब्बत वहीं रहती थी।

मिलना तो हर रोज़ होता था,
पर दिलों में दूरी सी रहती थी।
वो साथ था फिर भी तनहा था,
हर बात अधूरी सी लगती थी।

मैं समझा नहीं वो इशारे कभी,
और वो हर रोज़ थकती थी।
अब जब नहीं है वो साथ मेरे,
उसकी याद बहुत सुकून देती है।






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