प्रेम के झरोखे भी अजीब सी दास्ता सुनाते हैं
कितनों नें इनमें झांक कर सपने सजाये होंगे
पर जमाने में सबके कहां मुक्कमल हुए
जोर आजमाइशों से रस्मों में बांध दिए
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खुशीयां गमों के अधीन आकर तंग बेबस है
कभी आशियाना ही आशिकी थी आज तबाह है
भूलने पङते हैं बंसती मौसम जब पतझ़ङ होती है....
ठहर जाते हैं सुर्ख लम्हे जब दिवानगी याद आती है


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