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Showing posts from September, 2018
प्रेम के झरोखे भी अजीब सी दास्ता सुनाते हैं कितनों नें इनमें झांक कर सपने सजाये होंगे पर जमाने में सबके कहां मुक्कमल हुए जोर आजमाइशों से रस्मों में बांध दिए .... खुशीयां गमों के अधीन आकर तंग बेबस है कभी आशियाना ही आशिकी थी आज तबाह है भूलने पङते हैं बंसती मौसम जब पतझ़ङ होती है.... ठहर जाते हैं सुर्ख लम्हे जब दिवानगी याद आती है