मुकाम

तल्ख न थी किसी को जब जिन्दगी में कोई मुकाम न था
जब हासिल हुआ थोङा-सा जहां वहां अपनों का नाम न था

दुनियां को पहले आलोचना फिर तारिफ के सिवा काम न था जहां सकुन मिला वही ठहर गये चलते रहने से आराम न था



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इन परिदों को क्या पता शिकारी भी होते हैं
जब जाल में फंस जाते हैं तभी अनुभव पाते हैं।।




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