जिन्दगी

राहगिर है ‌जिन्दगी
हर रिश्ते में सफर करके
सुख दुःख का अहसास लेकर
अपनी राह चली जाती है जिन्दगी ।


कभी बचपन कभी बुढापे ‌से
शान से गुजरती है ‌,
‌जवानी ‌ही है ‌‌जिसमे
‌कारनामे ‌करवा ‌जाती है जिन्दगी ।


‌गुमानों ‌के ‌साये में ‌फस ‌कर
‌अभिमानी भी हो जाती है,
किसी को भूखा ‌सुला देती
‌किसी की‌ ‌अमीरी से नींद ‌उङाती ये जिन्दगी ।


‌उपर ‌वाले ‌ने ‌तो एक ‌धागे में ‌पिरोया ‌सबको
फिर भी ‌उल्फत ‌में ‌फसती है,
धर्म ‌के ‌नाम ‌पर ‌ब‌ंट कर भी
‌‌तेरा ‌मेरा ‌करके ‌निकल‌ जाती है ‌जिन्दगी।


जन्म के समय उगती फसल जैसी
खुशी हजार लाती ,
मरने पर अपने कहे जाने वालो पर
एक रात भारी पङती ये छणभंगुर जिन्दगी


Anita Gahlawat 


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