हास्य कविता सास बहू:- Tv-serial के titles पर
सास बहू की मिठी नोक-झोक tv- serial के title के according
बहू- मम्मी जी 'मिले जब हम ओर तुम '
'महाभारत ' 'कुटुम्ब ' में हो जाती है।
'कहता है दिल ' 'कही ना कही'
'थोङी सी जमीं थोङा सा आसमा '
सिर पर उठा लेती हो।।
'बंदिनी ' मॆं ' बॆरी पिया ' की
दो हंसो का जोङा हो जॆसे
बहुत पवित्र रिश्ता ' में बंद गई
' कहानी हमारी मोहब्बत की।'
' शगुन ' करा के अपने बेटे से खुद ही लाई हो
अब 'मॆं तुलसी तेरे आंगन की '।।
' सपनों से भरे नयना ' लाई थी
' कोशिश' थी आपके सामने
' कुछ झुकी पलकें ' सदा रहे ।
' ये रिश्ता क्या कहलाता है 'जिसमें
'हार - जीत ' लगी रहती है।।
'आपकी अदालत ' में आकर
' बुरे भी हम भले भी हम'।।।
तू -तू- मॆं-मॆ करती हर वक्त
क़सम-से
लगता है 'ये कहा आ गये हम'।
सास - 'बढो बहू' अब 'परिचय' सुनो मेरा
'सात फेरे ' लेकर 'उड़ान 'भरी थी जिन्दगी की।
रिश्तो की 'बुनियाद' रखी थी 'दिल-से'।
' कशमकश ' तो देख
'शक्ति अस्तित्व के अहसास की। ।
जहां मॆं थी खड़ी अब तुम खड़ी हो
'लेकर थपकी प्यार की ।।
ससुराल गेंदा फूल'
सदियों से चला आ रहा 'गीत' है।
सास-बहू की 'ख्वाहिश ' बन गई
'कहानी घर घर की'।।
कभी कुम -कुम भाग्या
कभी कसौटी जिन्दगी की। ।।
ज्यादा फिलोसोफर्स मत बन
मुझे भी लगता था ससुर मेरा
'पेशवा बाजीराव'
सास मेरी 'रजिया सुल्तान'।
आज तेरे अन्दर जो कशीश है वो
कशीश मेरे अन्दर भी थी।
जोधा-अकबर जैसा हमारा प्रेम,
मॆं भी प्रतिज्ञा थी अपने कृष्णा की।।
समझ गई ना जिन्दगी की महक तुम
क्योकि सास भी कभी बहू थी। ।।
बहु मॊन ,,,,,सास is सास
बहू- मम्मी जी 'मिले जब हम ओर तुम '
'महाभारत ' 'कुटुम्ब ' में हो जाती है।
'कहता है दिल ' 'कही ना कही'
'थोङी सी जमीं थोङा सा आसमा '
सिर पर उठा लेती हो।।
'बंदिनी ' मॆं ' बॆरी पिया ' की
दो हंसो का जोङा हो जॆसे
बहुत पवित्र रिश्ता ' में बंद गई
' कहानी हमारी मोहब्बत की।'
' शगुन ' करा के अपने बेटे से खुद ही लाई हो
अब 'मॆं तुलसी तेरे आंगन की '।।
' सपनों से भरे नयना ' लाई थी
' कोशिश' थी आपके सामने
' कुछ झुकी पलकें ' सदा रहे ।
' ये रिश्ता क्या कहलाता है 'जिसमें
'हार - जीत ' लगी रहती है।।
'आपकी अदालत ' में आकर
' बुरे भी हम भले भी हम'।।।
तू -तू- मॆं-मॆ करती हर वक्त
क़सम-से
लगता है 'ये कहा आ गये हम'।
सास - 'बढो बहू' अब 'परिचय' सुनो मेरा
'सात फेरे ' लेकर 'उड़ान 'भरी थी जिन्दगी की।
रिश्तो की 'बुनियाद' रखी थी 'दिल-से'।
' कशमकश ' तो देख
'शक्ति अस्तित्व के अहसास की। ।
जहां मॆं थी खड़ी अब तुम खड़ी हो
'लेकर थपकी प्यार की ।।
ससुराल गेंदा फूल'
सदियों से चला आ रहा 'गीत' है।
सास-बहू की 'ख्वाहिश ' बन गई
'कहानी घर घर की'।।
कभी कुम -कुम भाग्या
कभी कसौटी जिन्दगी की। ।।
ज्यादा फिलोसोफर्स मत बन
मुझे भी लगता था ससुर मेरा
'पेशवा बाजीराव'
सास मेरी 'रजिया सुल्तान'।
आज तेरे अन्दर जो कशीश है वो
कशीश मेरे अन्दर भी थी।
जोधा-अकबर जैसा हमारा प्रेम,
मॆं भी प्रतिज्ञा थी अपने कृष्णा की।।
समझ गई ना जिन्दगी की महक तुम
क्योकि सास भी कभी बहू थी। ।।
बहु मॊन ,,,,,सास is सास
Hi
ReplyDeleteHlo
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