Title - घर की कश्ती, तूफानों से लड़ती ।
अनीता गहलावत की फौजी पत्नी पर भावुक कविता
नहीं है यहाँ कोई मौसम, ना कोई घटा दीवानी,
यहाँ पर तो रहती है एक फौजी बीवी की कहानी।
जिंदें जी रुह भटकती मेरी,
कैसे उन्हें सुनाऊँ, रूदन सा रहता है गले में जज़्बात पिरोऊँ।
एक घरौंदा दिया रब ने, इसकी भी अधूरी कहानी,
इस घर में तो रहती है जो तूफानों से लड़े उस कश्ती की कहानी।
नहीं है यहाँ कोई मौसम, ना कोई घटा दीवानी,
यहाँ पर तो रहती है एक फौजी बीवी की कहानी।
उनसे बार-बार पूछूँ, कब है छुट्टी आनी,
स्कूल से लेकर घर की सारी जिम्मेदारी उठानी।
कभी सिलेंडर खाली, कभी रातों में जग-जग कर
पड़े बच्चों को रजाई उड़ानी।
नहीं है यहाँ कोई मौसम, ना कोई घटा दीवानी,
यहाँ पर तो रहती है एक फौजी बीवी की कहानी।
वे समझाते मुझे, इतनी जल्दी छुट्टी कैसे आऊँ,
मैं सीमा प्रहरी हूँ, इससे ज्यादा क्या समझाऊँ।
लेकिन सुनकर बात मेरी, वे रुक नहीं पाते,
छुट्टी की अर्जी देने एक आवेदन लिख लाते।
नहीं है यहाँ कोई मौसम, ना कोई घटा दीवानी,
यहाँ पर तो रहती है एक फौजी बीवी की कहानी।
बहाने लगाते खूब, अब है छुट्टी जानी,
कभी बापू की हालत ठीक नहीं, कभी मां की आँख दिखानी।
कभी बहन की शादी का, लेकिन सही बात जुबां पर नहीं आनी,
कभी नहीं कह सकते इंतजार करे कोई दीवानी।
नहीं है यहाँ कोई मौसम, ना कोई घटा दीवानी,
यहाँ पर तो रहती है एक फौजी बीवी की कहानी।
छुट्टी करने वाले को भी सब समझ आता,
बहानेबाजी सुनकर अपना हाल छुपाता।
छुट्टी कैसे भेजूँ तुझे? यूनिट का काम नज़र नहीं आता।
जब घर पहुँच जाता, बच्चे करें “पापा! पापा!”
माता बोले आया बेटा, लेकिन निगाहें तिरछी तिरछी,
कहां गई वो सूरत सुहानी, तब मन खाए हिचकोले,
जब दिखे वो परवानी।
नहीं है यहाँ कोई मौसम, ना कोई घटा दीवानी,
यहाँ पर तो रहती है एक फौजी बीवी की कहानी।
होती है छुट्टी में पूरी मस्ती, ना कोई जिम्मेदारी आनी,
चंचल सी होती है वो हर फौजी बीबी की ज़िन्दगानी।
जब छुट्टी खत्म हो जाती, जाने का समय पास आता,
आवाजें मंद-मंद हो जाती, कोई कुछ बोल नहीं पाता।
नहीं है यहाँ कोई मौसम, ना कोई घटा दीवानी,
यहाँ पर तो रहती है एक फौजी बीवी की कहानी।
वे देश के लिए जीते हैं और देश के लिए मरते हैं,
सारी सारी रात सरहद पर बर्फ में तपते हैं,
पर दुनियावाले इस बात को कब समझते हैं।
मैं भी समर्पित हूँ उनके जज़्बातों में,
मैं भी अर्पित हूँ उनके ख्यालातों से।
नहीं है यहाँ कोई मौसम, ना कोई घटा दीवानी,
यहाँ पर तो रहती है एक फौजी बीवी की कहानी।
जय हिन्द।
लेखिका: अनिता गहलावत
2) कविता नं-2
फौजी बीवी
दिल में दबी एक आहट सी है
पर लहजे से दिल की तङफ कह न पाई।
अहसास तो बहुत कराया समझाने का
पर मजबूरियों में बोल न पाई ।।
दिल कभी रोया कभी हंसा
पर आपकी याद हर कदम पर आई ।
उनको बताने की कोशिश तो की बहुत
वे समझे नहीं और मैं रह न पाई ।।
जाते देख छलक गई आंखे मेरी
मैं खुद से वफा कर न पाई ।
मैं कायर नहीं हूं ना कभी थी
पर आज आंखो का पानी रोक न पाई ।।
उनको जाना हैं देश की सेवा में
मैं फौजी बीवी खुदगर्ज हो न पाई
मन की बात मन में ही रही
साथ रहने की जिद भी न कर पाई
महिनों बात नहीं होती उनसे
फिर भी कदम-कदम पर हिम्मत खूब जुटाई ।
दुश्मन को बार-बार धूल चटाई है शेरों ने
पर कुछ बङबोलो को मात खाकर भी समझ न आई ।।
जब टूटते हैं सीजफायर वहां धङकते है दिल यहां
मै अपनी बैचनी किसी को जता न पाई ।
वे चले गये हैं सीमा पर
मैं उनके फर्ज के आगे अङ न पाई ।।
मातृभूमि है शान वीरों की
हम बीवियां कभी कमजोरी बन न पाई।
कह गये चाहे आओ तिरंगे में आयेंगे जरूर
सुनकर दिल भर आया आसानी से सह न पाई ।।
लहू से सन्नता है जब तिरंगा
किसी वीर ने वतन के लिए वीरगति है पाई ।
भारत मां है उनके लिए आन-बान-शान
हम भी साथ खङी हैं हम फौजी बीवियो ने भी कसम खाई ।।
फौजी बीवी
दिल में दबी एक आहट सी है,
पर लहजे से दिल की तड़प कह न पाई।
अहसास तो बहुत कराया समझाने का,
पर मजबूरियों में बोल न पाई।
दिल कभी रोया, कभी हँसा,
पर आपकी याद हर कदम पर आई।
उनको बताने की कोशिश तो की बहुत,
वे समझे नहीं और मैं रह न पाई।
जाते देख छलक गई आँखे मेरी,
मैं खुद से वफ़ा कर न पाई।
मैं कायर नहीं हूँ, ना कभी थी,
पर आज आँसुओं को रोक न पाई।
उन्हें जाना है देश की सेवा में,
मैं फौजी बीवी, खुदगर्ज़ हो न पाई।
मन की बात मन में ही रही,
साथ रहने की जिद्द भी न कर पाई।
महीनों बात नहीं होती उनसे,
फिर भी कदम-कदम पर हिम्मत खूब जुटाई।
दुश्मन को बार-बार धूल चटाई है शेरों ने,
पर कुछ बढ़बोलों को मात खाकर भी समझ न आई।
जब टूटते हैं सीजफायर वहां,
धड़कते हैं दिल यहां,
मैं अपनी बैचनी किसी को जता न पाई।
वे चले गए हैं सीमा पर,
मैं उनके फर्ज़ के आगे अंगुली न कर पाई।
मातृभूमि है शान वीरों की,
हम बीवियां कभी कमजोरी बन न पाई।
कह गए चाहे आओ तिरंगे में आएंगे जरूर,
सुनकर दिल भर आया, आसानी से सह न पाई।
लहू से सन्नता है जब तिरंगा,
किसी वीर ने वतन के लिए वीरगति पाई।
भारत मां है उनके लिए आन-गान-शान,
हम भी साथ खड़ी हैं, हम फौजी बीवियों ने भी कसम खाई।
writer:- Anita Gahlawat
3) कविता नं-3
हरियाणवी बोली में
सरहद पर टूटै स सिजफायर मेरे फौजी पिया
ओर जिगर मै धङकन दिन रात उचकाटी खावै स .
जब खोलू अलमारी तेरे कपङे ओर फोटो देख
जी भर कै रोना आव स
देवर जेठानी तै पङकै सोजया पर
यो सन्नाटा मन सारे सारे दिन रात खावै स....
सरहद पर टूटै स सिजफायर मेरे फौजी पिया
ओर जिगर मै धङकन दिन रात उचकाटी खावै स .
के कह दू किसनै बता दू हाल मेरे हिवङे का
जब भी खुश हूं दूनियां बुरी तरह लखाव स
तम तो आते नही छह महिने से पहले कदे
पर ये तनहाई मैनै भीतर तै सताव स
सरहद पर टूटै स सिजफायर मेरे फौजी पिया
ओर जिगर मै धङकन दिन रात उचकाटी खावै स .
पूरे दिन तेरी सोच मै बदहाल है हाल मेरा
ये दूनियां सारी रात आराम तै सोव स
मत घबराना दुश्मन से तिरगें को ऊपर रखना
तेरे कारण ही यो देश आराम फरमाव स
सरहद पर टूटै स सिजफायर मेरे फौजी पिया
ओर जिगर मै धङकन दिन रात उचकाटी खावै स .
खेतां मैं फसल कटगी गेहुं कै साथ तूङा भी गिराया
सुख दुख पाकर सारा काम सगांया स
बालक भी इब बाट देख कै बुझन लाग गै
मम्मी पापा कब आवै स
सरहद पर टूटै स सिजफायर मेरे फौजी पिया
ओर जिगर मै धङकन दिन रात उचकाटी खावै स .
मां तो मां स पिया आपकी खातिर गूंद जमाण नै
गरमी मै ही गूंद तूलाव स
इस देश की रखवाली के लिए फोजीया साथ
घरवाली भी सारी रात नही सो पावै स
सरहद पर टूटै स सिजफायर मेरे फौजी पिया
ओर जिगर मै धङकन दिन रात उचकाटी खावै स .
कोई ना समझता पीङ पराई फोजी भी
राजनीति का हिस्सा बनता आवै स
सरहद पर टूटै स सिजफायर मेरे फोजी पिया
ओर जिगर मै धङकन दिन रात उचकाटी खावै स
सरहद पर टूटै स सिजफायर मेरे फौजी पिया
ओर जिगर मै धङकन दिन रात उचकाटी खावै स .
writer:- Anita Gahlawat
Bhiwani, Haryana
4) फौजी पत्नियाँ
वो लहराती चुनरी नहीं, इक धैर्य की मिसाल है,
नाज़ुक मन में भी बसी, फौलादी कमाल है।
जो हर सुबह आरती की थाली थामे खड़ी रहती है,
पर दिल में बसी चिंता को मुस्कान में छुपा लेती है।
वो सजती है, सँवरती है,
मगर केवल त्यौहारों के लिए नहीं,
हर रोज़ उसके जीवन में,
कोई ताज़ा इंतिहान वही सही।
पति के कंधे पर सितारे देखती है,
और दिल से हर बार विदा देती है।
ना मुरझाती, ना रुकती, ना कोई आँसू दिखाती,
वो पत्थर नहीं, मगर हालातों से दिल को कठोर बनाती।
बच्चों को पिता की कहानियाँ सुनाती है रातों में,
और खुद नींद से रिश्ता तोड़ लेती है
खामोशी की बातों में।
वो हर फोन कॉल को साँसें थामकर उठाती है,
"मैं ठीक हूँ" सुनकर ही फिर चैन की नींद पाती है।
चैट में सिर्फ़ शब्द नहीं, प्राण बसते हैं,
उनमें उसके अधूरे पल, अधूरे सपने मचलते हैं।
जब बच्चे पूछते हैं — "पापा कब आएँगे माँ?"
वो मुस्कुरा कर कहती है — "जल्द... बस थोड़ा सा।"
लेकिन उसकी वो हँसी भीग जाती है हर रात,
जब तकिये पर सिर रखते ही टपकते हैं जज़्बात।
ना किसी मेडल की दरकार है, ना अख़बार की सुर्खियाँ,
उसकी पहचान है — "एक फौजी की अर्धांगिनी
जिसने खुद को भुला दिया देश की सेवा में,
अपने हर पल को जिया एक उम्मीद की रौशनी में।
वो सिर्फ़ पत्नी नहीं, वो शक्ति का आकार है,
हर फौजी की मजबूती का आधार है।
सरहद पर जो हिम्मत खड़ी होती है,
उसके पीछे हर बार एक फौजी पत्नी सिसकती है…
पर फिर भी सिर ऊँचा रखती है।
-Anita Gahlawat
5)
🪖🇮🇳 सरहद का सिपाही
✍️ लेखिका: Anita Gahlawat
चल पड़ा है फिर से वीर, ओढ़ के वर्दी प्यारी,
मां की दुआ, बीवी की आंखें — सब कहतीं
"सावधानी भारी।"
न तन की चिंता, न मन की थकान,
बस दिल में बसा है तिरंगे का मान।
गोली की आवाज़ें गीत हैं उसके लिए,
और मौत भी लगती है प्रीत उसके लिए।
वो हँस के चलता है बारूद के संग,
पीछे रह जाते है, संगी और बचपन के रंग।
हर करवाचौथ वो छूटता है,
हर दिवाली वो मौन सूझता है।
लेकिन फिर भी कहता है —
“माँ! मैं ठीक हूं, और देश भी सलामत है…”
6) वीरता की मिसाल
✍️ अनिता गहलावत
वो साड़ी में लिपटी चुपचाप वीरता है,
हर विदाई में छुपी एक गहरी कथा है।
मुस्कान लिए वो अश्रु पी जाती है,
जब उसका साथी सरहद पे जाता है।
ना सिंदूर की चिंता, ना कंगन का शोर,
उसका प्यार हर बार करता है युद्ध को पार।
संदेश के हर अक्षर में ढूंढती वो साँसें,
हर तस्वीर में जीती अपने प्रिय की आशाएँ।
वो करवाचौथ पे मिल नहीं पाती,
त्योहारों में दीप अकेले जलाती।
पर कोई शिकवा नहीं, ना कोई गिला,
उसका गर्व ही उसका सबसे बड़ा क़िला।
हर सुबह दुआओं में बुनती वो रक्षा कवच,
हर रात तिरंगे को देखती है सजग।
वो फौजी की पत्नी नहीं, एक युग की देवी है,
जिसकी चुप्पी भी एक गीत वीरता की रचेवी है।
-Anita Gahlawat
🇮🇳 “सरहद की राखी”
(देशभक्ति और रक्षाबंधन पर)
✍️ लेखिका: Anita Gahlawat
राखी भेजी है बहना ने सरहद पार,
भाई ने भेजा वादा —
नहीं दुःख आने दूंगा तुझ पर।
न तो मिठाई है, न आरती का थाल,
बस वर्दी में छिपा है बहन के सिंदूर का ख्याल।
गोली की आवाज़ों में जब भी तेरा फोन आता है,
भाई का सीना और भी गर्व से भर जाता है।
एक धागा जो बांध न सकी मै कलाई पर,
वो दिल में लिपटा हर जंग में साथ निभाता है।
रक्षाबंधन आ गई है भाई मेरे....
धागा ना पहुंचे तो ग़म न करना..
सुनी कलाई देखकर रंज न करना
मैं तेरी सलामती की दुआ ताउम्र करूंगी।।
Love u bhaiyo
-Anita Gahlawat
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आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 23 मई 2020 को लिंक की जाएगी ....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
सोरी मैम मै नहीं दे पाई
Deleteबहुत बढ़िया
ReplyDeleteThnks
DeleteBhut khub
ReplyDelete🙏🙏
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