बरसाती दिन
"बारिश, बचपन और बदलते मौसमों पर एक भावनात्मक कविता"
यह कविता सिर्फ बारिश की बूंदों की बात नहीं करती, यह उन भीगे लम्हों की याद दिलाती है जब मिट्टी की सोंधी खुशबू में बचपन सांस लिया करता था।
टहनियों की सरसराहट, मिट्टी के घर, दादी की कहानियाँ और गली के शोर — सब मिलकर एक ऐसा संसार रचते हैं, जहाँ अब हम लौट तो नहीं सकते, पर यादें अब भी उसी दरवाज़े पर खड़ी हैं।
यह कविता मौसम की तरह बदलते जीवन को समझने और पुराने पलों को संजोने का एक भावुक दस्तावेज़ है।
धरती से आती बूंदो की सुगन्ध
ओर पेड़ो की हिलती टहनियाँ
कुछ कहने को, बयान करने को
मजबूर कर जाती हैं ।
**
इन बारिशो में कॆसा जादू है,
सूरज भी नहीं दिखाई देता
ओर सबकुछ सुखा देती हैं
**
वो बारिश में नहाना, रुकने के बाद मिट्टी के घर बनाना
इकट्ठे होकर मोहल्ले में जोर-जोर से शोर मचाना
कूद-कूदकर धरती पर पक्षियों के लिये पानी मांगना
बारिश में नहाना ओर बड़ो का डाटना
कहीं नहीं दिखाई देता अब वो बचपन सुहाना
**
बदलते मौसम में क्या जादू है
कुछ कह नहीं सकते ।
जीवन का भी यही आधार है,
कभी धूप कभी छांव
एक जैसे मौसम में रह नहीं सकते ।। ।
ओर पेड़ो की हिलती टहनियाँ
कुछ कहने को, बयान करने को
मजबूर कर जाती हैं ।
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इन बारिशो में कॆसा जादू है,
सूरज भी नहीं दिखाई देता
ओर सबकुछ सुखा देती हैं
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वो बारिश में नहाना, रुकने के बाद मिट्टी के घर बनाना
इकट्ठे होकर मोहल्ले में जोर-जोर से शोर मचाना
कूद-कूदकर धरती पर पक्षियों के लिये पानी मांगना
बारिश में नहाना ओर बड़ो का डाटना
कहीं नहीं दिखाई देता अब वो बचपन सुहाना
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बदलते मौसम में क्या जादू है
कुछ कह नहीं सकते ।
जीवन का भी यही आधार है,
कभी धूप कभी छांव
एक जैसे मौसम में रह नहीं सकते ।। ।
Anita Gahlawat
धरती से उठती सोंधी मिट्टी की खुशबू,
और टहनियों की हौले-हौले सरसराहट,
कुछ कहती हैं — जैसे मौसम बोल रहा हो,
या फिर पुरानी यादें खुद चलकर पास आ गई हों।
इन बारिशों में सचमुच कोई जादू है,
सूरज तक कहीं छुप जाता है —
फिर भी ये बूंदें दिल को उजास कर जाती हैं।
जैसे मन की धूल मिटा कर नया जीवन भर देती हों।
कभी इन बूंदों में भींगते थे
बिना छाते, बिना रोक-टोक,
गली में मिट्टी के घर बनते थे
और हर तरफ शोर होता था —
कभी हँसी का, कभी झगड़ों का,
कभी मां की डांट का,
जिसमें भी अपनापन होता था।
पक्षियों के लिए पानी भरना,
कागज़ की नाव बहाना,
और बारिश थमने के बाद
उस भीगे आँगन में बैठकर
दादी से कहानी सुनना…
अब वो सब दृश्य धुंधलाए से लगते हैं।
अब ना मोहल्ला वैसा रहा,
ना वो दोस्त, ना वो बचपन,
बस रह गईं यादें — भीगी दीवारों की तरह,
जिन्हें दिल बार-बार छूना चाहता है।
बदलते मौसमों की ये चाल भी अजीब है —
कभी धूप, कभी छाँव,
जैसे ज़िंदगी भी हर पल नया रंग लेती हो।
हम चाहें भी तो एक जैसे मौसम में
ज़्यादा देर तक नहीं रह सकते।
और शायद… यही जीवन है।
Anita Gahlawat
यह कविता बचपन की उन भीगी यादों को संजोती है जो बारिश की पहली फुहार के साथ मन में ताज़ा हो उठती हैं। मिट्टी की सोंधी महक, टहनियों की सरसराहट और बारिश में खेलते निश्चिंत दिन — सब मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते हैं जहाँ अब केवल यादें ही बची हैं। कवयित्री बदलते मौसमों के माध्यम से जीवन के बदलाव को दर्शाती हैं, और यह स्वीकार करती हैं कि जैसे मौसम टिकते नहीं, वैसे ही ज़िंदगी भी एक सी नहीं रह सकती — शायद यही जीवन का असली रूप है।
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